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ट्यूशन जाने से बचने के लिए की थी हत्या: हाईकोर्ट ने कहा-16 वर्षीय किशोर पर वयस्क की तरह चलेगा मुकदमा
Fri, 10 Jul 2026 10:44 AM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Fri, 10 Jul 2026 10:44 AM IST
सार
पांच अगस्त 2025 को दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, ट्यूशन पढ़ाने वाली महिला ने बताया कि उनका 16 वर्षीय छात्र रोजाना दोपहर में पढ़ने आता था। उन्हें अपनी सास की चीख सुनाई दी। बाहर आकर देखा तो उनकी सास बिस्तर पर खून से लथपथ पड़ी थीं और छात्र वहीं खड़ा था।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 16 वर्षीय किशोर पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है।
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अदालत ने कहा कि उपलब्ध मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और प्रारंभिक मूल्यांकन रिपोर्टों से स्पष्ट है कि किशोर में कथित अपराध को अंजाम देने और उसके परिणाम समझने की पर्याप्त मानसिक व शारीरिक क्षमता थी। ऐसे में उसे किशोर के बजाय वयस्क की तरह मुकदमे का सामना करना होगा।
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न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से यह भी सामने आता है कि आरोपी ने अपने ट्यूशन अध्यापक पर ही संदेह का माहौल बनाने की कोशिश की। उसने यह कहानी गढ़ी कि अध्यापक के अपनी सास के साथ संबंध अच्छे नहीं थे और उन्होंने एक बार उन्हें थप्पड़ भी मारा था। अदालत ने इसे आरोपी की परिपक्व सोच का संकेत माना।
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अदालत के आदेश में आरोपी के पिता के बयान का भी उल्लेख किया गया है। पिता के अनुसार, उनका बेटा ट्यूशन पढ़ने नहीं जाना चाहता था और शिक्षक को डराने के उद्देश्य से उसने यह वारदात की। हाईकोर्ट ने कहा कि यह पहलू भी मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
मामला फरीदाबाद का है। 5 अगस्त 2025 को दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, ट्यूशन पढ़ाने वाली महिला ने बताया कि उनका 16 वर्षीय छात्र रोजाना दोपहर में पढ़ने आता था। उन्हें अपनी सास की चीख सुनाई दी। बाहर आकर देखा तो उनकी सास बिस्तर पर खून से लथपथ पड़ी थीं और छात्र वहीं खड़ा था। बाद में घायल महिला की मौत हो गई। घटना के समय आरोपी की उम्र लगभग 16 वर्ष 4 माह थी। किशोर न्याय बोर्ड ने उसे किशोर मानते हुए उसी के अनुरूप मुकदमा चलाने का आदेश दिया था।
मृतका की बहू ने बोर्ड के आदेश को सत्र अदालत में चुनौती दी। सत्र अदालत ने बोर्ड का फैसला रद्द करते हुए कहा था कि उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलना चाहिए। इसी आदेश के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि मनोचिकित्सक की रिपोर्ट में आरोपी को औसत से अधिक बुद्धिमान छात्र बताया गया है। प्रारंभिक मूल्यांकन में यह भी सामने आया कि उसके भविष्य को लेकर स्पष्ट लक्ष्य थे। इसलिए सत्र अदालत का आदेश सही है और उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।