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Sangram Singh: बचपन में था मौत का साया, जूते फटे और जेब खाली थी; आज लाखों लोग लेते हैं इनसे प्रेरणा

Thu, 07 Aug 2025 12:32 PM IST
Kiran Jain किरण जैन
Updated Thu, 07 Aug 2025 12:32 PM IST
सार

Sangram Singh Interview: संग्राम सिंह की जिंदगी एक ऐसे इंसान की कहानी है, जो बचपन में ठीक से चल भी नहीं पाता था, लेकिन अपनी मेहनत से वर्ल्ड चैंपियन बन गया। उन्होंने गरीबी, बीमारी और कई मुश्किलों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में संग्राम सिंह ने अपने सफर के कई किस्से साझा किए। पढ़िए बातचीत के प्रमुख अंश:

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Wrestler And Actor Sangram Singh Talk About His Early Days Struggle
संग्राम सिंह - फोटो : इंस्टाग्राम@sangramsingh_wrestler

संग्राम सिंह आज एक नामी रेसलर की पहचान रखते हैं। साथ ही वह 'बिग बॉस' और 'सर्वाइवर इंडिया' जैसे शोज के जरिए भी दर्शकों का दिल जीत चुके हैं। इसके अलावा फिल्मी दुनिया का सफर भी उन्होंने तय किया है। अपने शुरुआती संघर्ष, जज्बे की कहानी को संग्राम सिंह अमर उजाला डिजिटल के साथ शेयर कर रहे हैं। 

अगर वो मासूम बच्चा मर गया, तो ये नाम-दौलत किस काम की?
अपने शुरुआती संघर्ष के बारे में बताते हुए संग्राम सिंह भावुक भी होते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं एक बेहद साधारण और जमीन से जुड़े परिवार से आता हूं। हमारे पास जूते तो होते थे, लेकिन उनमें फीते नहीं होते थे। गांव में साइकिल 50 पैसे में मिलती थी, लेकिन कई बार वो पैसे भी नहीं होते थे। जब किसी और के बचे हुए आखिरी पांच मिनट मिलते, तब उस साइकिल पर बैठकर लगता था जैसे पूरी दुनिया मेरी है। आज भी मैं वही सोचता हूं। अगर वो मासूम बच्चा मर गया, तो ये नाम-दौलत किस काम की? असली खुशी उस बचपन को जिंदा रखने में है।' 

Wrestler And Actor Sangram Singh Talk About His Early Days Struggle
संग्राम सिंह - फोटो : इंस्टाग्राम@sangramsingh_wrestler

मुझे र्यूमैटिक अर्थराइटिस की बीमारी थी, जो लगभग लाइलाज मानी जाती है
संग्राम सिंह बताते हैं कि उन्हें बचपन में एक गंभीर बीमारी थी। वह कहते हैं, ‘तीन-साढे़ तीन साल की उम्र में मेरे पैरों में ऐसा दर्द शुरू हुआ कि मैं अपने हाथ से मुंह तक नहीं धो पाता था। कच्चा घर था, कमजोर सेहत थी, पेट में कीड़े थे। मां दवाइयां देती थीं, पर असर नहीं होता था। डॉक्टरों ने कहा था कि मैं ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगा और जी भी गया तो चल-फिर नहीं सकूंगा। बीमारी थी र्यूमैटिक अर्थराइटिस, जो लगभग लाइलाज मानी जाती है। लेकिन मेरी मां ने हार नहीं मानी। डॉक्टरों ने मना किया कि इस बच्चे की मालिश मत करो, हड्डियां टूट सकती हैं। लेकिन मां दिन में पंद्रह बार मालिश करती थीं। बिना थके, बिना डिगे। उनका स्पर्श, उनका विश्वास ही मेरी असली दवा बना। मैंने खुद से लड़ाई लड़ी, अपने शरीर से, अपनी किस्मत से और धीरे-धीरे खुद को खड़ा किया।

