सावन का आखिरी संडे भी आ गया और उम्मीद है कि आपका पिछला हफ्ता शानदार बीता होगा। अगर कुछ ऊंच नीच रह गई तो परेशान मत होइए क्योंकि अगर आपकी कहानी की हैप्पी एंडिंग नहीं हुई तो अभी एंडिंग होना बाकी है। जीवन भी कुछ कुछ सिनेमा जैसा ही है। कोई है जो हमारे आपके किरदारों की डोर थामे है। इंटरवल तक कहानी कैसी भी आड़ी तिरछे भागे लेकिन इंटरवल होते ही सब किरदार संभल जाते हैं और फिर चल पड़ते हैं उधर जहां उनको खुद जाना है। आप भी कोरोना काल को जीवन का इंटरवल समझिए, पढ़िए इन छह बेहतरीन हिंदी फिल्मों के दिलचस्प किस्सों के बारे में और नया हफ्ता शुरू कीजिए, बिल्कुल नए अंदाज और नए विचारों के साथ।
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अमिताभ और जया जब बने ‘अमिया’
साल 1973 अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के जीवन का रीति काल रहा है। दोनों की मोहब्बत भी जोरों पर थीं और दोनों के सितारे भी कम जोर पर नहीं थे। दोनों का विवाह इसी वर्ष तीन जून को हुआ। शादी से ठीक पहले दोनों की फिल्म ‘जंजीर’ सुपरहिट हुई। जया तो खैर तब तक खुद ही सुपरस्टार बन चुकी थीं। अमिताभ के लिए ‘जंजीर’ का हिट होना किसी ईश्वरीय आशीर्वाद से कम नहीं था और दोनों का विवाह तो खैर था ही ईश्वरीय आशीर्वाद। शादी के ठीक बाद रिलीज हुई फिल्म ‘अभिमान’ में अमिताभ की आभा और उनका रूप दर्शनीय था तो जया का लावण्य और मोहक चेहरा फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण बना। ‘
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काजोल की डेब्यू फिल्म से पहले की फिल्म
फिल्म ‘जमाना दीवाना’ का एक किस्सा काजोल को लेकर भी है। रमेश सिप्पी चाहते थे कि फिल्म ‘जमाना दीवाना’ शाहरुख खान और काजोल के साथ एनाउंस हो, ऐसा होता तो दोनों की जोड़ी की ये पहली घोषित फिल्म होती, लेकिन यहां फिल्म के संगीतकार नदीम श्रवण बताते हैं कि काजोल के नाम पर अड़ गए। उन दिनों के साजिदों की बातों को मानें तो नदीम श्रवण की काजोल से खुन्नस हो गई थी और उन्होंने साफ कह दिया कि अगर काजोल फिल्म में रहेंगी तो वे फिल्म छोड़ देंगे। रमेश सिप्पी की हालत उन दिनों ऐसी थी कि वह बस किसी तरह ये फिल्म शुरू कर देना चाहते थे और नदीम श्रवण का संगीत जिस हिसाब से बिक रहा था, वैसे में उन्हें वह छोड़ नहीं सकते थे।
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राजेंद्र कुमार की आखिरी कोशिश
कुमार गौरव के पिता राजेंद्र कुमार ने एक आखिरी दांव अपने बेटे कुमार गौरव पर लगाया और एलान किया एक फिल्म का, जिसमें उस वक्त की नंबर वन हीरोइन माधुरी दीक्षित को लिया गया। निर्देशक लाए गए, संगीतम श्रीनिवास राव। राजेंद्र कुमार ये मानकर चले कि जो निर्देशक कमल हासन को तमिल सिनेमा से निकालकर पूरी दुनिया में सुपरस्टार बना सकता है, वह जरूर उनके बेटे का कुछ तो कल्याण करेगा। आमतौर पर हिंदी सिनेमा के सितारे दक्षिण भारत के फिल्मकारों से मुंहमांगी रकम पाते रहे हैं, ये शायद पहला मौका था जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्ममेकर ने मुंबई के फिल्म निर्माता से मुंहमांगी रकम फिल्म निर्देशित करने के लिए वसूल की। और, ये फिल्म बनी भी तो सिर्फ राजेंद्र कुमार की साख के चलते।
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ये है मल्टीस्टारर की ‘मां’
किसी मल्टीस्टारर फिल्म का मतलब इन दिनों एक से ज्यादा हीरो या एक से ज्यादा हीरोइन भर से होता है, लेकिन फिल्म ‘वक्त’ में तो सितारों की पूरी बारात है। तो चलिए आगे बढ़ने से पहले गिनती करते चलते हैं। बलराज साहनी, सुनील दत्त, साधना, राजकुमार, शशि कपूर, शर्मिला टैगोर, अचला सचदेव, रहमान, मदन पुरी, मनमोहन कृष्ण, लीला चिटनिस, जीवन, सुरेंद्र नाथ, सुमति गुप्ते, शशिकला, हरि शिवदासानी, मोतीलाल, मुबारक, जगदीश राज, सुरेंद्र राही और बद्री प्रसाद। देखा आपने, सिर्फ नाम लिखते लिखते हम चौथी लाइन में आ गए। इनके किरदारों का विस्तार देखने के लिए तो आपको फिल्म ही देखनी पड़ेगी, लेकिन इस लिस्ट में धर्मेंद्र का नाम नहीं है तो बस उनकी मर्जी से। क्यों, जानने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए।
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