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Rajasthan: भीलवाड़ा में डिलीवरी के बाद 2 प्रसूताओं की मौत, जुलाई में आंकड़ा 7 पहुंचा; रक्तस्राव बना कारण
Fri, 31 Jul 2026 10:14 PM IST
भीलवाड़ा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा
Published by: भीलवाड़ा ब्यूरो
Updated Fri, 31 Jul 2026 10:14 PM IST
सार
Rajasthan News: भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में नॉर्मल डिलीवरी के बाद पोस्टपार्टम ब्लीडिंग के कारण दो प्रसूताओं की मौत हो गई। दोनों महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी में नहीं थीं। जुलाई में अस्पताल में प्रसूताओं की मौत का आंकड़ा सात पहुंच गया है, जिससे मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और प्रसव के बाद निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
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भीलवाड़ा में दो प्रसूताओं की मौत
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भीलवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय की मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य इकाई में बुधवार देर रात नॉर्मल डिलीवरी के बाद दो प्रसूताओं की मौत हो गई। एक परिवार दूसरी संतान के जन्म की खुशी मना रहा था, जबकि दूसरे घर में पहली बार किलकारी गूंजी थी। लेकिन कुछ ही घंटों में दोनों परिवारों की खुशियां मातम में बदल गईं। दोनों महिलाओं की मौत प्रसव के बाद हुए अत्यधिक रक्तस्राव (पोस्टपार्टम हेमरेज) के कारण हुई। इन घटनाओं के बाद जुलाई महीने में एमजी अस्पताल में प्रसूताओं की मौत का आंकड़ा सात तक पहुंच गया है।
प्रदेश में लगातार सामने आ रहे मातृ मृत्यु के मामले
पिछले तीन महीनों में राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत के कई मामले सामने आए हैं। मई में कोटा के सरकारी अस्पताल में पांच महिलाओं की मौत हुई थी। जून में बीकानेर में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद छह महिलाओं की किडनी फेल हुई, जिनमें दो की जान चली गई। अब भीलवाड़ा में एक ही रात में दो प्रसूताओं की मौत ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, प्रसव के बाद निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दूसरे बच्चे को जन्म देने के बाद सुगना ने तोड़ दिया दम
पहला मामला कोटड़ी क्षेत्र के दांतड़ा गांव निवासी 22 वर्षीय सुगना बैरवा का है। शाहपुरा जिला अस्पताल में सामान्य प्रसव के बाद उन्हें अचानक अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचने तक उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टरों के अनुसार उनका हीमोग्लोबिन केवल 1.8 ग्राम और प्लेटलेट्स करीब चार हजार थे। आईसीयू में भर्ती कर वेंटिलेटर सपोर्ट, रक्त और प्लेटलेट्स चढ़ाने सहित सभी प्रयास किए गए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वह अपने दूसरे नवजात को ठीक से देख भी नहीं सकीं।
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पहली संतान की खुशी एक घंटे में मातम में बदली
दूसरी घटना पटेल नगर निवासी 18 वर्षीय रानी बंजारा की है। मूल रूप से कोटड़ी क्षेत्र के कोठाज गांव की रहने वाली रानी की एमजी अस्पताल में सामान्य डिलीवरी हुई थी। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ बताए जा रहे थे, लेकिन प्रसव के करीब एक घंटे बाद अचानक पोस्टपार्टम हेमरेज शुरू हो गया। डॉक्टरों ने दवाइयों से रक्तस्राव रोकने और ऑपरेशन की तैयारी की, लेकिन हालत इतनी तेजी से बिगड़ी कि सर्जरी का मौका ही नहीं मिल सका। बाद में उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया और तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
जब हाई रिस्क नहीं थीं, तो आखिर कहां हुई चूक?
