कुछ कहानियां कभी पुरानी नहीं होतीं। कुछ रिश्ते कभी फीके नहीं पड़ते। और कुछ चेहरे हमेशा हमारी यादों में बसे रहते हैं। जब यह खबर आई कि 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' एक बार फिर लौट रहा है, तो सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई। शो के नाम से जुड़ी कई पुरानी यादें लोगों के जेहन में ताजा हो गईं। लेकिन एक सवाल सबसे ज़्यादा पूछा गया - 'बा कहां हैं?' ‘मां की जगह कोई नहीं ले सकता' ये शब्द हैं सुधा शिवपुरी यानी बा की बेटी रितु शिवपुरी के, जो इस शो की वापसी को मां के नाम की एक श्रद्धांजलि मानती हैं। अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में रितु ने बा यानी सुधा शिवपुरी के बारे में कई बातें बताईं।
Kyunki Returns: ‘मां की जगह कोई नहीं ले सकता’, ‘क्योंकि…’ की वापसी पर बा सुधा शिवपुरी की बेटी रितु हुईं भावुक
Ritu Shivpuri: टीवी का लोकप्रिय शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ फिर से वापस आ रहा है। हालांकि, इस बार शो में ‘बा’ का किरदार निभाने वाली सुधा शिवपुरी के न होने पर उनकी बेटी भावुक हैं।
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‘मां अपने दिल का टुकड़ा सेट के हर कोने में छोड़ आती थीं’
अमर उजाला डिजिटल से बातचीत के दौरान रितु ने कहा, 'मां इस शो का हिस्सा थीं और हम सब उन्हें उस दुनिया में जीते हुए देखते थे। अब जब शो दोबारा लौट रहा है, तो ऐसा लगता है जैसे वक्त ने कोई भूली-बिसरी किताब फिर से खोल दी है। ‘क्योंकि...’ का सेट उनके लिए सिर्फ एक काम की जगह नहीं था। वहां उन्होंने एक और घर बसाया था। वो हंसी, वो कहकहे, वो किसी के सिर पर हाथ फेर देना, ऐसा लगता था जैसे मां अपने दिल का टुकड़ा हर कोने में छोड़ आती थीं।'
हर रोज सेट पर सबके लिए खाना ले जाती थीं
सिर्फ इतना ही नहीं, रितु ने मां की एक खूबसूरत आदत को भी याद किया। उन्होंने कहा कि मेरे बचपन की सबसे हसीन यादें मां के टिफिन से जुड़ी हैं। वो हर रोज सेट पर एक बड़ी सी टोकरी में सबके लिए खाना लेकर जाती थीं। उन्हें अपने हर को-स्टार की पसंद पता होती थी और सभी की पसंद को ध्यान में रखकर हर दिन टिफिन ले जाती थीं। आज भी जब वो दिन याद करती हू तो आंखें नम हो जाती हैं। वो सिर्फ खाना नहीं ले जाती थीं, वो हर दिन उस सेट पर रिश्ते, अपनापन और बिना कहे बहुत सारा प्यार बांटती थीं।
'बा' के किरदार ने उन्हें फिर से जीवनदान दे दिया
‘बा’ के किरदार ने सुधा शिवपुरी को क्या दिया, इस अनुभव को साझा करते हुए रितु ने बताया कि मां ने अपने करियर का सबसे सुनहरा दौर हमारे लिए छोड़ दिया था। कई बार पर्दे के पीछे रहकर उन्होंने सिर्फ एक मां होना चुना। लेकिन जब उन्हें 'बा' का किरदार मिला, तो जैसे किसी ने उन्हें फिर से जीवनदान दे दिया। वो बहुत खुश थीं। वो कहती थीं कि अब मैं फिर से सांस ले रही हूं। उनकी आंखों में चमक लौट आई थी। ऐसा लगता था जैसे बरसों बाद किसी कलाकार को उसकी रूह से जुड़ा किरदार मिल गया हो। वो कैमरे के सामने लौट तो रहीं थीं, लेकिन इस बार वो सिर्फ सुधा शिवपुरी नहीं थीं। वो हर घर की ‘बा’ बनने चली थीं।
'बा' सिर्फ किरदार नहीं, एक एहसास थीं
रितु बताती हैं कि 'बा’ सिर्फ एक किरदार नहीं थीं। वो हर घर की दादी बन गई थीं। लोग उन्हें देखकर रुक जाते थे, उनके पैर छूते थे। बस एक बार ‘बा’ कहना चाहते थे।
शो लौट रहा है, पर मां की जगह कोई नहीं ले सकता
जब शो की वापसी की बात हुई तो रितु के दिल में एक खामोशी सी गूंजने लगी। वो कहती हैं कि आज जब शो फिर से आ रहा है, तो दिल में एक खालीपन है। बा सिर्फ एक किरदार नहीं थीं। वो एक एहसास थीं, जो हर रिश्ते में, हर सीन में और हर मुस्कान में झलकता था। उनकी आंखों में जो ममता थी, वो किसी स्क्रिप्ट से नहीं आती थी, वो उनके भीतर से निकलती थी। आज शो लौट रहा है, कहानियां फिर से जीवित हो रही हैं, पर मां की वो जगह हमेशा खाली रहेगी। क्योंकि मां की जगह कोई नहीं ले सकता।
कुछ किरदार कभी नहीं मिटते
रितु कहती हैं कि इस शो के कुछ नाम सिर्फ किरदार नहीं, बल्कि एक इमोशन बन गए हैं। ‘क्योंकि...’ में कुछ किरदार ऐसे थे जिन्हें वक्त छू नहीं पाया। तुलसी, कोमोलिका और बा। ये नाम नहीं, भावना हैं। इनकी जगह कोई कभी नहीं ले सकता।
सुधा शिवपुरी ने अपने एक्टिंग की शुरुआत थिएटर से की थी और धीरे-धीरे टीवी की दुनिया में पहचान बनाई। उन्होंने 'आ बैल मुझे मार', 'रजनी', 'मिसिंग', 'रिश्ते', 'सरहदें' और 'बंधन' जैसे टीवी शोज में काम किया। साल 2000 में 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' में 'बा' का किरदार उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बन गया। इस रोल ने उन्हें हर घर की दादी बना दिया। 20 मई 2015 को 79 साल की उम्र में, मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर के कारण उनका निधन हो गया।