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सैटेलाइट रेस में एंट्री करेगी रिलायंस: मुकेश अंबानी ने बनाया अरबों का मास्टरप्लान, स्टारलिंक को मिलेगी टक्कर
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitish Kumar
Updated Wed, 06 May 2026 04:18 PM IST
सार
Reliance Satellite Internet: भारत में 4G और 5G इंटरनेट की दुनिया में क्रांति लाने के बाद अब रिलायंस एक बड़े दांव की तैयारी में है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुकेश अंबानी एक ऐसे प्रोजेक्ट पर अरबों डॉलर का निवेश करने जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर एलन मस्क की कंपनी को टक्कर देगा।
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लो-अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट लॉन्च की योजना
- फोटो : एआई जनरेटेड
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टेलीकॉम सेक्टर पर राज करने के बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज अब सीधे अंतरिक्ष (सैटेलाइट कम्युनिकेशन) की दुनिया में कदम रखने जा रही है। ताज़ा रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स के क्षेत्र में कई अरब डॉलर का भारी-भरकम निवेश करने का प्लान बना रही है। यह कदम रिलायंस को सीधे ग्लोबल सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों जैसे स्टार्लिंक, अमेजन कुइपर और यूटेलसैट वनवेब के मुकाबले में खड़ा कर सकता है।
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जियो प्लेटफॉर्म्स के कंधे पर जिम्मेदारी
- फोटो : JIO
जियो प्लेटफॉर्म्स के कंधे पर जिम्मेदारी
रिपोर्ट्स बताती हैं कि रिलायंस का यह पूरा सैटेलाइट बिजनेस 'जियो प्लेटफॉर्म्स' के तहत काम करेगा, जो पहले से ही कंपनी के डिजिटल और टेलीकॉम ऑपरेशन्स को संभाल रही है। स्टारलिंक को भारत का अपना स्वदेशी जवाब देने के लिए रिलायंस हर तरह के विकल्प तलाश रही है। कंपनी खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने और अन्य कंपनियों के साथ जुड़ने दोनों ही रास्तों पर विचार कर रही है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि रिलायंस का यह पूरा सैटेलाइट बिजनेस 'जियो प्लेटफॉर्म्स' के तहत काम करेगा, जो पहले से ही कंपनी के डिजिटल और टेलीकॉम ऑपरेशन्स को संभाल रही है। स्टारलिंक को भारत का अपना स्वदेशी जवाब देने के लिए रिलायंस हर तरह के विकल्प तलाश रही है। कंपनी खुद का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने और अन्य कंपनियों के साथ जुड़ने दोनों ही रास्तों पर विचार कर रही है।
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मुकेश अंबानी
- फोटो : ANI
प्रोजेक्ट पर काम कर रही 6 टीमें, अंबानी खुद कर रहे लीड
इस प्रोजेक्ट की अहमियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि रिलायंस चेयरमैन मुकेश अंबानी खुद इस पहल का नेतृत्व कर रहे हैं। उनका साथ देने के लिए रिलायंस के प्रेसिडेंट पीके भटनागर, जियो प्लेटफॉर्म्स के सीईओ मैथ्यू ओमन और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट आयुष भटनागर जैसे दिग्गज अधिकारी भी मैदान में हैं।
इस विशाल प्रोजेक्ट को तेजी से जमीन पर उतारने के लिए रिलायंस ने 6 अलग-अलग टीमें बनाई हैं। ये टीमें प्रोजेक्ट के अलग-अलग हिस्सों जैसे- लॉन्चिंग, पेलोड, सैटेलाइट्स और यूजर टर्मिनल्स (ग्राहकों तक इंटरनेट पहुंचाने वाले उपकरण) पर काम कर रही हैं। इसके अलावा, रिलायंस ने 'इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन' (ITU) में ऑर्बिटल स्लॉट (सैटेलाइट की जगह और रेडियो फ्रीक्वेंसी) हासिल करने के लिए दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ बातचीत भी शुरू कर दी है।
इस प्रोजेक्ट की अहमियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि रिलायंस चेयरमैन मुकेश अंबानी खुद इस पहल का नेतृत्व कर रहे हैं। उनका साथ देने के लिए रिलायंस के प्रेसिडेंट पीके भटनागर, जियो प्लेटफॉर्म्स के सीईओ मैथ्यू ओमन और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट आयुष भटनागर जैसे दिग्गज अधिकारी भी मैदान में हैं।
इस विशाल प्रोजेक्ट को तेजी से जमीन पर उतारने के लिए रिलायंस ने 6 अलग-अलग टीमें बनाई हैं। ये टीमें प्रोजेक्ट के अलग-अलग हिस्सों जैसे- लॉन्चिंग, पेलोड, सैटेलाइट्स और यूजर टर्मिनल्स (ग्राहकों तक इंटरनेट पहुंचाने वाले उपकरण) पर काम कर रही हैं। इसके अलावा, रिलायंस ने 'इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन' (ITU) में ऑर्बिटल स्लॉट (सैटेलाइट की जगह और रेडियो फ्रीक्वेंसी) हासिल करने के लिए दूरसंचार विभाग (DoT) के साथ बातचीत भी शुरू कर दी है।
LEO सैटेलाइट (सांकेतिक)
- फोटो : AI
क्यों इतने खास हैं LEO सैटेलाइट्स और चीन से क्या है कनेक्शन?
लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट्स पारंपरिक सैटेलाइट्स की तुलना में पृथ्वी के बहुत करीब चक्कर लगाते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये दूर-दराज के और ग्रामीण इलाकों में बेहद हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी देने में सक्षम हैं। आज पूरी दुनिया में सैटेलाइट इंटरनेट को कमर्शियल (व्यापारिक) और सुरक्षा, दोनों ही नजरियों से एक रणनीतिक तकनीक माना जा रहा है।
भारत सरकार भी यह चाहती है कि देश का अपना स्वदेशी सैटेलाइट कम्युनिकेशन इकोसिस्टम बने, ताकि विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम हो सके। यह कदम इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि पड़ोसी देश चीन ने पहले ही ITU के पास LEO तारामंडलों में लगभग 2,00,000 सैटेलाइट्स स्थापित करने की योजना दर्ज करा दी है। पूरी दुनिया में देशों के बीच स्पेस कैपेसिटी बढ़ाने की होड़ मची हुई है।
लो अर्थ ऑर्बिट यानी LEO सैटेलाइट्स पारंपरिक सैटेलाइट्स की तुलना में पृथ्वी के बहुत करीब चक्कर लगाते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ये दूर-दराज के और ग्रामीण इलाकों में बेहद हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी देने में सक्षम हैं। आज पूरी दुनिया में सैटेलाइट इंटरनेट को कमर्शियल (व्यापारिक) और सुरक्षा, दोनों ही नजरियों से एक रणनीतिक तकनीक माना जा रहा है।
भारत सरकार भी यह चाहती है कि देश का अपना स्वदेशी सैटेलाइट कम्युनिकेशन इकोसिस्टम बने, ताकि विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम हो सके। यह कदम इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि पड़ोसी देश चीन ने पहले ही ITU के पास LEO तारामंडलों में लगभग 2,00,000 सैटेलाइट्स स्थापित करने की योजना दर्ज करा दी है। पूरी दुनिया में देशों के बीच स्पेस कैपेसिटी बढ़ाने की होड़ मची हुई है।
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नई कंपनियों को कर सकती है अधिग्रहण
- फोटो : AI
क्या कोई बड़ी कंपनी खरीदेगी रिलायंस?
मार्केट में स्टारलिंक और वनवेब (OneWeb) जैसी कंपनियों का पहले से ही दबदबा है। ऐसे में अपनी एंट्री को सुपरफास्ट बनाने के लिए रिलायंस अधिग्रहण के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। रिलायंस की नजरें ऐसी कंपनियों को खरीदने पर हैं जिनके पास पहले से ही ऑर्बिटल स्लॉट और जरूरी सैटेलाइट इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो।
आपको बता दें कि मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO) सैटेलाइट सर्विसेज के लिए रिलायंस की पहले से ही SES नाम की सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनी के साथ पार्टनरशिप है।
मार्केट में स्टारलिंक और वनवेब (OneWeb) जैसी कंपनियों का पहले से ही दबदबा है। ऐसे में अपनी एंट्री को सुपरफास्ट बनाने के लिए रिलायंस अधिग्रहण के विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। रिलायंस की नजरें ऐसी कंपनियों को खरीदने पर हैं जिनके पास पहले से ही ऑर्बिटल स्लॉट और जरूरी सैटेलाइट इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हो।
आपको बता दें कि मीडियम अर्थ ऑर्बिट (MEO) सैटेलाइट सर्विसेज के लिए रिलायंस की पहले से ही SES नाम की सैटेलाइट कम्युनिकेशन कंपनी के साथ पार्टनरशिप है।