दोनों महिलाओं की मौत ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब उनकी गर्भावस्था सामान्य थी और वे हाई रिस्क श्रेणी में भी नहीं थीं, तो आखिर ऐसी कौन-सी चूक हुई जिसने दो नवजात बच्चों से उनकी मां का साया छीन लिया। अब इस पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग ने जांच के दिए आदेश
भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि दोनों महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी में नहीं थीं। प्रसव के बाद अचानक जटिलताएं सामने आईं। दोनों मामलों की केस हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, उपचार प्रक्रिया और मृत्यु के कारणों की विस्तृत जांच कराई जाएगी।
महात्मा गांधी अस्पताल के पीएमओ डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि अत्यधिक रक्तस्राव के कारण दोनों मरीजों का हीमोग्लोबिन तेजी से गिर गया था। अस्पताल में उपलब्ध सभी संसाधनों के साथ इलाज किया गया, लेकिन मरीजों को बचाया नहीं जा सका।
23% गर्भवतियां हाई रिस्क, लेकिन मौतें सामान्य श्रेणी की महिलाओं की भी
हाल ही में जिले में चलाए गए विशेष स्क्रीनिंग अभियान में 2,210 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। इनमें 500 महिलाएं यानी लगभग 23 प्रतिशत हाई रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी में मिलीं। इनमें गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और किडनी रोग, पूर्व सिजेरियन तथा जुड़वां गर्भ जैसी स्थितियां शामिल थीं।
यह भी पढ़ें: टोस्ट पर ₹1 ज्यादा वसूला, ऑफर की चीनी भी नहीं दी! स्मार्ट बाजार पर उपभोक्ता आयोग का बड़ा एक्शन
हालांकि हाल में जिन प्रसूताओं की मौत हुई, उनमें से कई महिलाएं हाई रिस्क श्रेणी में नहीं थीं। इससे विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव के बाद शुरुआती 24 घंटे की निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
प्रदेश में हालिया मातृ मृत्यु के मामले
विशेषज्ञों ने बताए बचाव के उपाय
आरवीआरएस मेडिकल कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. सुशीला आगीवाल के अनुसार, मातृ मृत्यु रोकने के लिए गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, एनीमिया का समय पर उपचार, पर्याप्त पोषण, मजबूत रेफरल सिस्टम और प्रसव के बाद कम से कम 24 घंटे तक सघन निगरानी बेहद जरूरी है। साथ ही डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को पोस्टपार्टम हेमरेज जैसी आपात स्थितियों से निपटने का नियमित प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।
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प्रदेश में लगातार सामने आ रहे मातृ मृत्यु के मामले
पिछले तीन महीनों में राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की मौत के कई मामले सामने आए हैं। मई में कोटा के सरकारी अस्पताल में पांच महिलाओं की मौत हुई थी। जून में बीकानेर में सिजेरियन ऑपरेशन के बाद छह महिलाओं की किडनी फेल हुई, जिनमें दो की जान चली गई। अब भीलवाड़ा में एक ही रात में दो प्रसूताओं की मौत ने मातृ स्वास्थ्य सेवाओं, प्रसव के बाद निगरानी और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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दूसरे बच्चे को जन्म देने के बाद सुगना ने तोड़ दिया दम
पहला मामला कोटड़ी क्षेत्र के दांतड़ा गांव निवासी 22 वर्षीय सुगना बैरवा का है। शाहपुरा जिला अस्पताल में सामान्य प्रसव के बाद उन्हें अचानक अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल रेफर किया गया। अस्पताल पहुंचने तक उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टरों के अनुसार उनका हीमोग्लोबिन केवल 1.8 ग्राम और प्लेटलेट्स करीब चार हजार थे। आईसीयू में भर्ती कर वेंटिलेटर सपोर्ट, रक्त और प्लेटलेट्स चढ़ाने सहित सभी प्रयास किए गए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वह अपने दूसरे नवजात को ठीक से देख भी नहीं सकीं।
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पहली संतान की खुशी एक घंटे में मातम में बदली
दूसरी घटना पटेल नगर निवासी 18 वर्षीय रानी बंजारा की है। मूल रूप से कोटड़ी क्षेत्र के कोठाज गांव की रहने वाली रानी की एमजी अस्पताल में सामान्य डिलीवरी हुई थी। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ बताए जा रहे थे, लेकिन प्रसव के करीब एक घंटे बाद अचानक पोस्टपार्टम हेमरेज शुरू हो गया। डॉक्टरों ने दवाइयों से रक्तस्राव रोकने और ऑपरेशन की तैयारी की, लेकिन हालत इतनी तेजी से बिगड़ी कि सर्जरी का मौका ही नहीं मिल सका। बाद में उन्हें कार्डियक अरेस्ट आया और तमाम प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
जब हाई रिस्क नहीं थीं, तो आखिर कहां हुई चूक?
