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Chaitra Navratri: बुंदेलखंड का वो रहस्यमयी मंदिर, जहां डाकू भी झुकाते थे सिर; हर साल बढ़ रही है माता की चट्टान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सागर
Published by: सागर ब्यूरो
Updated Sat, 21 Mar 2026 08:06 AM IST
सार
बुंदेलखंड के सागर-छतरपुर-टीकमगढ़ सीमा पर स्थित अबार माता मंदिर नवरात्रि में आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां की रहस्यमयी 70 फीट ऊंची चट्टान और उससे जुड़ी मान्यताएं श्रद्धालुओं को आकर्षित कर रही हैं।
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अबार माता मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
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चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर जहां पूरा देश शक्ति की भक्ति में डूबा है, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में स्थित एक चमत्कारिक सिद्ध स्थल इन दिनों विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हम बात कर रहे हैं सागर, छतरपुर और टीकमगढ़ जिलों की सीमा पर स्थित ‘अबार माता’ मंदिर की, जो अपनी पौराणिक मान्यताओं और रहस्यमयी विशेषताओं के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
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अब यह करीब 70 फीट तक पहुंच चुकी है।
- फोटो : अमर उजाला
70 फीट तक पहुंची चट्टान, आस्था का केंद्र
अबार माता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां मौजूद ग्रेनाइट की विशाल चट्टान है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि माता इसी चट्टान में समाहित हैं। बताया जाता है कि पहले यह चट्टान कुछ फीट की थी, लेकिन समय के साथ इसका आकार बढ़ता गया और अब यह करीब 70 फीट तक पहुंच चुकी है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि हर महाशिवरात्रि पर इसकी लंबाई ‘एक तिल’ के बराबर बढ़ती है, जिसे शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक माना जाता है। यह भी मान्यता है कि इस चट्टान को स्पर्श करने से निसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
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पूजा करते हुए भक्तगण।
- फोटो : अमर उजाला
आल्हा-ऊदल से जुड़ा इतिहास
करीब हजार वर्ष प्राचीन इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व भी है। जनश्रुति के अनुसार, महोबा के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल जब माढ़ोगढ़ जा रहे थे, तब रास्ते में जंगल में उन्हें देर हो गई। बुंदेली भाषा में देरी को ‘अबेर’ कहा जाता है। उन्होंने यहीं विश्राम कर अपनी आराध्य देवी का आह्वान किया, जिसके बाद माता ने उन्हें दर्शन दिए। तभी से यह स्थान ‘अबार माता’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
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मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
दस्युओं की भी रही आस्था
एक समय यह क्षेत्र दस्युओं का गढ़ रहा है। बताया जाता है कि आजादी से पहले और बाद में कई कुख्यात दस्यु सरदार यहां गुप्त रूप से माता की पूजा-अर्चना करने आते थे।
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मंदिर में माता के स्वरूपों की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित।
- फोटो : अमर उजाला
प्रकृति पूजन का विशेष महत्व
मंदिर परिसर में समय के साथ माता के स्वरूपों की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, लेकिन आज भी मुख्य पूजन ग्रेनाइट की उसी चट्टान का किया जाता है। मान्यता है कि आल्हा-ऊदल को दर्शन देने के बाद माता इसी चट्टान में समाहित हो गई थीं। यही कारण है कि यहां प्रकृति पूजन को विशेष महत्व दिया जाता है।
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