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Rajasthan: जैसलमेर के अलगोजा वादक तगाराम भील को 'पद्मश्री', 7 साल की उम्र में मवेशी चराते हुए सीखी थी कला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: जयपुर ब्यूरो
Updated Mon, 25 May 2026 03:23 PM IST
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सार
थार के रेगिस्तान की मिट्टी से उठी अलगोजा की मधुर धुनों ने तगाराम भील को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मश्री तक पहुंचा दिया। जैसलमेर के इस लोक कलाकार ने अपनी कला से राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच तक पहुंचाया है।
जैसलमेर के तगाराम भील को पद्मश्री
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जैसलमेर के मूलसागर गांव से निकलकर थार रेगिस्तान की लोकधुनों को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाले प्रसिद्ध अलगोजा वादक तगाराम भील को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है। लोक संगीत के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान और अलगोजा वादन की परंपरा को जीवित रखने के प्रयासों को यह बड़ा सम्मान माना जा रहा है।
17 अप्रैल 1960 को जैसलमेर के मूलसागर गांव में जन्मे तगाराम भील ने बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव विकसित कर लिया था। महज सात वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ मवेशी चराते समय अलगोजा बजाना सीखना शुरू किया। वर्षों की कठिन साधना और अभ्यास के बाद उन्होंने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र में महारथ हासिल की। अलगोजा थार क्षेत्र का प्रसिद्ध लोक वाद्य है, जिसे शीशम और कैर की सूखी लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें दो बांसुरियां जुड़ी होती हैं, जिन्हें एक साथ मुंह और गले की विशेष तकनीक से बजाया जाता है।
तगाराम भील को पहला बड़ा मंच वर्ष 1981 में मिला, जब उन्हें जैसलमेर के गोपा चौक में स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रस्तुति देने का अवसर मिला। उनकी प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्हें देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशों से आए पर्यटकों व मेहमानों के सामने प्रदर्शन करने के कई अवसर मिले।
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उन्होंने उस्ताद अकबर खान और उस्ताद अर्बा संगीत संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया। तगाराम ने राजस्थान दिवस, डेजर्ट फेस्टिवल जैसलमेर, कैमल फेस्टिवल बीकानेर, पुष्कर मेला, मारवाड़ महोत्सव, जयपुर और उदयपुर के सांस्कृतिक आयोजनों सहित देश के अनेक बड़े मंचों पर प्रस्तुति दी। इसके अलावा उन्होंने फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, पुर्तगाल, जापान, सिंगापुर और अमेरिका में भी लोक संगीत की प्रस्तुतियां देकर राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर तक पहुंचाया।
लोक संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें महारावल गिरधर पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार, आदिवासी सम्मान, अमृत गंगा पुरस्कार और गौरव सम्मान सहित कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। पद्मश्री मिलने के बाद लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों में खुशी का माहौल है।
17 अप्रैल 1960 को जैसलमेर के मूलसागर गांव में जन्मे तगाराम भील ने बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव विकसित कर लिया था। महज सात वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ मवेशी चराते समय अलगोजा बजाना सीखना शुरू किया। वर्षों की कठिन साधना और अभ्यास के बाद उन्होंने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र में महारथ हासिल की। अलगोजा थार क्षेत्र का प्रसिद्ध लोक वाद्य है, जिसे शीशम और कैर की सूखी लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें दो बांसुरियां जुड़ी होती हैं, जिन्हें एक साथ मुंह और गले की विशेष तकनीक से बजाया जाता है।
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तगाराम भील को पहला बड़ा मंच वर्ष 1981 में मिला, जब उन्हें जैसलमेर के गोपा चौक में स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रस्तुति देने का अवसर मिला। उनकी प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद उन्हें देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशों से आए पर्यटकों व मेहमानों के सामने प्रदर्शन करने के कई अवसर मिले।
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उन्होंने उस्ताद अकबर खान और उस्ताद अर्बा संगीत संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया। तगाराम ने राजस्थान दिवस, डेजर्ट फेस्टिवल जैसलमेर, कैमल फेस्टिवल बीकानेर, पुष्कर मेला, मारवाड़ महोत्सव, जयपुर और उदयपुर के सांस्कृतिक आयोजनों सहित देश के अनेक बड़े मंचों पर प्रस्तुति दी। इसके अलावा उन्होंने फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, पुर्तगाल, जापान, सिंगापुर और अमेरिका में भी लोक संगीत की प्रस्तुतियां देकर राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर तक पहुंचाया।
लोक संगीत के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें महारावल गिरधर पुरस्कार, मरूधरा पुरस्कार, आदिवासी सम्मान, अमृत गंगा पुरस्कार और गौरव सम्मान सहित कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। पद्मश्री मिलने के बाद लोक कलाकारों और संगीत प्रेमियों में खुशी का माहौल है।