दोनों महिलाओं की मौत ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब उनकी गर्भावस्था सामान्य थी और वे हाई रिस्क श्रेणी में भी नहीं थीं, तो आखिर ऐसी कौन-सी चूक हुई जिसने दो नवजात बच्चों से उनकी मां का साया छीन लिया। अब इस पूरे मामले की जांच कराई जाएगी।
स्वास्थ्य विभाग ने जांच के दिए आदेश
भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजीव शर्मा ने बताया कि दोनों महिलाएं हाई रिस्क प्रेग्नेंसी में नहीं थीं। प्रसव के बाद अचानक जटिलताएं सामने आईं। दोनों मामलों की केस हिस्ट्री, सोनोग्राफी रिपोर्ट, उपचार प्रक्रिया और मृत्यु के कारणों की विस्तृत जांच कराई जाएगी।
महात्मा गांधी अस्पताल के पीएमओ डॉ. अरुण गौड़ ने बताया कि अत्यधिक रक्तस्राव के कारण दोनों मरीजों का हीमोग्लोबिन तेजी से गिर गया था। अस्पताल में उपलब्ध सभी संसाधनों के साथ इलाज किया गया, लेकिन मरीजों को बचाया नहीं जा सका।
23% गर्भवतियां हाई रिस्क, लेकिन मौतें सामान्य श्रेणी की महिलाओं की भी
हाल ही में जिले में चलाए गए विशेष स्क्रीनिंग अभियान में 2,210 गर्भवती महिलाओं की जांच की गई। इनमें 500 महिलाएं यानी लगभग 23 प्रतिशत हाई रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी में मिलीं। इनमें गंभीर एनीमिया, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय और किडनी रोग, पूर्व सिजेरियन तथा जुड़वां गर्भ जैसी स्थितियां शामिल थीं।
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हालांकि हाल में जिन प्रसूताओं की मौत हुई, उनमें से कई महिलाएं हाई रिस्क श्रेणी में नहीं थीं। इससे विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव के बाद शुरुआती 24 घंटे की निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
प्रदेश में हालिया मातृ मृत्यु के मामले
- मई (कोटा): सरकारी अस्पताल में पांच प्रसूताओं की मौत।
- जून (बीकानेर): सिजेरियन के बाद छह महिलाओं की किडनी फेल, दो की मौत।
- जुलाई (बांसवाड़ा): इलाज के दौरान दो प्रसूताओं की मौत।
- जुलाई (भीलवाड़ा): अलग-अलग कारणों से सात प्रसूताओं की मौत, जिनमें बुधवार रात की दो घटनाएं शामिल।
विशेषज्ञों ने बताए बचाव के उपाय
आरवीआरएस मेडिकल कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. सुशीला आगीवाल के अनुसार, मातृ मृत्यु रोकने के लिए गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, एनीमिया का समय पर उपचार, पर्याप्त पोषण, मजबूत रेफरल सिस्टम और प्रसव के बाद कम से कम 24 घंटे तक सघन निगरानी बेहद जरूरी है। साथ ही डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को पोस्टपार्टम हेमरेज जैसी आपात स्थितियों से निपटने का नियमित प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए।