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ऑक्सीजन प्लांटों को चालू करने का मामला: हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, दो अफसरों को नोटिस जारी
Sat, 04 Jul 2026 08:05 PM IST
शाहिल शर्मा
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: शाहिल शर्मा
Updated Sat, 04 Jul 2026 08:05 PM IST
सार
ऑक्सीजन प्लांट फगवाड़ा और होशियारपुर सहित कई सरकारी अस्पतालों में निष्क्रिय हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे सरकारी धन की बर्बादी हो रही है।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कोविड-19 के दौरान लगाए गए पीएसए ऑक्सीजन प्लांटों को चालू करने के मामले में नाराजगी जताई है। कोर्ट ने आदेशों की अनदेखी को गंभीरता से लिया है। इस मामले में दो वरिष्ठ अधिकारियों को अवमानना नोटिस जारी किया गया है।
पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन के निदेशक और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को नोटिस मिला है। यह नोटिस पीपुल वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर अवमानना याचिका पर जारी हुआ। एडवोकेट कंवर पाहुल सिंह ने यह याचिका दाखिल की थी। मूल जनहित याचिका में कहा गया था कि कोविड महामारी के दौरान करोड़ों रुपये के पीएसए ऑक्सीजन प्लांट बंद पड़े हैं।
ये प्लांट फगवाड़ा और होशियारपुर सहित कई सरकारी अस्पतालों में निष्क्रिय हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे सरकारी धन की बर्बादी हो रही है। भविष्य में आपात स्थिति में मरीजों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। हाईकोर्ट ने 13 मई 2026 को जनहित याचिका का निपटारा किया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को नया मांगपत्र देने का निर्देश दिया था। संबंधित अधिकारियों को 15 दिन में विस्तृत आदेश पारित करने को कहा गया था।
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पंजाब हेल्थ सिस्टम्स कॉरपोरेशन के निदेशक और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को नोटिस मिला है। यह नोटिस पीपुल वेलफेयर सोसायटी की ओर से दायर अवमानना याचिका पर जारी हुआ। एडवोकेट कंवर पाहुल सिंह ने यह याचिका दाखिल की थी। मूल जनहित याचिका में कहा गया था कि कोविड महामारी के दौरान करोड़ों रुपये के पीएसए ऑक्सीजन प्लांट बंद पड़े हैं।
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ये प्लांट फगवाड़ा और होशियारपुर सहित कई सरकारी अस्पतालों में निष्क्रिय हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि इससे सरकारी धन की बर्बादी हो रही है। भविष्य में आपात स्थिति में मरीजों की जान भी खतरे में पड़ सकती है। हाईकोर्ट ने 13 मई 2026 को जनहित याचिका का निपटारा किया था। अदालत ने याचिकाकर्ता को नया मांगपत्र देने का निर्देश दिया था। संबंधित अधिकारियों को 15 दिन में विस्तृत आदेश पारित करने को कहा गया था।
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आदेश की अवहेलना
याचिकाकर्ता ने 18 मई को हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप प्रतिनिधित्व भेजा था। यह 19 मई को संबंधित कार्यालयों में पहुंच गया था। तय अवधि समाप्त होने के बाद भी कोई निर्णय नहीं लिया गया। न ही याचिकाकर्ता को कोई स्पीकिंग ऑर्डर भेजा गया। याची ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने न्यायालय के स्पष्ट आदेश की जानबूझकर अवहेलना की है।
अवमानना याचिका की मांगें
अवमानना याचिका में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। न्याय प्रशासन में देरी के लिए उन पर 50-50 हजार रुपये का दंड लगाने की भी मांग है। यह राशि किसी बाल कल्याण संस्था को देने का निर्देश मांगा गया है। याचिका में कहा गया कि सरकारी अधिकारी अक्सर अवमानना कार्रवाई शुरू होने पर ही आदेश मानते हैं। इससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।
याचिकाकर्ता ने 18 मई को हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप प्रतिनिधित्व भेजा था। यह 19 मई को संबंधित कार्यालयों में पहुंच गया था। तय अवधि समाप्त होने के बाद भी कोई निर्णय नहीं लिया गया। न ही याचिकाकर्ता को कोई स्पीकिंग ऑर्डर भेजा गया। याची ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने न्यायालय के स्पष्ट आदेश की जानबूझकर अवहेलना की है।
अवमानना याचिका की मांगें
अवमानना याचिका में अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। न्याय प्रशासन में देरी के लिए उन पर 50-50 हजार रुपये का दंड लगाने की भी मांग है। यह राशि किसी बाल कल्याण संस्था को देने का निर्देश मांगा गया है। याचिका में कहा गया कि सरकारी अधिकारी अक्सर अवमानना कार्रवाई शुरू होने पर ही आदेश मानते हैं। इससे अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है।