अप्रैल का महीना, मौसम में तेजी से हो रहे बदलाव का समय होता है। ये सर्दी से गर्मी की ले जाने वाला मौसम होता है। तापमान तेजी से बढ़ रहा होता है, हवा में नमी कम हो जाती है और वातावरण में धूल-मिट्टी तथा परागकणों की मात्रा बढ़ जाती है। तापमान में उतार-चढ़ाव और हवा में धूल-परागकणों के कारण इस मौसम को सेहत के लिए कई तरह से मुश्किलें बढ़ाने वाला माना जाता है। यही वजह है कि अप्रैल के महीने में एलर्जी, वायरल संक्रमण जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं।
Allergy Relief: मौसम बदला नहीं और शुरू हो गई खांसी-छींक? सीजनल एलर्जी से बचने के लिए क्या उपाय करें
Allergy Se Kaise Bache: अप्रैल का महीना सर्दी से गर्मी की ओर संक्रमण का दौर माना जाता है। इसी दौरान वायरल संक्रमण, सर्दी-जुकाम, गले में खराश और त्वचा संबंधी समस्याएं भी अधिक देखी जाती हैं।
एलर्जी का खतरा और इसके लक्षण
मार्च और अप्रैल के शुरुआती महीनों में पेड़-पौधों से सूक्ष्म परागकणों की मात्रा हवा में काफी बढ़ जाती है। ये शरीर में प्रवेश करके एलर्जिक राइनाइटिस, छींक, नाक बहने, आंखों में एलर्जी और पानी आना जैसी समस्याएं पैदा करते हैं।
- तापमान बढ़ने से डस्ट माइट्स की संख्या भी बढ़ती है, जो अस्थमा और त्वचा एलर्जी का कारण बन सकते हैं।
- बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्थमा या साइनस की समस्या से जूझ रहे लोगों में इस दौरान जोखिम अधिक रहता है।
एलर्जी तब होती है जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली किसी सामान्य और हानिरहित पदार्थ को भी खतरनाक समझकर उस पर अत्यधिक प्रतिक्रिया देती है। पोलन, धूल, पालतू जानवरों के बाल, कुछ खाद्य पदार्थ या दवाओं से आपको एलर्जी हो सकती है।
इस मौसम में परागकण और फफूंद हवा में फैले होते हैं जो लोगों को एलर्जी की चपेट में ले रहे हैं। इस स्थिति में दवाएं राहत तो देती हैं, पर सही आहार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए इस मौसम में खान-पान पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
पानी और हाइड्रेशन
सबसे आसान और प्रभावी उपाय है- खूब पानी पीते रहना। दिन में 8-10 गिलास पानी शरीर को हाइड्रेट रखता है, जिससे नाक और गले की झिल्लियां नम रहती हैं और परागकण आसानी से बाहर निकल जाते हैं। डिहाइड्रेशन होने पर हिस्टामिन का स्तर बढ़ जाता है, जो एलर्जी के मुख्य रसायन हैं।
गुनगुना पानी, अदरक-तुलसी या हल्दी वाली चाय और भी बेहतर काम करती है। अदरक का जिंजेरॉल तत्व सूजन कम करता है, जबकि हल्दी और तुलसी एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर हैं।
प्राकृतिक एंटी-हिस्टामिन लें
विटामिन सी हिस्टामिन को तोड़ने में मदद करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत कर एलर्जी के लक्षणों को कम करने में मददगार है। आंवला विटामिन सी का सबसे शक्तिशाली स्रोत है। एक आंवले में संतरे से 20 गुना ज्यादा विटामिन सी होता है। इसके अतिरिक्त नींबू, कीवी, शिमला मिर्च, टमाटर और ब्रोकली को आहार का हिस्सा बनाएं।
ओमेगा-3 और प्रोबायोटिक्स
शोध बताते हैं कि बचपन से ओमेगा-3 लेने वाले बच्चों में एलर्जी और अस्थमा का जोखिम कम होता है। शाकाहारी स्रोतों में अखरोट, अलसी के बीज और सरसों का तेल प्रमुख हैं। वहीं प्रोबायोटिक्स आंत को स्वस्थ रखते हैं, जहां इम्यून सिस्टम का बड़ा हिस्सा मौजूद होता है। दही, छाछ जैसे फर्मेंटेड फूड्स इसमें शामिल हैं।
शहद करेगा मदद
स्थानीय शहद में आस-पास के पौधों के सूक्ष्म परागकण होते हैं। ऐसे में रोज थोड़ी मात्रा में शहद लेने से शरीर धीरे-धीरे इन परागकणों के प्रति अभ्यस्त हो जाता है। इम्यूनोलॉजी में इसे ‘डिसेंसिटाइजेशन’ कहा जाता है, जो एलर्जी इम्यूनोथेरेपी के समान सिद्धांत पर आधारित है। मगर एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शहद न दें।
एलर्जी के दौरान कुछ खाद्य पदार्थ लक्षणों को बढ़ाते हैं, जैसे- शराब और रेड वाइन। वहीं बहुत मसालेदार और पैकेज्ड-प्रोसेस्ड भोजन शरीर में सूजन बढ़ाते हैं। ज्यादा चाय-कॉफी लेने से डिहाइड्रेशन हो सकता है। ठंडे पेय, आइसक्रीम तथा कुछ कच्चे फल-सब्जियां भी एलर्जी के लक्षणों को उभार सकती हैं। इसलिए लक्षणों के गंभीर होने से पहले ही डॉक्टर से सलाह लें।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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