हिरासत में मौतों पर गंभीर सवाल: लोकसभा में खुलासे से सामने आए पांच साल के आंकड़े, राजस्थान 5वें स्थान पर
Deaths in Police Custody: लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार देश में हर साल 140-175 हिरासत मौतें हो रही हैं। महाराष्ट्र शीर्ष पर है, जबकि राजस्थान पांचवें स्थान पर है। हालिया वर्ष में मामलों में बढ़ोतरी देखी गई, जिससे निगरानी और जवाबदेही मजबूत करने की जरूरत सामने आई।
विस्तार
बांसवाड़ा-डूंगरपुर के सांसद राजकुमार रोत द्वारा लोकसभा में उठाए गए हिरासत में मौतों के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने विस्तृत जवाब प्रस्तुत किया है, जिसमें पिछले पांच वर्षों के आंकड़े सामने आए हैं। सरकार के अनुसार वर्ष 2021 से 15 मार्च 2026 तक देश में हर साल 140 से 175 के बीच हिरासत में मौतों के मामले दर्ज हुए हैं, जो इस विषय की गंभीरता को दर्शाते हैं।
महाराष्ट्र में इस अवधि के दौरान हर साल लगभग 14 से 30 मामले सामने आए, जिससे यह राज्य शीर्ष पर बना रहा। गुजरात में हर साल करीब 14 से 24 मामले दर्ज किए गए। राजस्थान में भी अलग-अलग वर्षों में 4 से 18 तक मामले सामने आए और हाल के वर्ष में बढ़ोतरी देखने को मिली। मध्यप्रदेश में भी हर साल लगभग 8 से 12 मामलों की पुष्टि हुई है।
महाराष्ट्र पहले, राजस्थान पांचवें स्थान पर
पिछले पांच साल में हिरासत में होने वाली मौतों के आंकड़ों में महाराष्ट्र एक नंबर पर है, जहां पांच साल में हिरासत में 101 मौतें हुई, दूसरे नंबर पर गुजरात है जहां 85 मौतें हुई। बिहार 85 मौतों के साथ तीसरे, उत्तर प्रदेश 56 मौतों के साथ चौथे और राजस्थान 51 मौतों के साथ पांचवें स्थान पर है।
राजस्थान में बढ़ा हिरासत में मौतों का आंकड़ा
राजस्थान में 5 साल में हिरासत में 51 मौतें हुई हैं। 2025-26 में 15 मार्च तक हिरासत में 18 मौतें हो चुकी हैं, जो गत पांच साल में सबसे अधिक है। 2020-21 में 13, 2022-23 में 04, 2023-24 में 07 और 2024-25 में हिरासत में 9 मौतें हुई थी।
बिहार पहले, राजस्थान दूसरे नंबर पर
हिरासत में मौत के मामले में 2025- 26 में 15 मार्च तक बिहार में 19 मौतें हुई हैं। बिहार देश में पहले नंबर व राजस्थान 18 मौतों के साथ दूसरे तथा उत्तर प्रदेश 15 मौतों के साथ तीसरे नंबर पर है। गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब में 14-14 मौतें हुई है। तीनों राज्य हिरासत में मौतों के मामले में चौथे नंबर पर हैं।
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24 घंटे के भीतर सूचना देना अनिवार्य
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रत्येक हिरासत मृत्यु की सूचना 24 घंटे के भीतर देना अनिवार्य है। नियमानुसार जांच की प्रक्रिया भी तय है। हालांकि, जिलेवार जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात सामने आने से यह आवश्यकता महसूस होती है कि निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था को और अधिक मजबूत किया जाए, ताकि ऐसी घटनाओं में प्रभावी कमी लाई जा सके।
‘यह अत्यंत संवेदनशील मुद्दा’
सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि हिरासत में होने वाली मौतें अत्यंत संवेदनशील मुद्दा हैं और इस पर लगातार निगरानी तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि आंकड़े सामने आना महत्वपूर्ण है। इनके आधार पर प्रभावी कार्रवाई और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाना और भी आवश्यक है।