मां कहती थीं, तू देश का नाम रोशन करेगा
आगे चलकर संग्राम ने कुश्ती में करियर बनाने का सोचा। वह कहते हैं, ‘जब पहली बार अखाड़े में गया, लोग हंसे। बोले, पहले सीधा चलना तो सीख। रिश्तेदारों ने ताने मारे कि ये लड़का किसी काम का नहीं है। लेकिन मां ने कभी भरोसा नहीं खोया। मैंने अकेले ही रेसलिंग की नकल की, गिरा, उठा, बार-बार खुद को साबित किया। मां कहती थीं, तू देश का नाम रोशन करेगा। मैंने अपनी पहली कुश्ती हारी, मां ने तवे से मेरे कंधे की सिकाई की। वही हमारी फिजियोथेरेपी थी। उन्होंने हर रात मुझे दारा सिंह कहा और उस विश्वास ने मुझे कभी टूटने नहीं दिया।’ 

Wrestler And Actor Sangram Singh Talk About His Early Days Struggle
संग्राम सिंह - फोटो : इंस्टाग्राम@sangramsingh_wrestler

मेरे पास टैलेंट नहीं था, लेकिन मेहनत थी
संग्राम सिंह आगे कहते हैं, ‘हर जगह से रिजेक्शन मिला, कुश्ती में, फिल्मों में, जिंदगी में। लेकिन मेहनत कभी नहीं छोड़ी। मुझे लगता है कि मेरे पास टैलेंट नहीं है, लेकिन मेहनत है। और मेहनत, टैलेंट से बड़ी होती है। जो लोग मजाक उड़ाते थे, वही लोग बाद में मेरी पीआर टीम बन गए। संग्राम कहते हैं, ‘गांव में जब रेसलिंग शुरू की तो रिश्तेदार बोले, इससे क्या होगा? लेकिन जब जीत मिलनी लगी, तो वही लोग बैलगाड़ी पर बैठकर दूध-घी लेकर मुझे देखने आए। मैंने कुश्ती नाम और शोहरत के लिए नहीं की थी, इज्जत के लिए की थी और वही इज्जत मेरा जुनून बन गई।’

सिस्टम के भीतर रहते हुए भी आंखें खुलीं
आगे चलकर संग्राम सिंह को पुलिस की नौकरी भी मिली। वहां उन्होंने बहुत कुछ सीखा लेकिन सिस्टम के खिलाफ आवाज भी उठाई। वह बताते हैं, ‘जब पुलिस की नौकरी मिली तो मैं जनरल कैटेगरी से खेल कोटे से भर्ती हुआ था। किरण बेदी जी से ट्रेनिंग ली, बहुत कुछ सीखा। लेकिन सिस्टम के भीतर रहकर बहुत कुछ ऐसा देखा जो आंखें खोल देता है। जैसे टॉयलेट तक नहीं होता, वो धूल खाते हैं। बाद में सस्पेंड भी हुआ, लेकिन उस सस्पेंशन ने मुझे और रास्ते दिए।’  

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Wrestler And Actor Sangram Singh Talk About His Early Days Struggle
संग्राम सिंह - फोटो : इंस्टाग्राम@sangramsingh_wrestler
'मैंने रोटी पर चटनी खाई है, लेकिन कभी शिकायत नहीं की'
संग्राम ने अपने कुश्ती के दिनों में बहुत संघर्ष किया। वह कहते हैं, ‘मैंने रोटी पर चटनी खाई है, प्याज रखकर खाया है, फटे हुए कपड़ों में सर्दी-गर्मी झेली है। शिकायतें कभी नहीं कीं, क्योंकि सपना बड़ा था। देश के लिए खेलना था।’  
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Wrestler And Actor Sangram Singh Talk About His Early Days Struggle
संग्राम सिंह - फोटो : इंस्टाग्राम@sangramsingh_wrestler
मां आज भी कहती हैं कि तू लड़का नहीं, तू लड़ाई है
आखिर में संग्राम फिर अपनी मां का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं, ‘आज जब लोग कहते हैं कि मैंने बहुत कुछ हासिल किया है, तो मैं मुस्कुरा देता हूं। क्योंकि मुझे पता है, असली जीत मंच पर नहीं होती, मंच तक पहुंचने की लड़ाई में होती है। मेरी मां आज भी कहती हैं कि तू लड़का नहीं, तू लड़ाई है। मैं हर दिन उस लड़ाई को जिंदा रखता हूं। मैं उस लड़ाई को अपनी जड़ों के लिए जिंदा रखता हूं, अपनी सच्चाई के लिए जिंदा रखता हूं। उस बच्चे के लिए जिंदा रखता हूं जो कभी किसी और के बचे हुए पांच मिनट की साइकिल पर बैठकर अपनी पूरी दुनिया ढूंढ लिया करता था।’  

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