ज्यादातर लोग यही समझते रहे हैं कि मशहूर निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा के बनाए धारावाहिक महाभारत में पूरी लिखा पढ़ी सिर्फ डॉ. राही मासूम रजा की ही है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि वह दरअसल मशहूर कवि और लेखक पंडित नरेंद्र शर्मा के बताए हुए को ही पटकथा और संवादों में बदल देते थे। पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह ने अपने पिछले संस्मरण में महाभारत की मेकिंग की तमाम अनसुनी बातें अमर उजाला के पाठकों के लिए पंकज शुक्ल को बताईं। अब आगे...
महाभारत की शुरुआत पर राजीव गांधी के अफसरों ने मचा दिया था बवाल, पंडितजी के इस तर्क ने किया निरुत्तर
महाभारत इतना बड़ा काव्य है लेकिन बी आर चोपड़ा ने इसका आरंभ महाराज भरत के उत्तराधिकारी के चयन की दुविधा से किया। लावण्या बताती हैं, “इस शुरूआत को लेकर भी खूब पंगा हो गया। दूरदर्शन के अधिकारी सरकारी अफसर ठहरे उन्हें लगा कि ऐसा न हो कि कल के दिन उनके ऊपर कोई आफत आ जाए। तब राजीव गांधी सरकार केन्द्र में थी और कई मातहतों ने वरिष्ठ अधिकारियों को भड़का दिया कि ये उत्तराधिकारी यानी नेपोटिज्म वाली बात इसमें क्यों है? इसे निकाला जाए और एपीसोड फिर से शूट किया जाए। शायद ये लोग नेहरू परिवार के लिए भी ये बात लागू होने को लेकर भयभीत थे।”
मामला संगीन था और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। पहले ही एपीसोड में अफसरों के सामने घुटने टेक देने का मतलब था कि हर बार हर एपीसोड में ऐसी ही नुक्ताचीनी की जाएगी और निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकार तक सब परेशान हो जाएंगे। पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी बताती हैं, “बी आर अंकल को भरोसा था कि पापाजी इसका हल जरूर निकाल लेंगे। दोनों लोग दिल्ली पहुंचे और दूरदर्शन के कार्यालय में एपीसोड को फिर से देखा गया। पापाजी के सवाल करने पर जब अफसरों ने अपनी आपत्तियां बताईं तो पापाजी इतना ही बोले कि ये सनातन धर्म की बातें हैं और इनमें छेड़छाड़ करने से आपका ही बुरा मंतव्य जनता को दिखेगा। इनके इस तर्क पर दूरदर्शन के अफसरों ने जिद छोड़ दी और इस सीन को धारावाहिक से काटा नहीं गया।”
और, वह क्या मामला था जब बी आर चोपड़ा सुबह सुबह अतिरिक्त भुगतान का चेक लेकर पंडित जी से मिलने घर पहुंच गए थे? लावण्या बताती हैं, “दरअसल वह शांतनु और मत्स्यगंधा के प्रणय बिम्ब का दृश्य था। शूटिंग हो गई। बी आर चोपड़ा और रवि चोपड़ा ने सीन को एडिट भी करा लिया लेकिन सीन खाली खाली सा लग रहा था। इस पर पापाजी ने कहा, ये गीत दे रहा हूं, इसे इस खाली स्थान पर रखिए। अच्छा लगेगा यहां पर। वह गीत था, दिन पर दिन बीत गए...। गाना रिकॉर्ड हुआ। सीन फिर से एडिट हुआ इस बार पापाजी के लिखे गाने के साथ। लोग भावविह्वल हो उठे।” बी आर चोपड़ा की समस्या दूर हो चुकी थी।
लावण्या कहती हैं, “चोपड़ा अंकल दूसरे दिन एक चेक लेकर आए। बोले, इस पर आप धनराशि भर लीजिए। लेकिन, पापाजी परंपरावादी ब्राह्मण रहे जीवन भर। परद्रव्येषु लोष्ठवत् के अनुयायी। चोपड़ा अंकल के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब पापाजी ने ये कहते हुए चेक लौटा दिया कि आपने मुझे जब अनुबंधित किया है तो मेरा फर्ज बनता है कि इस सीरीज की सफलता के लिए भरसक प्रयास करूं। मैं गीतकार भी हूं आप ये जानते हैं। इसे रहने दीजिए।" वह यह भी बताती हैं कि ये किस्सा चोपड़ा अंकल ने उन सबको पापाजी के निधन के बाद सुनाया था। उन्होंने कहा था, “बीसवीं सदी में भी जीवित ऐसे संत कवि को मैं लौटाए हुए चेक को हाथ में थामे अपलक विस्मय से देखता रह गया था।”