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सूखे मानसून ने बढ़ाई किसानों की चिंता: पंजाब में 38 फीसदी कम बारिश से धान पर संकट, 126 साल में सबसे सूखा दौर
Mon, 27 Jul 2026 08:09 AM IST
Nivedita
राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
राजिंद्र शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Mon, 27 Jul 2026 08:09 AM IST
सार
जून से 17 जुलाई तक पंजाब में सामान्य से 38 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। देश में बिहार के बाद पंजाब सबसे अधिक वर्षा कमी वाला राज्य है। इसके बाद तेलंगाना में 34 फीसदी, केरल में 33 फीसदी और गुजरात में 31 फीसदी कम बारिश हुई है।
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धान की फसल
- फोटो : फाइल
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विस्तार
पंजाब में इस बार कमजोर मानसून ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश में खरीफ सीजन के तहत धान की रोपाई लगभग पूरी हो चुकी है और अब फसल को सबसे अधिक पानी की जरूरत है।
ऐसे समय में सामान्य से 38 फीसदी कम बारिश होने से धान समेत अन्य खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो इसका सीधा असर किसानों की आय और राज्य के धान उत्पादन पर पड़ सकता है।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार जून से 17 जुलाई तक पंजाब में सामान्य से 38 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। देश में बिहार के बाद पंजाब सबसे अधिक वर्षा कमी वाला राज्य है। इसके बाद तेलंगाना में 34 फीसदी, केरल में 33 फीसदी और गुजरात में 31 फीसदी कम बारिश हुई है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण पंजाब में मानसून की कमी को गंभीर चुनौती माना जा रहा है।
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रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 का जून-जुलाई का दौर पिछले 126 वर्षों में पांचवां सबसे सूखा रहा है। पूरे देश में भी इस अवधि के दौरान सामान्य से 24 फीसदी कम बारिश हुई है। इससे पहले वर्ष 2002 में 32.6 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई थी। वर्ष 1972, 1987 और 1918 भी देश के बड़े सूखे वाले वर्षों में शामिल रहे हैं।
कम बारिश का असर केवल मौजूदा खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाली रबी फसलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भू-जल स्तर और मिट्टी की नमी लगातार घटती रही तो किसानों की सिंचाई लागत बढ़ेगी और उत्पादन घटेगा।
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ऐसे समय में सामान्य से 38 फीसदी कम बारिश होने से धान समेत अन्य खरीफ फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त वर्षा नहीं हुई तो इसका सीधा असर किसानों की आय और राज्य के धान उत्पादन पर पड़ सकता है।
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स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार जून से 17 जुलाई तक पंजाब में सामान्य से 38 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है। देश में बिहार के बाद पंजाब सबसे अधिक वर्षा कमी वाला राज्य है। इसके बाद तेलंगाना में 34 फीसदी, केरल में 33 फीसदी और गुजरात में 31 फीसदी कम बारिश हुई है। कृषि प्रधान राज्य होने के कारण पंजाब में मानसून की कमी को गंभीर चुनौती माना जा रहा है।
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रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 का जून-जुलाई का दौर पिछले 126 वर्षों में पांचवां सबसे सूखा रहा है। पूरे देश में भी इस अवधि के दौरान सामान्य से 24 फीसदी कम बारिश हुई है। इससे पहले वर्ष 2002 में 32.6 फीसदी कम वर्षा दर्ज की गई थी। वर्ष 1972, 1987 और 1918 भी देश के बड़े सूखे वाले वर्षों में शामिल रहे हैं।
कम बारिश का असर केवल मौजूदा खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि आने वाली रबी फसलों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भू-जल स्तर और मिट्टी की नमी लगातार घटती रही तो किसानों की सिंचाई लागत बढ़ेगी और उत्पादन घटेगा।
खरीफ की फसलों पर पड़ेगा असर, रोग बढ़ने की भी आशंका
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ा असर धान की पैदावार पर पड़ेगा क्योंकि यह फसल सबसे अधिक पानी मांगती है। इसके अलावा कपास, मक्का और मूंग की खेती भी प्रभावित होने की आशंका है। कम बारिश के कारण फसलों में विभिन्न प्रकार के रोग और कीटों का खतरा भी बढ़ सकता है।
पिछले वर्ष प्रदेश में बाढ़ से करीब पांच लाख एकड़ क्षेत्र की फसल खराब हो गई थी जबकि इस बार सूखे ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले से ही इन फसलों की पैदावार में गिरावट देखी जा रही है। ऐसे में कमजोर मानसून किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकता है।
180 लाख मीट्रिक टन धान खरीद के लक्ष्य पर खतरा
