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आदिवासी क्षेत्रों की भयावह तस्वीर: डूंगरपुर में 72.6% महिलाएं एनीमिया की शिकार, सांसद ने सदन में उठाया मुद्दा

Sat, 01 Aug 2026 01:37 PM IST
बांसवाड़ा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, डूंगरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, डूंगरपुर Published by: बांसवाड़ा ब्यूरो Updated Sat, 01 Aug 2026 01:37 PM IST
सार

आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले में महिलाओं और गर्भवती माताओं में एनीमिया की गंभीर स्थिति सामने आने के बाद सांसद राजकुमार रोत ने केंद्र सरकार से विशेष कार्ययोजना बनाने की मांग की है। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों ने मातृ स्वास्थ्य को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।

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Dungarpur News: 72.6% Women Suffer from Anaemia in Tribal Region, MP Raises Issue in Parliament
राजस्थान के आदिवासी इलाकों में आधी से ज्यादा महिलाओं में खून की कमी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बांसवाड़ा-डूंगरपुर के सांसद राजकुमार रोत द्वारा लोकसभा में उठाए गए सवाल पर केंद्र सरकार के जवाब ने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य की गंभीर और चिंताजनक तस्वीर उजागर कर दी है। सरकार ने स्वीकार किया है कि एनएफएचएस-5 (2019-21) के अनुसार डूंगरपुर जिले की 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 72.6% महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जबकि राजस्थान का औसत 54.4% है। वहीं राज्य की आदिवासी समाज की महिलाओं में एनीमिया की दर 61.6% है।

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सांसद राजकुमार रोत के सवाल पर सरकार ने बताया कि अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच डूंगरपुर जिले में 34,304 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई, जिनमें 3,152 महिलाएं गंभीर एनीमिया से पीड़ित पाई गईं। इतना ही नहीं इसी अवधि में जिला अस्पताल से जारी 5,390 यूनिट रक्त में से 1,662 यूनिट रक्त केवल गंभीर एनीमिया से ग्रस्त गर्भवती महिलाओं को चढ़ाना पड़ा, जो आदिवासी क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था की भयावह स्थिति को दर्शाता है।
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अभियान गिनाने से समाधान नहीं
सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि जब सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि आदिवासी महिलाओं में एनीमिया महामारी जैसी स्थिति में पहुंच चुका है, तब केवल योजनाओं और अभियानों की सूची गिनाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। वर्षों से एनीमिया मुक्त भारत अभियान, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, जननी सुरक्षा योजना और अन्य योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन यदि डूंगरपुर जैसे आदिवासी जिले में हजारों गर्भवती महिलाएं गंभीर एनीमिया की शिकार हैं और बड़ी संख्या में रक्त चढ़ाने की नौबत आ रही है, तो यह सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन की विफलता का स्पष्ट प्रमाण है।

बनाई जाए विशेष कार्ययोजना
उन्होंने केंद्र सरकार से आदिवासी बहुल जिलों के लिए विशेष मातृ स्वास्थ्य एवं पोषण मिशन शुरू करने, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने, आयरन एवं पोषण कार्यक्रमों की स्वतंत्र निगरानी कराने और इस संकट पर समयबद्ध कार्ययोजना लागू करने की मांग की। साथ ही कहा कि आदिवासी माताओं का जीवन केवल सरकारी रिपोर्टों और योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि देश की सबसे बड़ी मानवीय जिम्मेदारी है।

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