बच्चों को लेकर बड़े यानी वयस्कों की अक्सर यह सोच होती है कि बच्चे कुछ नहीं समझते और उनके सामने कुछ भी कहा जा सकता है, इससे उन्हें क्या फर्क पड़ेगा। जबकि बच्चे आपकी हर बात को रजिस्टर कर रहे होते हैं। जो भी आप उनके सामने कहते हैं उसका असर न केवल उनके मन पर पड़ता है बल्कि बार बार वही बात कहे जाने पर यह सोच उनके व्यक्तित्व का हिस्सा भी बन सकती है। यह बात 4 साल के बच्चे तक पर लागू होती है।
Parenting tips: बच्चों के सामने इन 5 बातों को कहने से बचें
बच्चों के दिमाग पर पड़ता असर
जब भी बच्चे के व्यक्तित्व या व्यवहार से जुड़ी कोई बात बच्चे से कही जाती है, उसका दिमाग उसे तुरंत प्रोसेस करना शुरू कर देता है। ऐसी स्थिति में वह या तो परिस्थितियों को इसके लिए दोष देता है या फिर खुद को दोषी समझने लगता है। बार बार ऐसा कुछ कहे जाने पर वह खुद के प्रति नकारात्मक रुख अपना सकता है, सबको अपना दुश्मन समझ सकता है, हीनता का भाव मन में ला सकता है। इसलिए चाहे आपका मूड खराब हो या बच्चे से कोई गलती हो जाए, ध्यान रखें कि बच्चे को उसके लिए दोषी मानकर उसे कड़वी बात न कहें। यह बच्चे के सेल्फ स्टीम को नुकसान पहुंचा सकता है और इसका असर लम्बे समय तक बना रह सकता है। इतना ही नहीं कई बार यह हमेशा के लिए बच्चे के व्यक्तित्व को प्रभावित कर देता है।
बातें जो करती हैं गलत असर
ऐसी 5 बातें जो बच्चे के मन पर बुरा असर डाल सकती हैं, वे हैं-
सुबह सुबह मूड ऑफ़ कर दिया
आप बच्चे को स्कूल छोड़ने जा रहे हैं। हो सकता है बस छूट गई हो या बच्चे का मन स्कूल जाने का न हो और वह किसी बहाने से देर किये जा रहा हो या रो रहा हो तो बजाय यह कहने के बच्चे को धैर्य से यह कहें कि स्कूल उसके लिए जरूरी है और अगर उसे कोई समस्या है तो वह आपसे खुलकर कह सकता है। अगर समस्या ऐसी है जो शांति से बताई जा सकती है तो उसे कहें कि आज घर आने के बाद आप उसके साथ स्पेशल टाइम बितायेंगे और साथ में आइसक्रीम या कोई मजेदार चीज खाते हुए दोस्तों की तरह प्रॉब्लम शेयर करेंगे। याद रखिये आपके डांटने, झुंझलाने या चिढ़ने से बच्चे को उत्साह नहीं मिलेगा। बल्कि अगर सच में उसे कोई समस्या है तो वह मन में उस चीज को दबा लेगा क्योंकि उसे लगेगा कि इससे पापा-मम्मी गुस्सा होंगे। जब आप उससे समस्या सुनने का वादा करें तो उसे उसी दिन किसी भी हाल में निभाएं भी।
तुम्हारी वजह से आज मुझे देर हो गई
दफ्तर जाना हो, किसी पार्टी में या किसी जरूरी काम से घर से निकलना हो, अगर आपका टाइम मैनेजमेंट गड़बड़ है तो उसका दोष बच्चे पर कभी न डालें। ये देर नहीं होती अगर आप और 15 मिनिट पहले तैयारी शुरू कर लेते/लेतीं। अगर आप बच्चे को इसके लिए दोषी ठहराएंगे तो हो सकता है कि दोषी महसूस करते हुए वह अपराधबोध से भर जाए। इतना ही नहीं फिर बाकी समय उसके मन में यही बात घूमती रह सकती है कि आज मम्मी या पापा को मेरी वजह से देर हुई और इसका बुरा असर उसके पूरे दिन पर पड़ सकता है। यदि आप रोजाना किसी जगह साथ जाते हैं जैसे आप दफ्तर जाते समय बच्चे को स्कूल छोड़ते हैं या किसी एक्टिविटी क्लास के लिए आप साथ घर के निकलते हैं तो कोशिश करें कि आपके पास अतिरक्त 15 मिनिट का समय कम से कम रहे।
तुम तो किसी से घुलते मिलते ही नहीं!
हर व्यक्ति की अलग प्रकृति होती है और उसी के आधार पर वह व्यवहार करता है। हो सकता है आपके पड़ोस में रहने वाला कोई बच्चा बहुत मिलनसार या सोशल हो। वह खुद आगे होकर सबसे नमस्कार या बात कर लेता हो, सारे बच्चों के साथ खेल लेता हो, लेकिन आपके बच्चे को शांति से बैठकर किताबें पढ़ना, ड्राइंग करना या कम बातें करना पसंद हो। ऐसे में उसे बार बार यह न कहें कि बाकी बच्चे क्या कर रहे हैं। हो सकता है आप उसका उत्साह बढ़ाने के लिए ऐसा कर रहे हों लेकिन इसका उस पर उलटा असर भी पड़ सकता है। यह तुलना बार बार किये जाने पर उसके मन में खुद के लिए हीन भावना पैदा कर सकती है। वह खुद को उपेक्षित महसूस कर सकता है, कमतर मान सकता है। यदि आप बच्चे को सबसे मिल जुलकर रहना सिखाना भी चाहते हों, तो भी धैर्य से धीरे धीरे कोशिश करें, कभी भी बार बार बोलकर या दबाव डालकर उसे मजबूर न करें।