इस साल कजली तीज या कजरी तीज 18 अगस्त, रविवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक रक्षाबंधन के तीन दिन और कृष्ण जन्माष्टमी से पांच दिन पहले यह तीज मनाई जाती है। कजली तीज को सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस खास दिन पालकी तैयार की जाती हैं, जिसमें तीज माता की सवारी निकाली जाती है। इस दिन महिलाएं व लड़कियां घर-परिवार की सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर धम्मोड़ी यानी हल्का नाश्ता करने कि रिवाज है।
सातुड़ी तीज पर सवाया जैसे सवा किलो या सवा पाव के सत्तू तैयार करना चाहिए। सत्तू अच्छी तिथि या वार देखकर बनाना चाहिए। मंगलवार और शनिवार को सत्तू नहीं बनाए जाते हैं। तीज के एक दिन पहले या तीज वाले दिन भी आप सत्तू बना सकते हैं। सत्तू को पिंड के रूप में तैयार कर लिजिए। फिर उस पर सूखे मेवे, इलायची और चांदी का वर्क सजाएं। पूजा के लिए एक छोटा लड्डू बनाना चाहिए। कलपने के लिए सवा पाव या मोटा लड्डू बनना चाहिए व एक लड्डू पति के हाथ में झिलाने के लिए बनाना चाहिए। कुंवारी लड़कियां लड्डू अपने भाई को झिलाती हैं। तीज से एक दिन पहले सिर धोकर हाथों व पैरों पर मेंहदी लगानी चाहिए।
सातुड़ी तीज पूजन के लिए एक छोटा सा सत्तू का लड्डू, नीमड़ी, दीपक, केला, अमरुद, ककड़ी, दूध मिश्रित जल, कच्चा दूध, मोती की लड़, पूजा की थाली और जल कलश रखें। इसके बाद मिट्टी व गोबर से दीवार के सहारे एक छोटा सा तालाब बनाकर घी, गड़ी से पाल बांध कर उसमें नीम के पेड़ की टहनी को रोप दें। इसके बाद तालाब में कच्चा दूध मिलाकर पानी भर दें। और किनारे पर एक दिया जला कर रख दें। नींबू, ककड़ी, केला, सेब, सातु, रोली, मौली अक्षत रख लें।
पूजा की विधि
इस पूरे दिन सिर्फ पानी पीकर उपवास किया जाता है और सुबह सूर्योदय से पहले धमोली की जाती है। इसमें सुबह मिठाई, फल आदि का नाश्ता किया जाता है। सुबह नहाकर महिलाएं सोलह बार झूला झूलती हैं, उसके बाद ही पानी पीती हैं। शाम की वक्त के बाद महिलाएं सोलह श्रृंगार कर तीज माता की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान सबसे पहले तीज माता को जल के छींटे दें। रोली के छींटें दें फिर चावल चढ़ाएं। नीमड़ी माता के पीछे दीवार पर मेहंदी, रोली व काजल की 13-13 बिंदिया अपनी अंगुली से लगाएं। फिर नीमड़ी माता को मौली चढ़ाएं। मेहंदी, काजल और वस्त्र चढ़ाएं। दीवार पर लगाई बिंदियो पर भी मेहंदी की सहायता से लच्छा चिपका दें।
पूजा के कलश पर रोली से तिलक करें और लच्छा बांधें। किनारे रखे दीपक के प्रकाश में नींबू, ककड़ी, मोती की लड़, नीम की डाली, नाक की नथ, साड़ी का पल्ला, दीपक की लौ, सातु का लड्डू आदि का प्रतिबिंब देखें और दिखाई देने पर इस प्रकार बोलना चाहिए 'तलाई में नींबू दीखे, दीखे जैसा ही टूटे' इसी तरह बाकि सभी वस्तुओं के लिए एक-एक करके बोलना चाहिए। इस तरह पूजन करने के बाद सातुड़ी तीज माता की कहानी सुननी चाहिए, नीमड़ी माता की कहानी सुननी चाहिए, गणेश जी की कहानी व लपसी तपसी की कहानी सुननी चाहिए। रात को चंद्र उदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।