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Shiv Sena Crisis: क्या बिन ठाकरे होगी शिवसेना? उद्धव के हाथ से सरकार ही नहीं पार्टी भी जाने का खतरा

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 23 Jun 2022 10:14 PM IST
सार

यह सवाल अभी भी सामने हैं कि क्या शिवसेना के दो-तिहाई विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे पार्टी पर अपना दावा ठोक सकते हैं? अगर शिवसेना टूटती है तो उसका तीर-कमान का चुनाव चिह्न किस धड़े के पास रहेगा? इसके अलावा पार्टी टूटने पर असली शिवसेना कौन है, इसका फैसला कौन करेगा? 

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Shiv Sena Crisis Maha Vikas Aghadi Maharashtra Government in danger can Uddhav Thackeray lose right on Party to Eknath Shinde and rebel MLAs explained
शिवसेना का पूरा गणित। - फोटो : अमर उजाला/सोनू कुमार
महाराष्ट्र में सियासी सरगर्मियां लगातार तेज होती जा रही हैं। जहां उद्धव ठाकरे और उनके समर्थक नेता बागी विधायकों से सामने आकर इस्तीफा मांगने की अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर एकनाथ शिंदे का कहना है कि उद्धव के साथ वाली शिवसेना अब पुरानी पार्टी नहीं रह गई है। शिंदे ने दावा किया है कि निर्दलीय और शिवसेना के 42 से ज्यादा विधायक उनके साथ हैं। यानी असली शिवसेना ही उनके साथ है। इतना ही नहीं शिंदे ने एक दिन पहले ही महाराष्ट्र विधानसभा के डिप्टी स्पीकर को 34 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी भेजी, जिसमें शिवसेना के विधायक दल के चीफ व्हिप को हटाने की बात कही गई है। 


शिंदे के इस कदम को शिवसेना प्रमुख और सीएम उद्धव ठाकरे के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल, पार्टी के मुख्य व्हिप को हटाने का फैसला आमतौर पर दल के प्रमुख का ही होता है। अपने नेताओं के इतनी बड़ी संख्या में टूटने और उनके बगावती तेवर देखने के बाद उद्धव ठाकरे ने खुद मंगलवार को सीएम आवास छोड़ दिया और अपने घर मातोश्री लौट गए। उन्होंने बागी विधायकों से इस्तीफा तैयार होने की बात भी कही। 

ऐसे में यह सवाल अभी भी सामने हैं कि क्या शिवसेना के दो-तिहाई विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे पार्टी पर अपना दावा ठोक सकते हैं? अगर शिवसेना टूटती है तो उसका तीर-कमान का निशान किस धड़े के पास रहेगा? इसके अलावा पार्टी टूटने पर असली शिवसेना कौन है, इसका फैसला कौन करेगा? 
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Shiv Sena Crisis Maha Vikas Aghadi Maharashtra Government in danger can Uddhav Thackeray lose right on Party to Eknath Shinde and rebel MLAs explained
एकनाथ शिंदे - फोटो : ANI
क्या शिवसेना पर दावा ठोक सकते हैं एकनाथ शिंदे?
एकनाथ शिंदे के साथ गुवाहाटी के होटल में शुरुआत में विधायकों की संख्या 34 थी। हालांकि, मुंबई से बुधवार और गुरुवार को कुछ और विधायक गुवाहाटी पहुंच गए। शिंदे गुट की ओर से कहा गया है कि उसके पास 40 शिवसेना के विधायकों का समर्थन है, जबकि छह से ज्यादा निर्दलीय भी उनके साथ हैं। इस धड़े ने गुवाहाटी में रुके 42 विधायकों की एक तस्वीर भी जारी की थी, जिसमें 35 शिवसेना के एमएलए शामिल थे। यानी शिंदे के पार्टी तोड़ने और दल-बदल कानून से बचने के दावे से महज दो कम। ऐसे में माना जा सकता है कि शिंदे के पास विधायकों का जरूरी समर्थन मौजूद है।
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शिवसेना - फोटो : ANI
क्या शिवसेना को तोड़ने के बाद उसका चुनाव चिह्न भी हथिया सकते हैं शिंदे?
1968 का इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर चुनाव आयोग (ईसी) को किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर फैसला लेने की छूट देता है। इसी नियम के तहत ईसी किसी पार्टी का चुनाव चिह्न तय करता है और इसके बंटवारे पर भी फैसला सुनाता है। 

अगर किसी रजिस्टर्ड और मान्यता प्राप्त पार्टी के दो धड़े बन जाते हैं तो इलेक्शन सिंबल ऑर्डर का पैरा 15 कहता है कि चुनाव चिह्न किसे मिलेगा, इसका फैसला सुनाने के लिए निर्वाचन आयोग पूरी तरह स्वतंत्र है। यह भी हो सकता है कि ईसी चुनाव चिह्न किसी को न दे। 

इस नियम के मुताबिक, "चुनाव आयोग एक ही पार्टी में दो विपक्षी धड़ों की बात को पूरी तरह सुनेगा और सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करेगा। इसके अलावा ईसी दोनों धड़ों के प्रतिनिधियों को भी सुनेगा। जरूरत पड़ी तो आयोग तीसरे पक्ष को भी सुन सकता है और फिर चुनाव चिह्न किसी एक धड़े को देने या न देने से जुड़ा फैसला सुना सकता है।" इस नियम की सबसे खास बात यह है कि आयोग का फैसला सभी पक्षों के लिए सर्वमान्य होगा।
 
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चुनाव आयोग - फोटो : फाइल फोटो
ठाकरे या शिंदे गुट, चुनाव आयोग किसे दे सकता है चुनाव चिह्न?
किसी विवाद की स्थिति में चुनाव आयोग सबसे पहले दोनों धड़ों के समर्थन को देखेगा। पार्टी संगठन और विधायक दल से किस धड़े को ज्यादा समर्थन है। 

इसके बाद आयोग उस राजनीतिक दल की उच्च समितियों और निर्णय लेने वाले संस्थानों की जानकारी जुटाता है और इसकी पुष्टि करता है कि आखिर पार्टी के दोनों धड़ों को कितने नेताओं का समर्थन हासिल है। आखिरकार ईसी इन पक्षों के समर्थक सांसदों और विधायकों की जानकारी लेता है। 

पार्टी टूटने के ऐसे हालिया मामलों में चुनाव आयोग ने अपने फैसले पार्टी के पदाधिकारियों और चुने हुए नेताओं के आधार पर दिए हैं। अगर किसी कारण से एक संगठन में दो धड़ों के समर्थन की तस्वीर साफ नहीं होती है तो आयोग ज्यादा सांसदों और विधायकों के समर्थन वाले गुट को ही उस दल का असली अधिकारी मानता है। 
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हालांकि, चुनाव आयोग के सामने भी ऐसी ही जटिल स्थिति पैदा हो चुकी है। दरअसल, 1987 में जब तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन की मृत्यु हुई थी। तब पार्टी का एक धड़ा एमजीआर की पत्नी जानकी के साथ था। वहीं दूसरा धड़ा जे जयललिता के साथ था। मजेदार बात यह है कि जहां जानकी को अधिकतर विधायकों और सांसदों का समर्थन था तो वहीं जयललिता को पार्टी सदस्यों और कैडरों की ओर से सपोर्ट मिला था। हालांकि, ईसी को इस मामले में फैसला नहीं लेना पड़ा था, क्योंकि बाद में दोनों ही धड़ों ने समझौता कर लिया था।
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