‘ये बात जमाना याद रखे मजदूर हैं हम मजबूर नहीं’ किसी शायर की इस शायरी को हिंदी सिनेमा ने एक दौर में फिल्मी पर्दे पर खूब उतारा, मजदूरों के संघर्ष और विजय पर ढेर सारी फिल्में बनाई। आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस पर अगर आप भी मजदूरों के जीवन के संघर्ष और चुनौतियों के बारे में जानना चाहते हैं, उनसे संवेदना रखते हैं तो बॉलीवुड की इन फिल्मों को जरूर देखें। हिंदी सिनेमा ने शुरू से ही मजदूरों के जीवन की जमीनी हकीकत से लोगों को फिल्मों के माध्यम से रूबरू कराया है। आज हम ऐसी ही पांच फिल्मों के बारे में जानेंगे, जो मजदूरों के जीवन शैली और संघर्षों पर बनी हैं।
Labour Day: मजदूर दिवस पर जरूर देखें ये फिल्में, संघर्ष देख आंखों से नहीं रुकेंगे आंसू
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दो बीघा जमीन
साल 1953 में बिमल रॉय की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ ने सिनेमाघरों में दस्तक दी। फिल्म किसानों के शोषण और उनके संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म में एक किसान शंभू (बलराज साहनी) की कहानी को दिखाया गया है। शंभू की जमीन पर गांव के हरनाम सिंह की नजर होती है। शंभू अपनी जमीन देने से इनकार कर देता है और इस बात से नाराज हरनाम उससे अपना कर्ज मांगने लगता है। मामला कोर्ट में चला जाता है। फिल्म में एक किसान के संघर्ष का बहुत ही मार्मिक चित्रण किया गया है।
दीवार
अभिनेता अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘दीवार’ भी मजदूरों के हक की लड़ाई पर बनी है। फिल्म में अमिताभ के पिता आनंद वर्मा (सत्येन कप्पू) ने मजदूरों के हक के लिए फैक्ट्री मालिकों से लड़ाई लड़नी शुरू कर दी, जिसके बाद फैक्ट्री मालिक उसे जान से मारने की धमकी दी। डरकर वह घर छोड़कर भाग गया और यहीं से शुरू होती है अमिताभ (विजय) और शशि कपूर (रवि) के संघर्ष की कहानी।
मजदूर
दिलीप कुमार की फिल्म ‘मजदूर’ मजदूरों के हक की लड़ाई की कहानी है। दरअसल, मिल मालिक सिन्हा (नजीर हुसैन) एक कपड़ा मिल चलाते हैं, और अपने कर्मचारियों को अच्छा वेतन और बोनस देकर अपना मुनाफा साझा करते हैं। उनकी मौत के बाद उनके बेटे ने उनका कामकाज संभाल लिया और अधिक मुनाफा कमाने के लिए मजदूरों का शोषण करने लगा। इस बात से नाराज दीनानाथ सक्सेना (दिलीप कुमार) और मजदूरों से उसका विवाद हो जाता है। फिर दीनानाथ का मजदूरों के लिए संघर्ष करने की कहानी बड़े ही रोचक ढंग से आगे बढ़ती है।
पैगाम
साल 1959 में फिल्म ‘पैगाम’ रिलीज हुई। फिल्म में दिलीप कुमार, राजकुमार और वैजयंती माला ने मुख्य भूमिका निभाई है। फिल्म एक विधवा मां और उसके दो बेटों राम और रतन के इर्द-गिर्द घूमती है। रतन इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके शहर से आता है तो उसे मिल में नौकरी मिल जाती है। रतन ने मिल में मजदूरों के साथ सेवकराम के द्वारा किए जा रहे घोटालों का पता लगा लिया। हालात बद से बदतर हो जाते हैं क्योंकि सेवकराम के साथ रतन का भाई राम खड़ा हो जाता है।