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Serious Men Review: सुधीर मिश्रा के व्यंग्य का भटक गया निशाना, नवाज ने अपना ‘काम’ फिर कर दिखाया
सिनेमाघर आज खुलें, कल खुलें या पता नहीं कब खुलें, लेकिन इस कोरोना काल में सिनेमा भरपूर खुला हुआ है। अवध में दादियां कहानी खत्म करते समय कहती हैं, जइसे इनके दिन बहुरे, वइसे सबके दिन बहुरैं मतलब जैसे इनका सब कुछ ठीक हो गया, वैसे ही सबका सब कुछ ठीक हो जाए। ओटीटी के बहाने हिंदी सिनेमा में भी सबका सब कुछ ठीक हो रहा है। सुधीर मिश्रा की फिल्म उनकी पिता की फोटो से शुरू होती है और फिल्म का पहला दृश्य ही संभोग का है। सुधीर इसे कहानी की जरूरत बताते हैं। जीवन के 16 संस्कारों में पहला संस्कार गर्भाधान का ही है, हिंदी फिल्म के दर्शकों को इस नए ‘संस्कारी’ सिनेमा की बधाई हो।
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सीरियस मेन
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जबसे देश में ओटीटी वाले आए हैं। किताबें लिखने वालों की चांदी है। किसी भी तरह के कानूनी झंझट से बचने के लिए ओटीटी वाले किताबों में लिखी जा चुकी कहानियों को प्राथमिकता देते हैं। मनु जोसेफ का उपन्यास भी इसी गदर में फ्रीडम फाइटर बन गया है। ये बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर दिखाने वाली फिल्म है। देश बदल रहा है। आगे बढ़ रहा है। लेकिन, किस तरफ वाले आगे बढ़ रहा है, ये फिल्म देखकर समझने की कोशिश की जा सकती है। निर्देशक सुधीर मिश्रा सामान्य परिस्थितियों की असमान्य राजनीति पर सिनेमा बनाने में माहिर रहे हैं। वह देश में सिटी क्राइम जॉनर के पुरोधा रहे हैं। सिनेमा उनका सम्मान करता है। वह खुद अपने सिनेमा का सम्मान अब कितना करते हैं, नेटफ्लिक्स की ये फिल्म समझा देती है।
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सीरियस मेन
- फोटो : screenshot from youtube/Serious Men
‘सीरियस मेन’ जाति विभेद की राजनीति पर बनी फिल्म है। सुधीर मिश्रा तीन दशक बाद फिर से धारावी पहुंचे हैं। सिनेमा में उनका उदय भी ठीक से उनके करियर की बतौर निर्देशक तीसरी फिल्म ‘धारावी’ से ही हुआ। इस बार कहानी अय्यन की है, वह दलित है। उसका नैतिक कंपास उत्तर और दक्षिण दिशा में ही टिका रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। साहब उसके धुरंधर हैं। बेटे को वह अपने उनसे बड़ा धुरंधर बनाना चाहता है। पूरी लाइफ गालियां खा खाकर गुजारने वाले अय्यन को लगता है उसका बेटा तकदीर बदल सकता है। इसके बाद ‘तारे जमीन पर’ उतरते हैं। ‘पीपली लाइव’ होता है। और, होता है वह सबकुछ जो दर्शक कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में देख चुके हैं। सुधीर मिश्रा को मैं हिंदुस्तानी सिनेमा का क्वेंटिन टैरेंटिनो मानता रहा हूं। लेकिन, वह रामगोपाल वर्मा बनने की ठान चुके हैं जबकि उनकी फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ का परिवर्धित संस्करण रही ‘सत्या’ ही राम गोपाल वर्मा का हिंदी सिनेमा में असली टेक ऑफ है।
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सीरियस मेन
- फोटो : screenshot from youtube/Serious Men
सुधीर मिश्रा एक प्रतिष्ठित सियासी खानदान से आते हैं। पिता उनके अध्यापक रहे हैं और वह इस बात को खूब बताते भी हैं कि वह एक मास्टर के बेटे हैं। लेकिन, मास्टर का ये बेटा अपनी उम्र के चौथेपन में अपनी धार खो रहा है। अपने सिनेमा को पहले जैसा पैना बनाए रखने के लिए सुधीर को कुछ तो क्रांतिकारी करना ही होगा। नहीं तो ‘दास देव’ और ‘इनकार’ जैसी फिल्मों को कौन याद रखने वाला है? नवाजुद्दीन सिद्दीकी के लिए इस तरह के किरदार अब बाएं हाथ का खेल हो चुके हैं। घटिया सेक्स सीन उनकी पहचान बनते जा रहे हैं। अभिनय उनका बढ़िया है, पर ये सब वह क्यों करते हैं, वह ही जानें। कोई रिकॉर्ड वगैरह बनाना चाह रहें तो अलग बात है, नहीं तो नवाज की फिल्मों में नवाज की अदाकारी देखने का लोग अब भी इंतजार करते हैं। अक्षत दास का कमाल यहां देखने लायक है। इंदिरा तिवारी, नार्वेकर और श्वेता अपनी अपनी जगह ठीक ही हैं।
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सीरियस मेन
- फोटो : screenshot from youtube/Serious Men
फिल्म का अंडर करंट ढीला है। तकनीकी रूप से भी फिल्म सहज नहीं है। बहुत जोर देकर पर्दे पर ध्यान टिकाए रखना होता है, इस फिल्म को पूरा देखने के लिए। पटकथा का बहाव बेहतर होता और इसका बैकग्राउंड म्यूजिक भी थोड़ा ठीक होता तो फिल्म मनोरंजन के पैमाने पर पास हो सकती थी। सुधीर मिश्रा के सिनेमा को एक फिल्म डॉक्टर की जरूरत अब महसूस होने लगी है, जो बिना उनकी फिल्मोग्राफी से प्रभावित हुए उनकी फिल्मों की चीरफाड़ रिलीज होने से पहले कर सके। फिल्म कुछ बहुत विशिष्ट नहीं बन सकी है, नहीं देखेंगे तो कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है।
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