सोचने-समझने की क्षमता में कमी, समय के साथ कमजोर होती याददाश्त और पहले की तरह से अब सही तरीके से निर्णय न ले पाना अल्जाइमर रोग का संकेत हो सकता है। वैसे तो ये बीमारी आमतौर पर 60 साल के बाद वाले लोगों में होती है, हालांकि कई मामलों में इसे 50 से कम उम्र वालों में भी बढ़ता देखा जा रहा है। अल्जाइमर रोग डिमेंशिया का सबसे आम रूप है, जिसके कारण धीरे-धीरे दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचने लगता है।
Alzheimer's Disease: आपको भी सता रहा है दिमाग की बीमारी का डर? वैज्ञानिकों ने बताए पता लगाने के दो कारगर तरीके
Alzheimer's Disease Risk Factors: अल्जाइमर रोग, डिमेंशिया का प्रमुख कारण है, जिसमें दिमाग में असामान्य प्रोटीन (एमाइलॉइड और टाउ) जमा हो जाते हैं, जिससे न्यूरॉन्स नष्ट होने लगते हैं। इसके कारण व्यक्ति चीजें भूलने लगता है, परिचित लोगों को पहचानने में कठिनाई होती है। कहीं आपको भी तो इस बीमारी का खतरा नहीं है?
अल्जाइमर रोग और इसका बढ़ता खतरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अल्जाइमर केवल याददाश्त ही नहीं बल्कि व्यक्ति के व्यवहार, भाषा और दैनिक कार्य करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है। भारत में भी इसके मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है, जिससे यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है।
दिमाग में असामान्य प्रोटीन (एमाइलॉइड और टाउ) के जमा होने की वजह से न्यूरॉन्स नष्ट होने लगते हैं। इसके कारण व्यक्ति चीजें भूलने लगता है, परिचित लोगों को पहचानने में भी कठिनाई होती है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
- अल्जाइमर रोग का पता लगाने लिए वैज्ञानिकों ने एक खास ब्लड टेस्ट के बारे में जानकारी दी है, जिसकी मदद से 94.5% तक की एक्यूरेसी से इस रोग का निदान किया जा सकता है।
- वहीं अल्जाइमर्स सोसाइटी के विशेषज्ञों ने एक खास तरह के लक्षणों को चेक करने वाले कैलकुलेटर के बारे में जानकारी दी है, जो किसी व्यक्ति में इस दिमागी बीमारी का आसानी से पता लगाने में सहायक हो सकती है।
ब्लड टेस्ट से चल सकेगा अल्जाइमर रोग का खतरा
अल्जाइमर रोग का समय रहते पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों की टीम ने एक खास तरह के ब्लड टेस्ट के बारे में बताया है जिसकी मदद से इस बीमारी का करीब 95% सटीकता से पता लगाया जा सकता है। जर्नल ऑफ न्यूरोलॉजी में इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया गया है।
- वैज्ञानिकों ने बताया कि खून में मौजूद p-tau217 नाम का प्रोटीन अल्जाइमर बीमारी का सही पता लगाने में मदद कर सकता है।
- अध्ययन में स्पेन के शोधकर्ताओं ने जांच की कि खून पर आधारित बायोमार्कर (जैसे कि p-tau217 प्रोटीन) अल्जाइमर के क्लिनिकल डायग्नोसिस और न्यूरोलॉजिस्ट के अपने डायग्नोसिस पर भरोसे, दोनों से कितने असरदार हो सकते हैं?
- 50 साल और उससे ज्यादा उम्र के करीब 200 मरीजों के फॉलोअप के बाद पाया गया कि p-tau217 का पता लगाने वाले सिंपल ब्लड टेस्ट से रूटीन क्लिनिकल प्रैक्टिस में इस बीमारी का समय रहते पता लगाने में विशेष मदद मिल सकती है।
- क्लिनिकल टेस्ट में डॉक्टरों ने 75.5% मामलों में अल्जाइमर का सही डायग्नोसिस किया, हालांकि जब ब्लड टेस्ट के नतीजों को शामिल किया जाता है, तो डायग्नोस्टिक की एक्यूरेसी बढ़कर 94.5% हो गई।
डॉक्टरो ने कहा, फॉस्फोराइलेटेड टाऊ एक (p-tau217) प्रोटीन है जो दिमाग में प्राकृतिक रूप से होता है और न्यूरॉन्स यानी सिग्नल ले जाने वाली सेल्स को व्यव्स्थित और स्वस्थ रखने में मदद करता है। दिक्कत तब शुरू होती है जब यह प्रोटीन अनियंत्रित तरीके से बढ़ने लगता है और आपस में चिपक जाता है, जिससे दिमाग की सेल्स के बीच संचार में रुकावट आती है।
समय के साथ, यह दिमाग के काम पर असर डाल सकता है और अल्जाइमर जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव समस्याएं पैदा कर सकता है।
लक्षणों का पता लगाने वाला चेकलिस्ट
अल्जाइमर रोग का पता लगाने के दूसरे तरीके में अल्जाइमर्स सोसाइटी के वैज्ञानिकों ने एक खास प्रखार के सिम्टम चेकर यानी लक्षणों का पता लगाने वाले कैलकुलेटर के बारे में बताया है। विशेषज्ञों ने कहा, अपने डॉक्टर से बात करने से पहले लक्षणों को नोट करने में ये चेकलिस्ट आपकी मदद कर सकता है जिससे समस्या के निदान में मदद मिल सकती है। इसे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से प्रयोग में लाया जा सकता है।
अपने जोखिमों को जानने के लिए इस चेकलिस्ट की मदद ले सकते हैं।
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स्रोत:
Impact of blood p-tau217 testing on diagnosis and diagnostic confidence in cognitive disorders: a real-world clinical study
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