निर्माता जीतेंद्र नारायण सिंह (वसीम रिजवी) और निर्देशक सनोज मिश्रा ने अपनी नई फिल्म 'द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल' 30 अगस्त, 2024 को दुनिया भर में रिलीज करने की योजना बनाई है। इस फिल्म में रोहिंग्या संकट को दिखाया गया है। अभिनेता यजुर मारवाह बड़े पैमाने पर बलात्कार से लेकर दोनों सरकारों और चरमपंथी गुटों द्वारा मानवीय संकट के शोषण तक, भयावह स्थितियों को उजागर कर रहे हैं। 'द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल' पिछले अत्याचारों की ही याद नहीं दिलाती, बल्कि यह बांग्लादेश में व्याप्त वर्तमान अराजकता को भी उजागर करती है।
The Diary of West Bengal: सामूहिक बलात्कार-सरकारी क्रूरता, रोहिंग्या संकट के काले रहस्य को उजागर करती है फिल्म
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फिल्म में एक ऐसे राष्ट्र के बारे में बताया गया है, जो पतन के कगार पर है, जो हिंसक विरोध प्रदर्शनों, राजनीतिक फायदों और क्रूर कार्रवाई से तबाह हो गया है। सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच क्रूर झड़पों में पुलिस अधिकारियों सहित 170 से अधिक लोग मारे गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के अपदस्थ होने से आहत सरकार ने नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नए शासन के तहत कर्फ्यू और इंटरनेट ब्लैकआउट सहित कठोर नियम लागू किए हैं। आलोचकों का कहना है कि यूनुस, जो कभी शांति और माइक्रो फाइनेंस का प्रतीक थे, अब वे पश्चिमी हितों की कठपुतली बन गए हैं, जो ऐसी नीतियां लागू कर रहे हैं, जिसने देश के दुख को और गहरा कर दिया है।
संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने बांग्लादेश के वर्तमान शासन की कठोर प्रतिक्रिया के लिए निंदा की है, जिसके कारण अनगिनत मौतें हुई हैं, लोगों को गायब कर दिया गया है और पत्रकारों और कार्यकर्ताओं सहित हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया है। फिल्म बताती है कि ये कार्रवाइयां सिर्फ संकट में फंसी सरकार के कारण नहीं हो रही, बल्कि यह किसी भी विरोध को दबाने के लिए भयावह एजेंडे का हिस्सा हैं।
यह फिल्म बांग्लादेश के सबसे काले अध्यायों में से एक को सामने लाती है, जहां अवैध आप्रवासन को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों द्वारा एक नाबालिग लड़की के साथ बर्बरतापूर्वक बलात्कार किया गया था। तस्लीमा नसरीन की प्रतिबंधित किताब 'लज्जा' का एक रोंगटे खड़े कर देने वाला किस्सा कि लड़की की मां की भयानक गुहार, 'एक-एक करके जाओ नहीं तो मेरी बेटी मर जाएगी।', एक ऐसे समाज पर क्रूर आरोप लगाने का काम करती है, जो अपने सबसे कमजोर लोगों के प्रति आंखें मूंद लेता है।
जैसे जैसे फिल्म की रिलीज डेट नजदीक आ रही है, 'द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल' न केवल रोहिंग्या दुर्दशा के बारे में, बल्कि कहानी कहने की नैतिकता, फिल्म निर्माताओं की जिम्मेदारियों के बारे में भी तीखी बहस छेड़ रही है, जो इस ओर इशारा कर रही है कि किसकी कहानियां और कैसे बताई जाएं। चाहे इसे साहसिक प्रदर्शन के रूप में देखा जाए या लापरवाह उकसावे के रूप में, यह फिल्म निश्चित रूप से दुनिया भर के दर्शकों पर एक अमिट छाप छोड़ेगी।