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Pareeksha Review: प्रकाश झा ने इस बार खुद दी सिनेमा की परीक्षा, बताया असली स्टार अब भी कहानी ही है

Thu, 06 Aug 2020 06:32 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Thu, 06 Aug 2020 06:32 PM IST
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pareeksha zee5 review A Strong Message In Prakash Jha Film Starrer Adil Hussain Priyanka Bose
परीक्षा रिव्यू - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

Movie Review: परीक्षा (Pareeksha)


कलाकार: आदिल हुसैन, प्रियंका बोस, शुभम और संजय सूरी आदि
लेखक-निर्देशक: प्रकाश झा
ओटीटी: जी5
रेटिंग: ****


हिंदी सिनेमा में प्रकाश झा के दो रूप हैं। एक वह जिसका मन कटरीना कैफ, रणबीर कपूर, प्रियंका चोपड़ा और अजय देवगन जैसे सितारों के साथ काम करने के लिए मचलता है और दूसरा वह जो सीधे मन को छू जाने वाली कहानियों को लेकर इतराता है। मुझे शुरू से बाद वाला प्रकाश झा भाता है। मेट्रो शहरों के दर्शकों की गिनती इनमें तब जुड़ती है जब वह तेजाब वाली माधुरी दीक्षित के साथ 'मृत्युदंड' बनाता है या फिर दो मोटरसाइकिलों पर एक साथ खड़े होकर एंट्री करने वाले अजय देवगन को लेकर 'गंगाजल' बनाता है।

प्रकाश झा का नाम हिंदी सिनेमा का एक रूपक भी है और एक कड़वी सच्चाई भी। अच्छा है कि इस समय सारी फिल्में ओटीटी पर ही रिलीज हो रही हैं। प्रकाश झा की नई फिल्म 'परीक्षा' समाज की सच्चाई है। एक ऐसी फिल्म जो सीधे आपके दिल को छू जाएगी, आंखों की कोरों पर कुछ आंसू अटका जाएगी और बीच में बोलने की कोशिश करेंगे तो गले में आवाज भी रूंध जाएगी।

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परीक्षा - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म शुरू होने पर जो कलाकार रिक्शा चलाता दिखता है वह आदिल हुसैन है। असम से निकलकर दिल्ली के एनएसडी और लंदन के ड्रामा स्टूडियो तक पहुंचने से पहले इस इंसान ने फिल्मी सितारों की मिमिक्री खूब की है। लेकिन, किसी रिक्शा वाले की मिमिक्री करना आसान नहीं है और आदिल ने यहां वह करके दिखाया है। 'दामुल', 'पार', 'सारांश', 'अर्धसत्य' और 'आक्रोश' जैसी फिल्मों जितनी लंबी एक लाइन अदाकारी की आदिल ने यहां खींची है। नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स की ज्यूरी ने ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मों को अगले साल के पुरस्कारों में शामिल किया तो आदिल हुसैन बेस्ट एक्टर के दमदार दावेदार साबित होंगे। आप कितनी भी बढ़िया साइकिल, स्कूटर, कार या हवाई जहाज चला लेते हों लेकिन रिक्शे का हैंडिल पकड़कर सौ मीटर भी उसे चला लेना कमाल होता है। आदिल ने यहां सात-आठ बच्चों को बिठाकर रिक्शा खींचा है। किसी किरदार में उतर जाने की ये मेहनत ही इस फिल्म की जान है। बुच्ची हवालात में हो, स्कूल में हो, बीवी संग हो या बच्चे के साथ हो, बुच्ची ही लगता है।

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परीक्षा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

बुच्ची अंबेडकर कॉलोनी में रहते हैं और आसपास के मोहल्ले के लोगों को अंग्रेजी स्कूल ले जाते हैं। उनका अपना बच्चा बुलबुल सरकारी स्कूल में पढ़ता है। बुच्ची का ख्वाब है कि उनका बेटा भी अंग्रेजी स्कूल में पढ़े। एक दिन किसी सवारी के छूटे हजारों रुपयों की मदद से वह अपने बेटे का अंग्रेजी स्कूल में दाखिला करा भी देते हैं। लेकिन, फिर शुरू होता है वह चक्र जिसमें फंसने का दर्द हर वो मां बाप जानता है जिसकी तनख्वाह सीमित है और स्कूल के खर्चे असीमित। बुच्ची चोरी करने लगता है और यहां कहानी में एंट्री होती है असल जिंदगी से प्रेरित एक किरदार एसएसपी रांची की।

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परीक्षा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

समीक्षा के बीच का यहां एक क्षेपक भी बताते चलते हैं। बिहार की सुपरहिट कोचिंग सुपर 30 की नींव अकेले आनंद कुमार ने नहीं डाली। उसमें उतना ही पसीना एक आईपीएस अफसर अभयानंद का भी लगा, जो बाद में बिहार के पुलिस महानिदेशक बनकर रिटायर हुए। प्रचार से दूर रहने वाले अभयानंद से प्रेरित ये किरदार फिल्म में संजय सूरी ने किया है। संजय सूरी भी जैसे जैसे उम्रदराज हो रहे हैं, उनके भीतर का अभिनेता उतना ही और जवान होता जा रहा है। उनके बोलने का लहजा, चेहरे पर मौजूद तेज और उनका इलाके के विधायक से पटरी न बिठा पाना बिल्कुल असली लगता है। और, असली जैसा ही लगता है फिल्म में राधिका का किरदार करने वाली प्रियंका बोस का अभिनय। एक रिक्शेवाली की बर्तनों की बफिंग करने वाली मजदूर पत्नी के किरदार में प्रियंका ने स्मिता पाटिल, नंदिता दास और उषा जाधव को छुआ है। काम बुलबुल बने शुभम का भी अच्छा है।

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परीक्षा रिव्यू - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म परीक्षा कई स्तरों पर दर्शकों की भी परीक्षा लेती चलती है। देश भर में बच्चों की असमान शिक्षा प्रणाली उन सबका दिल कभी न कभी जरूर दुखाती है, जब पढ़ने लिखने के बाद भी पता ये चलता है कि देश में डिग्री नहीं अंग्रेजी बोलना आना ज्यादा जरूरी है। गांव, कस्बे और छोटे शहर का बच्चा जब कक्षा छह से कक्षा 12 तक की पढ़ाई सिर्फ पढ़ने के लिए कर रहा होता है। शहर का सीबीएसई बोर्ड में पढ़ने वाला बच्चा साथ में कंपटीशन की तैयारी भी कर रहा होता है। दोनों का कहीं कोई मुकाबला ही नहीं है। पहला कक्षा छह में एबीसीडी सीखता है, दूसरा कक्षा छह में अंग्रेजी में डिबेट कर रहा होता है।

फिल्म 'परीक्षा' रिलीज भी बहुत सही मौके पर हुई है। देश में एक समान शिक्षा नीति की जरूरत बरसों से रही है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने राजधानी के निजी स्कूलों को अच्छी टक्कर देने की परंपरा बनाई है, ऐसे सरकारी स्कूल देश के कोने कोने में होने चाहिए, ताकि परीक्षा सिर्फ बच्चों और अभिभावकों की ही न चलती रहे, कभी तो इम्तिहान सिस्टम का भी होना चाहिए। और, अगर जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा पर खर्च होना तय होता है तो फिर होना भी चाहिए। फिल्म 'परीक्षा' को अमर उजाला रिव्यू में मिलते हैं चार स्टार। 

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