भगवान कृष्ण की प्रेम दीवानी मीरा का भक्ति और साधना का उत्कर्ष काल चित्तौड़गढ़ में रहा है। गढ़ों के गढ़ चित्तौड़गढ़ सिर्फ अपने दुर्ग के वैभव या सतियों के जौहर से ही नहीं अपितु भक्तिमति मीरा से भी जाना जाता है। चित्तौड़ दुर्ग में स्थित उसी मीरा मंदिर से उनकी भक्ति की गंगा निकली, जिसने आज तक सम्पूर्ण देश यहां तक कि पूरी दुनिया को आकृष्ट किया हुआ है। इसीलिए यह ऐतिहासिक चित्तौड़ और मीरा एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं। चित्तौड़गढ़ की बात हो तो मीरा की छवि उभर आती है। मीरा का जिक्र होते ही इस दुर्ग का अभिमान जाग उठता है। मीराबाई नारी शक्ति, प्रेम और अध्यात्म की वह अनुपम मूरत हैं, जिन्होंने दुनिया को सिखाया कि प्रेम में समर्पण और भक्ति का मार्ग किसी भी सांसारिक वैभव या अवरुद्ध प्रपंच से बड़ा होता है।
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Krishna Janmashtami: हरि प्रेम में डूबीं राजकुमारी चित्तौड़ बनीं भक्तिमति मीरा, इस मंदिर में हलाहल बना था अमृत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चित्तौड़गढ़
Published by: अर्पित याज्ञनिक
Updated Fri, 15 Aug 2025 08:06 PM IST
सार
Krishna Janmashtami: महाराणा प्रताप की ताई होने के बावजूद उन्होंने सांसारिक वैभव छोड़कर भगवान कृष्ण की भक्ति को अपना जीवन समर्पित किया। मीरा मंदिर, जहां विष का प्याला भी अमृत में बदल गया, आज भी हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
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मीरा मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
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मीरा मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
महाराणा प्रताप की ताई थी, जगाई थी अलख
भक्ति की जोत जगाने वाली मीरा को लेकर रिटायर्ड प्रोफेसर एवं मीरा स्मृति संस्थान के पूर्व अध्यक्ष एसएन समदानी ने बताया कि समाज में स्त्री को केवल बहू या विदुषी मानने वाले दौर में मीरा ने 36 कौमों के लिए प्रेम-भक्ति की अलख जगाई। उनका जीवन एक अनूठा विद्रोह और अहर्निश समर्पण का दर्पण बन गया। वे रिश्ते में महाराणा प्रताप की ताई थी। राजसी वंश की पहचान के बावजूद, मीरा की पहचान उनके प्रेम और भक्ति से ही बनी।
भक्ति की जोत जगाने वाली मीरा को लेकर रिटायर्ड प्रोफेसर एवं मीरा स्मृति संस्थान के पूर्व अध्यक्ष एसएन समदानी ने बताया कि समाज में स्त्री को केवल बहू या विदुषी मानने वाले दौर में मीरा ने 36 कौमों के लिए प्रेम-भक्ति की अलख जगाई। उनका जीवन एक अनूठा विद्रोह और अहर्निश समर्पण का दर्पण बन गया। वे रिश्ते में महाराणा प्रताप की ताई थी। राजसी वंश की पहचान के बावजूद, मीरा की पहचान उनके प्रेम और भक्ति से ही बनी।
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मीरा महल।
- फोटो : अमर उजाला
वृन्दावन पहुंचीं, प्राप्त किया जीवन का अंतिम साध्य
समदानी ने बताया कि जब परिवार और समाज में उनका निर्वाह दूभर हुआ, तो दुखी होकर मीरा ने संवत 1534 के आसपास चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ छोड़ दिया। वे पुष्कर, टोडा भीम होते हुए अंत में वृंदावन जा पहुंचीं। यही वह भूमि थी, जहां वृंदावन के माधुर्य में बह कर, भक्ति रस में लीन रह कर, उन्होंने जीवन का अंतिम साध्य प्राप्त किया। कहते हैं, मीरा अपने प्रभु में लीन होकर ही समाधिस्थ हुईं। उनका स्वधाम गमन कब, कैसे हुआ, इस पर मतभेद अवश्य हैं, लेकिन आमतौर पर उनकी आयु 43 वर्ष मानी जाती है।