कम बारिश का असर राज्य सरकार के इस वर्ष तय किए गए 180 लाख मीट्रिक टन धान खरीद लक्ष्य पर भी पड़ सकता है। पिछले वर्ष भी सरकार ने 180 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा था जबकि मंडियों में 190 लाख मीट्रिक टन तक की तैयारी की गई थी। इसके बावजूद केवल 156 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हो सकी।
वर्ष 2016 के बाद यह सबसे कम खरीद रही थी। वर्ष 2016 में 140 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। हालांकि वर्ष 2025 को छोड़कर पिछले वर्षों में खरीद बेहतर रही है। वर्ष 2020 में 162 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2021 में 187 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2022 में 183 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2023 में 188 लाख मीट्रिक टन और वर्ष 2024 में 175 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हुई थी।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे बड़ा असर धान की पैदावार पर पड़ेगा क्योंकि यह फसल सबसे अधिक पानी मांगती है। इसके अलावा कपास, मक्का और मूंग की खेती भी प्रभावित होने की आशंका है। कम बारिश के कारण फसलों में विभिन्न प्रकार के रोग और कीटों का खतरा भी बढ़ सकता है।
पिछले वर्ष प्रदेश में बाढ़ से करीब पांच लाख एकड़ क्षेत्र की फसल खराब हो गई थी जबकि इस बार सूखे ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पहले से ही इन फसलों की पैदावार में गिरावट देखी जा रही है। ऐसे में कमजोर मानसून किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकता है।
180 लाख मीट्रिक टन धान खरीद के लक्ष्य पर खतरा
कम बारिश का असर राज्य सरकार के इस वर्ष तय किए गए 180 लाख मीट्रिक टन धान खरीद लक्ष्य पर भी पड़ सकता है। पिछले वर्ष भी सरकार ने 180 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा था जबकि मंडियों में 190 लाख मीट्रिक टन तक की तैयारी की गई थी। इसके बावजूद केवल 156 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हो सकी।
वर्ष 2016 के बाद यह सबसे कम खरीद रही थी। वर्ष 2016 में 140 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया था। हालांकि वर्ष 2025 को छोड़कर पिछले वर्षों में खरीद बेहतर रही है। वर्ष 2020 में 162 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2021 में 187 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2022 में 183 लाख मीट्रिक टन, वर्ष 2023 में 188 लाख मीट्रिक टन और वर्ष 2024 में 175 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद हुई थी।
बिजली संकट ने बढ़ाई किसानों की मुश्किल
इस बार किसानों को सूखे के साथ बिजली संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। धान की रोपाई के दौरान सरकार की ओर से आठ घंटे बिजली आपूर्ति का प्रावधान है ताकि किसान ट्यूबवेलों से सिंचाई कर सकें। लेकिन कई जिलों से केवल चार घंटे बिजली मिलने की शिकायतें सामने आई हैं।
प्रदेश में इस बार बिजली की मांग रिकॉर्ड 16,844 मेगावाट तक पहुंच गई। अधिक मांग और बढ़ते लोड के कारण कई स्थानों पर बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई जिससे किसानों को समय पर सिंचाई करने में दिक्कत आई।
15 से 20 फीसदी तक घट सकती है धान की पैदावार
पंजाब विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर हर्ष नैयर का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो धान की पैदावार में 15 से 20 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। उन्होंने बताया कि बारिश नहीं होने से किसान पूरी तरह ट्यूबवेल आधारित सिंचाई पर निर्भर हो गए हैं जिससे पंपिंग का खर्च 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि ऊपरी मिट्टी में नमी कम होने से मक्का और चरी की फसल भी प्रभावित होगी। इससे पशुओं के लिए उपलब्ध हरे चारे की मात्रा और उसकी पोषण गुणवत्ता घटेगी। इन फसलों की पैदावार में 12 से 18 फीसदी तक कमी आ सकती है।
प्रोफेसर नैयर के अनुसार लंबे समय तक सूखा और अधिक तापमान रहने पर कपास की फसल पर सफेद मक्खी और गुलाबी सुंडी का हमला बढ़ सकता है जिससे उत्पादन में 12 से 20 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। पिछले कुछ वर्षों से कपास की पैदावार पहले ही लगातार प्रभावित हो रही है।
उन्होंने बताया कि मिर्च और टमाटर जैसी कम गहराई वाली जड़ों वाली फसलों में भी नमी की भारी कमी होगी जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ेगा। अधिक गर्म मिट्टी के कारण पतझड़ की शुरुआत में लगाई जाने वाली फूलगोभी और टमाटर की पौध भी बड़ी संख्या में खराब हो सकती है। इससे इन फसलों की पैदावार 15 से 30 फीसदी तक घटने की आशंका है।
इस बार किसानों को सूखे के साथ बिजली संकट का भी सामना करना पड़ रहा है। धान की रोपाई के दौरान सरकार की ओर से आठ घंटे बिजली आपूर्ति का प्रावधान है ताकि किसान ट्यूबवेलों से सिंचाई कर सकें। लेकिन कई जिलों से केवल चार घंटे बिजली मिलने की शिकायतें सामने आई हैं।
प्रदेश में इस बार बिजली की मांग रिकॉर्ड 16,844 मेगावाट तक पहुंच गई। अधिक मांग और बढ़ते लोड के कारण कई स्थानों पर बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई जिससे किसानों को समय पर सिंचाई करने में दिक्कत आई।
