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UN की चेतावनी: 130 करोड़ लोगों के हिस्से का पानी पी जाएगा AI; 2030 तक मच सकती है भारी तबाही!

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीे Published by: Suyash Pandey Updated Fri, 12 Jun 2026 05:41 PM IST
सार

UN AI Environmental Impact Report: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई ने काम को आसान और तेज जरूर बना दिया है, लेकिन इसकी बढ़ती लोकप्रियता पर्यावरण के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक AI डेटा सेंटर पूरे जापान के बराबर बिजली और 130 करोड़ लोगों की सालाना जरूरत के बराबर पानी की खपत कर सकते हैं। पढ़ें ये विस्तृत रिपोर्ट।

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AI Could Use Water Meant for 1.3 Billion People by 2030, Says New UN Report
UN की रिपोर्ट में पर्यावरण पर डराने वाले नतीजे आए सामने - फोटो : अमर उजाला

आज हर कोई एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) टूल्स का दीवाना है। मिनटों का काम सेकंडों में हो रहा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका एक आसान सा सवाल पूछना पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रहा है?



लेकिन संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के वैज्ञानिकों की एक नई रिपोर्ट ने डराने वाला सच सामने रखा है। उनके मुताबिक, एआई हमारे प्राकृतिक संसाधनों जैसे- बिजली, पानी और जमीन को इतनी तेजी से निगल रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में यह अरबों लोगों के लिए संकट पैदा कर सकता है।


यूएन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ (UNU-INWEH) की नई रिपोर्ट 'पर्यावरण पर AI की ऊर्जा का खर्च' में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। आइए जानते हैं रिपोर्ट में क्या सामने आया।

AI Could Use Water Meant for 1.3 Billion People by 2030, Says New UN Report
UN की रिपोर्ट में पर्यावरण पर डराने वाले नतीजे आए सामने - फोटो : अमर उजाला

2030 तक AI का खौफनाक 'फुटप्रिंट'

हम अक्सर सोचते हैं कि डिजिटल दुनिया हवा में (क्लाउड पर) काम करती है, लेकिन असल में इसे चलाने के लिए जमीन पर मौजूद बड़े डेटा सेंटर्स की जरूरत होती है। रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक इन डेटा सेंटर्स का खर्च कुछ इस तरह होगा:
 

पूरे जापान देश के बराबर बिजली की खपत

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, 2030 तक दुनिया भर के एआई डेटा सेंटर लगभग 945 टेरावॉट-आवर बिजली सोख लेंगे। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल सालाना बिजली खपत का लगभग तीन गुना है। आपको बता दें कि इन देशों की आबादी 65 करोड़ के आसपास है। 

यह इतनी बिजली है जितनी पूरे जापान देश में एक साल में खर्च होती है। एक आम भारतीय घर साल भर में जितनी बिजली इस्तेमाल करता है, उतनी ऊर्जा एआई सर्वर कुछ ही सेकंड्स में खत्म कर देते हैं। पहले बिजली घरों या फैक्ट्रियों में लगती थी, अब यह डिजिटल दुनिया में खप रही है।

AI Could Use Water Meant for 1.3 Billion People by 2030, Says New UN Report
UN की रिपोर्ट में पर्यावरण पर डराने वाले नतीजे आए सामने - फोटो : अमर उजाला

130 करोड़ लोगों के हिस्से का पानी पी जाएगा एआई

बिजली से भी बड़ा संकट पानी का है। Earth.Org की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक एआई डेटा सेंटर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च कर सकते हैं। यह अफ्रीका के 1.3 अरब लोगों की साल भर की घरेलू पानी की जरूरत के बराबर है। डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए करोड़ों लीटर साफ पानी चाहिए होता है।

एआई मॉडल्स को चलाने वाले चिप और सर्वर काम करते वक्त भयंकर गर्म हो जाते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए लाखों लीटर साफ पानी की जरूरत होती है। 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी से भारत जैसे बड़े देश की पूरी आबादी की जरूरत पूरी हो सकती है। एक तरफ इंसान पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है। तो वहीं दूसरी तरफ मशीनें पानी की तरह पानी बहा रही हैं।

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AI Could Use Water Meant for 1.3 Billion People by 2030, Says New UN Report
UN की रिपोर्ट में पर्यावरण पर डराने वाले नतीजे आए सामने - फोटो : अमर उजाला

जमीन की जरूरत

एआई डेटा सेंटर्स लगाने के लिए जमीन की भी जरूरत होती है। 2030 तक यह 14,500 वर्ग किलोमीटर की जगह घेरेगी। आपको बता दें कि यह इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता से दोगुना बड़ा इलाका है।
 

सिर्फ 'कार्बन' नहीं, असली समस्या पानी और जमीन भी है

अब तक माना जाता था कि डेटा सेंटर सिर्फ कार्बन एमिशन (प्रदूषण) बढ़ाते हैं। कंपनियों को लगता है कि अगर वे कोयले की जगह ग्रीन एनर्जी अपना लेंगी तो सब ठीक हो जाएगा। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ कार्बन पर ध्यान देना गलत है। अगर आप कार्बन कम करने के लिए बायो-एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं, तो पानी की खपत 30 गुना और जमीन की जरूरत 100 गुना तक बढ़ सकती है। यानी एक समस्या सुलझाने के चक्कर में दूसरी खड़ी हो रही है।

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UN की रिपोर्ट में पर्यावरण पर डराने वाले नतीजे आए सामने - फोटो : अमर उजाला

'ट्रेनिंग' नहीं, रोजमर्रा के इस्तेमाल में है असली खतरा

शुरुआत में लगा था कि एआई मॉडल को तैयार करने या ट्रेन करने में ही सबसे ज्यादा बिजली लगती है। लेकिन सच तो यह है कि मॉडल बनने के बाद, जब हम और आप रोजाना इससे सवाल पूछते हैं, तब कुल ऊर्जा का 80 से 90% हिस्सा खर्च होता है।

अगर आकड़ों की बात करें तो अकेले ChatGPT रोजाना करीब 2.5 अरब सवालों के जवाब देता है। इसे चलाने में इतनी बिजली लगती है कि इसके कार्बन प्रदूषण की भरपाई के लिए 26 लाख पेड़ लगाने पड़ेंगे।
 

टास्क बिजली का खर्च पानी का खर्च
सामान्य टेक्स्ट सवाल बहुत कम नाममात्र
1 AI तस्वीर बनाना 10 वॉट का LED बल्ब 17 मिनट तक जले लगभग 29 मिलीलीटर (2 चम्मच पानी)
1 छोटा AI वीडियो बनाना 10 वॉट का LED बल्ब 42 घंटे तक जले 4.1 लीटर (एक इंसान के 2 दिन का पीने का पानी)

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