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Rajasthan News: राजस्थान में OBC आरक्षण का 'ट्रिपल टेस्ट' क्या है? पंचायत-निकाय चुनाव से पहले समझिए पूरा गणित

Tue, 04 Aug 2026 04:04 PM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: Sourabh Bhatt Updated Tue, 04 Aug 2026 04:04 PM IST
सार

ओबीसी आयोग की ट्रिपल टेस्ट रिपोर्ट तैयार हो चुकी है। संभवत: बुधवार को यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जाएगी। लेकिन ट्रिपल टेस्ट है क्या और इसकी जरूरत क्यूं पड़ी- इसे लेकर अमर उजाला ने पंचायती राज विशेषज्ञ से बातचीत की...

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Rajasthan OBC Reservation: What is the Triple Test Before Panchayat and Municipal Elections?
राज्य निर्वाचन आयोग - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों से पहले राज्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की रिपोर्ट सबसे अहम दस्तावेज बनने जा रही है। यह रिपोर्ट तय करेगी कि स्थानीय निकायों में ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण किस आधार पर और कितनी सीमा तक दिया जाएगा। इसकी वजह सुप्रीम कोर्ट का तय किया गया 'ट्रिपल टेस्ट' (Triple Test) है, जिसे पूरा किए बिना पंचायत और नगर निकायों में ओबीसी आरक्षण संवैधानिक रूप से टिक नहीं सकता।
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दरअसल, संविधान अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को उनकी आबादी के अनुपात में स्थानीय निकायों में आरक्षण का अधिकार देता है, लेकिन ओबीसी के मामले में राज्य सरकार को केवल कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। इसी अधिकार के इस्तेमाल के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन अनिवार्य शर्तें तय की हैं।
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क्यों पड़ा ट्रिपल टेस्ट की जरूरत?

राजस्थान के पंचायती राज विशेषज्ञ बीडी कृपलानी ने इस मुद्दे पर अमर उजाला से बातचीत करते हुए बताया- कई राज्यों में ओबीसी आरक्षण के लिए राजनैतिक आधार केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जा रहा था। महाराष्ट्र में इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर बनी सूची का इस्तेमाल राजनीतिक आरक्षण के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि राजनीतिक प्रतिनिधित्व अलग विषय है।
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इसी विवाद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले यह साबित करना होगा कि संबंधित समुदाय राजनीतिक रूप से भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखता।

ट्रिपल टेस्ट की तीन शर्तें

1. समर्पित आयोग का गठन
राज्य सरकार को एक समर्पित आयोग बनाना होगा, जो स्थानीय निकायों में ओबीसी के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन करेगा। सामान्य पिछड़ा वर्ग आयोग या केवल सामाजिक-शैक्षणिक आंकड़े पर्याप्त नहीं होंगे।

2. स्थानीय निकायवार अध्ययन
आयोग को जिला परिषद, पंचायत समिति, ग्राम पंचायत और नगर निकाय स्तर पर अलग-अलग अध्ययन करना होगा। पूरे राज्य के लिए एक समान आरक्षण प्रतिशत तय नहीं किया जा सकता।

3. 50 प्रतिशत की सीमा
एससी, एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण किसी भी स्थानीय निकाय में 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।

क्या देखता है आयोग?

आयोग केवल जाति की आबादी नहीं देखता। वह यह भी अध्ययन करता है कि संबंधित समुदाय का स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कितना है। इसके साथ सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति, महिलाओं की स्थिति, साक्षरता और अन्य संकेतकों का भी मूल्यांकन किया जाता है। इन्हीं आधारों पर आरक्षण की सिफारिश तैयार होती है।

क्या बदल जाएगी OBC जातियों की सूची?

