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जूते बनाकर पेट पालने को मजबूर हुआ चैंपियन खिलाड़ी, कहानी जान रो देंगे
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देश भर में अपना डंका बजाने वाले इस खिलाड़ी को ऐसा ईनाम मिलेगा, किसी ने सोचा न था। चैंपियन खिलाड़ी की कहानी ऐसी है कि सबकी आंखें नम हो जाती हैं। कभी एक के बाद एक नेशनल खेलकर जो सबका चहेता बन गया था वही आज परिवार पालने के लिए जूते बनाता है। जो बड़े ईनाम का हकदार था, उसकी सरकार ने मदद तक नहीं की। आइए जानते हैं संघर्ष की मिसाल बने सुभाष चंद की पूरी कहानी-
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हिमाचल के हमीरपुर के रहने वाले सुभाष चंद छह बार हॉकी नेशनल खेले। वह हॉकी में इतने माहिर हो गए थे कि कई लोग उन्हें दूसरा ध्यान चंद बुलाने लगे। सुभाष चंद बताते हैं कि 1977 में उन्होंने पहली बार जूनियर नेशनल में हिस्सा लिया था। उसके बाद 3 बार जूनियर नेशनल खेले।
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दो बार इंटर यूनिवर्सिटी और 2 बार सीनियर लेवल पर नेशनल खेला। वह पहली बार नेशनल खेलने गए थे तो उनके पास पैड तक नहीं थे। पैड उधार लेकर पहला नेशनल खेला था। उस वक्त खेलों के लिए इतनी सुविधाएं नहीं थीं।
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न बजट और कभी-कभी उनके पास हॉकी स्टिक होती थी। वह सीनियर की स्टिक उधार मांग कर प्रेक्टिस करते थे। छह बार नेशनल खेलने के बाद भी सरकार से कोई सहायता नहीं मिली। वर्ष 1984 में आईटीआई की।
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subhash chand
दर दर भटकने के बाद भी कहीं नौकरी नहीं मिली। न ही सरकार मदद को आगे आई। देश के लिए खेलने का सपना चकनाचूर हो गया। आखिरकार हार मानकर परिवार के भरण-पोषण को पुश्तैनी काम (मोची की दुकान) ही संभालना पड़ा।
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