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Rohitashv Gour: भयानक गर्मी में छत पर सोने गए रोहिताश्व यूं बचे मरते मरते, संजय मिश्रा, विनीत कुमार बने देवदूत
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Published by: रुपाली रामा जायसवाल
Updated Fri, 07 Jun 2024 05:33 PM IST
सार
मुंबई शहर में अपनी किस्मत चमकाने आने वालों के पास ढेरों कहानियां हैं। ऐसी ही एक कहानी है छोटे परदे के शो ‘भाबी जी घर पर हैं’ में मनमोहन तिवारी का किरदार करने वाले अभिनेता रोहिताश्व गौड़ की।
मुंबई शहर में अपनी किस्मत चमकाने आने वालों के पास ढेरों कहानियां हैं। ऐसी ही एक कहानी है छोटे परदे के शो ‘भाबी जी घर पर हैं’ में मनमोहन तिवारी का किरदार करने वाले अभिनेता रोहिताश्व गौड़ की। रोहिताश्व तब अभिनेता संजय मिश्रा और विनीत कुमार के साथ किराए के मकान में साझीदार बनकर रहते थे और ये मामला तब का ही है।
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रोहिताश्व गौड़
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रोहिताश्व गौड़ बताते हैं, ‘‘ये सन् 1990 की बात है, संजय, विनीत और मैं, मुंबई के सांताक्रूज में किराए के एक अपार्टमेंट में साथ रहते थे। वो एयरपोर्ट के काफी करीब था। भयानक गर्मी वाली एक रात हमने छत पर ही सोने का फैसला किया, क्योंकि वहां मकान मालिक के बेटे का बर्थडे मनाया जा रहा था और हमें गर्मी से राहत भी पानी थी। लेकिन हम इस बात से बेखबर थे कि ऊपर लगे टैंक से पानी गिरा हुआ है।”
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रोहिताश्व गौड़
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बात सिर्फ पानी की होती तो कोई बात न होती, लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। रोहिताश्व बताते हैं, “हवाई जहाजों के जबर्दस्त शोर के बावजूद हमें नींद आ गई। अगली सुबह, मैं एक बेहद ही खौफनाक सच्चाई के साथ जगा। मैं अपनी जगह से हिल भी नहीं पा रहा था। कुछ अनहोनी को भांपते हुए, संजय और विनीत बिना किसी देरी के तुरंत हरकत में आए। उन्होंने मुझे खड़ा करने और चलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन उनकी कोशिश नाकाम रही। वे किसी तरह मुझे लेकर समय पर अस्पताल पहुंच गए।”
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने बताया कि रोहिताश्व की पूरी रीढ़ रातभर पानी के संपर्क में रही, इसलिए वह लगभग लकवाग्रस्त होने की स्थिति में पहुंच चुके थे। रोहिताश्व के मुताबिक, “यदि मेरे दोस्त तत्काल हरकत में नहीं आते तो मैं गंभीर रूप से चोटिल हो सकता था। वह बेहद ही डरावना अनुभव था, लेकिन मैं संजय और विनीत का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने तुरंत कदम उठाया और निस्वार्थ रूप से सहयोग किया।”
रोहिताश्व कहते हैं, ‘‘उस घटना के बाद मेरी रिकवरी का सफर काफी लंबा और तकलीफदेह रहा, इसलिए मैंने मुंबई छोड़कर अपने होमटाउन लौटने का फैसला किया। वहां मैं कई महीनों तक बेड रेस्ट पर रहा। जब मुझमें थोड़ी ताकत आई तो मैंने दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा रिपर्टरी कंपनी में दाखिला ले लिया। 1997 में मुंबई लौटकर अपना सफर शुरू करने का फैसला लेने से पहले मैंने छह साल तक अपनी इस कला को संवारने का काम किया। उस घटना का मुझ पर बेहद ही गहरा प्रभाव पड़ा था। संजय और विनीत ने मेरे मुश्किल समय में जो किया उसके लिए मैं हमेशा ही उनका आभारी रहूंगा। मैं तहे दिल से उनका शुक्रिया करता हूं।”
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