रिपोर्ट का उद्देश्य नई जातियों को जोड़ना या पुरानी जातियों को हटाना नहीं है। आयोग यह नहीं तय करता कि कौन-सी जाति ओबीसी होगी, बल्कि यह देखता है कि पहले से ओबीसी सूची में शामिल समुदायों को स्थानीय निकायों में राजनीतिक आरक्षण किस सीमा तक मिलना चाहिए।

राजस्थान सरकार द्वारा अधिसूचित पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में वर्तमान में 91 जातियां और वर्ग शामिल हैं। इनमें यादव (अहीर), जाट, गुर्जर, माली-सैनी, चारण, बंजारा, जांगिड़-खाती, दर्जी, धाकड़, निषाद (धीवर-कहार), गड़रिया, तेली, नाथ-जोगी, कुशवाहा (काछी), कुम्हार, लोहार, स्वर्णकार, रैबारी, रावत, विश्नोई, मेव, गद्दी, कायमखानी सहित विभिन्न हिंदू और मुस्लिम समुदायों के अनेक सामाजिक समूह शामिल हैं। समय-समय पर राज्य सरकार ने अधिसूचनाओं के माध्यम से इस सूची में संशोधन और उपजातियों को शामिल किया है। स्थानीय निकायों में ओबीसी राजनीतिक आरक्षण के लिए इन्हीं अधिसूचित जातियों को आधार माना जाता है, हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार आरक्षण का निर्धारण अब केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं, बल्कि राज्य ओबीसी आयोग द्वारा किए जाने वाले ट्रिपल टेस्ट के अध्ययन और सिफारिशों के आधार पर किया जाता है।

राजस्थान में ट्रिपल टेस्ट पर इतना विवाद क्यों हुआ ?

ट्रिपल टेस्ट फार्मूला पूर्ववर्ती गहलोत सरकार के समय ही लागू हो चुका था। लेकिन गहलोत सरकार में इस फार्मूले के लागू होने से पहले ही पंचायत-निकाय चुनाव हो चुके थे। दूसरा सुप्रीम कोर्ट के फैसले
को लेकर एक भ्रम की स्थिति भी बन रही थी कि क्या इस ट्रिपल टेस्ट के लागू होने से ओबीसी की मजबूत जातियां इससे बाहर हो जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्य सरकार यदि इस तरह ट्रिपल टेस्ट लागू नहीं करती हैं तो चुनाव आयोग बिना ओबीसी रिजर्वेशन के चुनाव करवा सकती है।

राजस्थान की मौजूदा सरकार भी इस मामले को लेकर बैठी रही क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर क्लीयरटी नहीं थी। इसके बाद मौजूदा सरकार में राजस्थान से *बीडी कृपलानी के प्रतिनिधित्व में एक कमेटी एमपी* भेजी गई यह देखने के लिए कि ट्रिपल टेस्ट लागू होने से क्या वहां राजनीतिक आरक्षण में कोई फर्क आया क्योंकि राजस्थान से पहले एमपी और महाराष्ट्र में ट्रिपल टेस्ट लागू हो चुका था। कमेटी ने सरकार को बताया कि महाराष्ट्र और एमपी में ट्रिपल टेस्ट लागू होने के बाद भी कोई भी ओबीसी जाति राजनीतिक आरक्षण की सीमा से बाहर नहीं हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ओबीसी आयोग आयोग सैंवेधानिक होता है वह अपने पैरामीटर खुद तय करता है।



राजस्थान पर क्या असर होगा?

राजस्थान में आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पंचायत और निकाय चुनावों का रास्ता साफ होगा। यदि ट्रिपल टेस्ट पूरा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार राज्य निर्वाचन आयोग बिना ओबीसी आरक्षण के भी चुनाव करा सकता है।

हालांकि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ट्रिपल टेस्ट लागू होने के बाद अधिकांश ओबीसी समुदायों के राजनीतिक आरक्षण में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। ऐसे में राजस्थान में भी व्यापक बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है, लेकिन अंतिम निर्णय आयोग की रिपोर्ट और राज्य सरकार की अधिसूचना पर निर्भर करेगा।
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