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World Tribal Day: यहां बना है देश का इकलौता जनजातीय संग्रहालय, आदिवासी संस्कृति को करीब से जानने आते हैं लोग
Tue, 09 Aug 2022 08:48 AM IST
अंकिता विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: अंकिता विश्वकर्मा
Updated Tue, 09 Aug 2022 08:48 AM IST
सार
World Tribal Day: यहां बना है देश का इकलौता जनजातीय संग्रहालय, आदिवासी संस्कृति को करीब से जानने आते हैं लोग
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राजधानी भोपाल में स्थित जनजातीय संग्रहालय
- फोटो : सोशल मीडिया
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मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी निवास करते हैं। प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 153.16 लाख है, जो कि राज्य की कुल जनसंख्या का 21.10 प्रतिशत है। मध्यप्रदेश देश का ऐसा राज्य है, जहां हर पांचवा व्यक्ति अनुसूचित जनजाति वर्ग का है। आदिवासी बहुल राज्य होने के चलते देश का एकमात्र जनजातीय संग्रहालय भी मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित है। इस जनजातीय संग्रहालय में आदिवासी कला और संस्कृति की अनोखी झलक देखने मिलती है, जहां हर साल देश-विदेश से लाखों लोग ट्राइबल कल्चर को देखने आते हैं। आइए आज विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर आपको मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित देश के एकमात्र जनजातीय संग्रहालय के बारे में बताते हैं।
जनजातीय संग्रहालय में बने आदिवासियों के घर
- फोटो : सोशल मीडिया
भोपाल में स्थित जनजातीय संग्रहालय में आदिवासी कला और संस्कृति की एक अमिट छाप देखने को मिलती हैं। यहां आदिवासियों के इस्तेमाल की हर छोटी बड़ी चीज मौजूद हैं। उनके घर, घरों में उपयोग के बर्तन, खेती किसानी में उपयोग होने वाले औजार, कपड़े, खान-पान सब कुछ एक ही छत के नीचे मौजूद है। जनजातीय जीवन शैली को करीब से देखने की चाह रखने वालों के लिए ये म्यूजियम एक खुली किताब की तरह है, जहां बस कुछ ही मिनटों में आदिवासी कला संस्कृति से रूबरू हुआ जा सकता है।
जनजातीय संग्रहालय की स्थापना राजधानी भोपाल के श्यामला हिल्स पर 6 जून 2013 को की गई थी। करीब 2 एकड़ में फैले इस संग्रहालय को 35 करोड़ 20 लाख रुपये के बजट में बनाया गया है। इस संग्रहालय का प्रतीक चिन्ह बिरछा है। जिसे धरती की उर्वरा शक्ति और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है। संग्रहालय में अलग-अलग 6 कला दीर्घाएं बनी हैं, जहां जनजातीय जीवन शैली के अलग-अलग हिस्सों को चित्रों और वस्तुओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
जनजातीय संग्रहालय की स्थापना राजधानी भोपाल के श्यामला हिल्स पर 6 जून 2013 को की गई थी। करीब 2 एकड़ में फैले इस संग्रहालय को 35 करोड़ 20 लाख रुपये के बजट में बनाया गया है। इस संग्रहालय का प्रतीक चिन्ह बिरछा है। जिसे धरती की उर्वरा शक्ति और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है। संग्रहालय में अलग-अलग 6 कला दीर्घाएं बनी हैं, जहां जनजातीय जीवन शैली के अलग-अलग हिस्सों को चित्रों और वस्तुओं के माध्यम से दर्शाया गया है।
जनजातीय संग्रहालय में लगे चित्र
- फोटो : सोशल मीडिया
जनजातीय संग्रहालय में प्रदेश की बैगा, सहरिया, गोंड, भील, कोरकू, कोल और भारिया जनजातियों की झलकियां दिखने को मिलती हैं। संग्रहालय में बैगा घर, गोंड स्थापत्य, भील घर, सहरिया आंगन, मग रोहन, गोंड घर, पत्थर का घर, कोरकू घर बने हैं जो बताते हैं कि अलग-अलग आदिवासी समूह किस तरह के घरों में रहते हैं और उनकी दिनचर्या कैसी होती है। संग्रहालय में आदिवासी बच्चों के खेलों जैसें मछली पकड़ना, चौपड़, गिल्ली-डंडा, बुड़वा चक्ताक गोंदरा, पोशंबा, घर-घर, पंच गुट्टा, गेड़ी, पिट्ठू, गूछू हुड़वा भी बना है।
आदिवासी लोगों के लिए उनके तीज त्यौहार और देवस्थल काफी महत्व रखते हैं। संग्रहालय में जनजातीय देवलोक को काफी बारीकी से दिखाया गया है, जिसमें बाबा देव, पिठौरा, सहरिया देव गुड़ी, गातला, माड़िया खाम, मढ़ई, मेघनाद खाम्भ, सरग नसैनी, सनेही, महारानी और मरही माता, लिंगो गुड़ी, लोहरीपुर के राजा, रजवार आंगन हैं।
आदिवासी लोगों के लिए उनके तीज त्यौहार और देवस्थल काफी महत्व रखते हैं। संग्रहालय में जनजातीय देवलोक को काफी बारीकी से दिखाया गया है, जिसमें बाबा देव, पिठौरा, सहरिया देव गुड़ी, गातला, माड़िया खाम, मढ़ई, मेघनाद खाम्भ, सरग नसैनी, सनेही, महारानी और मरही माता, लिंगो गुड़ी, लोहरीपुर के राजा, रजवार आंगन हैं।