समदानी ने बताया कि जब परिवार और समाज में उनका निर्वाह दूभर हुआ, तो दुखी होकर मीरा ने संवत 1534 के आसपास चित्तौड़गढ़ और मेवाड़ छोड़ दिया। वे पुष्कर, टोडा भीम होते हुए अंत में वृंदावन जा पहुंचीं। यही वह भूमि थी, जहां वृंदावन के माधुर्य में बह कर, भक्ति रस में लीन रह कर, उन्होंने जीवन का अंतिम साध्य प्राप्त किया। कहते हैं, मीरा अपने प्रभु में लीन होकर ही समाधिस्थ हुईं। उनका स्वधाम गमन कब, कैसे हुआ, इस पर मतभेद अवश्य हैं, लेकिन आमतौर पर उनकी आयु 43 वर्ष मानी जाती है।
मीरा मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला
मीरा के बिना भारत की सांस्कृतिक विरासत अधूरी
मीरा का स्मरण पांच शताब्दियों से लोक स्मृति में जीवित है। उनकी पदावलियां, भजनों की माधुरी, प्रेम-भक्ति व समर्पण की मिसालें आज भी घर-घर में गाई जाती हैं। मीरा वह दीपशिखा हैं, जिनमें आज भी प्रेम, भक्ति व समर्पण की लौ जलती है-कण-कण, जन-जन को आलोकित करती है। मीरा के बिना भारत की सांस्कृतिक विरासत अधूरी है।
“गढ़ चित्तौडे़ ना रहा, नहीं रहन को जोग,
बस्सया रूडी द्वारका, जहां हरि भक्तान रो भोग।”
मीरा का स्मरण पांच शताब्दियों से लोक स्मृति में जीवित है। उनकी पदावलियां, भजनों की माधुरी, प्रेम-भक्ति व समर्पण की मिसालें आज भी घर-घर में गाई जाती हैं। मीरा वह दीपशिखा हैं, जिनमें आज भी प्रेम, भक्ति व समर्पण की लौ जलती है-कण-कण, जन-जन को आलोकित करती है। मीरा के बिना भारत की सांस्कृतिक विरासत अधूरी है।
“गढ़ चित्तौडे़ ना रहा, नहीं रहन को जोग,
बस्सया रूडी द्वारका, जहां हरि भक्तान रो भोग।”
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मीरा मंदिर परिसर।
- फोटो : अमर उजाला
बचपन के भक्ति संस्कार
मीरा मेड़ता के सिसोदिया राज परिवार राव दूदाजी की पोती थी। पाली के कुड़की गांव में दूदाजी के चौथे पुत्र रतनसिंह के घर संवत् 1498 में मीराबाई का जन्म हुआ था। मीरा बाई को बचपन से ही श्रीकृष्ण भक्ति के संस्कार मिले थे। उनके पितामाह राव दूदाजी और पिता रतन सिंह दोनों मेड़ता के प्रतिष्ठित शासक थे। बाल्यकाल से ही मीरा का मन सांसारिक लीलाओं में नहीं, अपितु भगवान कृष्ण के चरणों में रम गया था। किंवदंती है कि बाल्यावस्था में ही वे स्वयं को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित मान बैठी थीं; स्वप्न में कृष्ण से अपना विवाह देख चुकीं थीं।
मीरा मेड़ता के सिसोदिया राज परिवार राव दूदाजी की पोती थी। पाली के कुड़की गांव में दूदाजी के चौथे पुत्र रतनसिंह के घर संवत् 1498 में मीराबाई का जन्म हुआ था। मीरा बाई को बचपन से ही श्रीकृष्ण भक्ति के संस्कार मिले थे। उनके पितामाह राव दूदाजी और पिता रतन सिंह दोनों मेड़ता के प्रतिष्ठित शासक थे। बाल्यकाल से ही मीरा का मन सांसारिक लीलाओं में नहीं, अपितु भगवान कृष्ण के चरणों में रम गया था। किंवदंती है कि बाल्यावस्था में ही वे स्वयं को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित मान बैठी थीं; स्वप्न में कृष्ण से अपना विवाह देख चुकीं थीं।