15 से 20 फीसदी तक घट सकती है धान की पैदावार
पंजाब विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर हर्ष नैयर का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो धान की पैदावार में 15 से 20 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। उन्होंने बताया कि बारिश नहीं होने से किसान पूरी तरह ट्यूबवेल आधारित सिंचाई पर निर्भर हो गए हैं जिससे पंपिंग का खर्च 20 से 30 फीसदी तक बढ़ गया है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि ऊपरी मिट्टी में नमी कम होने से मक्का और चरी की फसल भी प्रभावित होगी। इससे पशुओं के लिए उपलब्ध हरे चारे की मात्रा और उसकी पोषण गुणवत्ता घटेगी। इन फसलों की पैदावार में 12 से 18 फीसदी तक कमी आ सकती है।
प्रोफेसर नैयर के अनुसार लंबे समय तक सूखा और अधिक तापमान रहने पर कपास की फसल पर सफेद मक्खी और गुलाबी सुंडी का हमला बढ़ सकता है जिससे उत्पादन में 12 से 20 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। पिछले कुछ वर्षों से कपास की पैदावार पहले ही लगातार प्रभावित हो रही है।
उन्होंने बताया कि मिर्च और टमाटर जैसी कम गहराई वाली जड़ों वाली फसलों में भी नमी की भारी कमी होगी जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ेगा। अधिक गर्म मिट्टी के कारण पतझड़ की शुरुआत में लगाई जाने वाली फूलगोभी और टमाटर की पौध भी बड़ी संख्या में खराब हो सकती है। इससे इन फसलों की पैदावार 15 से 30 फीसदी तक घटने की आशंका है।
रबी की फसलों पर भी दिखेगा असर
प्रोफेसर नैयर का कहना है कि इसका असर केवल खरीफ तक सीमित नहीं रहेगा। गेहूं जैसी रबी फसलों के लिए भी जमीन में नमी कम रहेगी। ऐसे में किसानों को बुआई से पहले अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ेगी जिससे शुरुआती लागत बढ़ेगी। समय पर बुआई प्रभावित होने से गेहूं की पैदावार में भी चार से आठ फीसदी तक कमी आ सकती है।
सरकार किसानों की मदद करे : राजेवाल
भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि केंद्र सरकार की रिपोर्ट भी यह स्वीकार कर रही है कि इस बार सामान्य से काफी कम बारिश हुई है और इसका असर फसलों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहले ही डीजल की कीमत बढ़ने से खेती की लागत में इजाफा हुआ है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है।
राजेवाल ने मांग की कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों किसानों की अतिरिक्त लागत और संभावित नुकसान को देखते हुए राहत पैकेज और आर्थिक सहायता की घोषणा करें।
रिकॉर्ड नहरी पानी उपलब्ध कराया
जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने कहा कि राज्य सरकार हर खेत तक नहरी पानी पहुंचाने के अभियान पर लगातार काम कर रही है ताकि भू-जल का दोहन कम हो सके। उनके अनुसार पहले केवल 17 से 18 फीसदी क्षेत्र में नहरी पानी का उपयोग होता था जो अब बढ़कर 86 फीसदी तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा कि इस बार धान सीजन में पहली बार रिकॉर्ड मात्रा में नहरी पानी उपलब्ध कराया गया है। सरकार का दावा है कि किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त नहरी पानी दिया गया और इस संबंध में किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी गई।
प्रोफेसर नैयर का कहना है कि इसका असर केवल खरीफ तक सीमित नहीं रहेगा। गेहूं जैसी रबी फसलों के लिए भी जमीन में नमी कम रहेगी। ऐसे में किसानों को बुआई से पहले अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ेगी जिससे शुरुआती लागत बढ़ेगी। समय पर बुआई प्रभावित होने से गेहूं की पैदावार में भी चार से आठ फीसदी तक कमी आ सकती है।
सरकार किसानों की मदद करे : राजेवाल
भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि केंद्र सरकार की रिपोर्ट भी यह स्वीकार कर रही है कि इस बार सामान्य से काफी कम बारिश हुई है और इसका असर फसलों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहले ही डीजल की कीमत बढ़ने से खेती की लागत में इजाफा हुआ है जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है।
राजेवाल ने मांग की कि केंद्र और राज्य सरकार दोनों किसानों की अतिरिक्त लागत और संभावित नुकसान को देखते हुए राहत पैकेज और आर्थिक सहायता की घोषणा करें।
रिकॉर्ड नहरी पानी उपलब्ध कराया
जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने कहा कि राज्य सरकार हर खेत तक नहरी पानी पहुंचाने के अभियान पर लगातार काम कर रही है ताकि भू-जल का दोहन कम हो सके। उनके अनुसार पहले केवल 17 से 18 फीसदी क्षेत्र में नहरी पानी का उपयोग होता था जो अब बढ़कर 86 फीसदी तक पहुंच गया है।
उन्होंने कहा कि इस बार धान सीजन में पहली बार रिकॉर्ड मात्रा में नहरी पानी उपलब्ध कराया गया है। सरकार का दावा है कि किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त नहरी पानी दिया गया और इस संबंध में किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी गई।