Rajasthan: उदयपुर की पहाड़ियों पर हो रहे अंधाधुंध निर्माण को लेकर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा पूरा रिकॉर्ड
राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की पहाड़ियों पर हो रहे अंधाधुंध निर्माण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पहाड़ी क्षेत्रों में दी गई निर्माण अनुमतियों का पूरा रिकॉर्ड तलब करते हुए हिल पॉलिसी पर सवाल उठाए हैं।
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राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की पहाड़ियों पर हो रहे अंधाधुंध निर्माण और व्यावसायिक परियोजनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने राज्य सरकार की हिल पॉलिसी पर सवाल उठाते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में दिए गए निर्माण की अनुमति से जुड़े सभी रिकॉर्ड तलब किए हैं। साथ ही अदालत ने संकेत दिए हैं कि मामले के व्यापक जनहित को देखते हुए स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू जनहित याचिका) भी शुरू की जा सकती है।
न्यायमूर्ति समीर जैन ने 24 जुलाई को बसंत होटल्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत सामग्री उदयपुर के पारिस्थितिक अस्तित्व (Ecological Survival) को लेकर बेहद चिंताजनक स्थिति दर्शाती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका के गुण-दोष पर फैसला करने के साथ-साथ यह भी विचार किया जाएगा कि पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन के तहत स्वत: जनहित याचिका शुरू की जाए या नहीं।
कोर्ट ने वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों को सभी संबंधित रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट द्वारा नियुक्त आयुक्तों को भी अगली सुनवाई में मौजूद रहने को कहा गया है। अदालत ने याचिकाकर्ता की संपत्ति के आसपास व्यावसायिक निर्माणों को दी गई सभी स्वीकृतियों का रिकॉर्ड तथा वर्ष 2018 और 2024 की हिल पॉलिसी तैयार किए जाने से जुड़े दस्तावेज भी पेश करने के निर्देश दिए हैं।
होटल परियोजना को लेकर दायर की गई थी याचिका
बसंत होटल्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपनी याचिका में राज्य सरकार की हिल पॉलिसी को अपनी होटल परियोजना पर लागू किए जाने को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसका निर्माण कार्य पहले की नीति और सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों के अनुरूप शुरू किया गया था। कंपनी ने आरोप लगाया कि आसपास कई होटल आवश्यक अनुमति के बिना संचालित हो रहे हैं, जबकि प्रशासन ने केवल उनकी परियोजना को निशाना बनाया। होटल परियोजना का निर्माण वर्ष 2018 में शुरू हुआ था।
कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट में सामने आईं गंभीर बातें
अदालत की टिप्पणियां कोर्ट कमिश्नर के रूप में नियुक्त अधिवक्ता कामिनी जोशी और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राजेंद्र भानावत की अंतरिम रिपोर्ट पर आधारित हैं। साइट निरीक्षण के बाद सौंपी गई रिपोर्ट में बताया गया कि उदयपुर की पहाड़ियों पर पहले से कई होटल संचालित हो रहे हैं। याचिकाकर्ता की परियोजना केवल इसलिए अलग दिखाई देती है क्योंकि वह अधिक ढलान वाली पहाड़ी पर स्थित है।
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रिपोर्ट में आसपास बड़े पैमाने पर पहाड़ियों की कटाई का भी उल्लेख किया गया है। साथ ही कहा गया कि उदयपुर विकास प्राधिकरण (यूडीए) के अधिकारियों को लागू हिल पॉलिसी और पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण संबंधी कानूनों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि वर्ष 2018 की हिल पॉलिसी निजी एजेंसियों द्वारा तैयार की गई थी, जिसमें पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, वन्यजीव और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े वैधानिक विभागों से पर्याप्त परामर्श नहीं लिया गया।
'दयनीय स्थिति' में पहुंचा उदयपुर
हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि झीलों, पहाड़ियों और वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध उदयपुर की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को बिना पर्याप्त विशेषज्ञता और वैज्ञानिक परामर्श के बनाई गई नीतियों के तहत विकसित हो रहे होटलों और अन्य व्यावसायिक परियोजनाओं से गंभीर नुकसान पहुंचा है। अदालत ने कहा कि शहर की स्थिति अब "दयनीय" होती जा रही है।
लंबित जनहित याचिकाओं के साथ होगी सुनवाई
28 जुलाई को अदालत ने इस मामले को उदयपुर की पहाड़ियों के विकास और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी दो लंबित जनहित याचिकाओं एक झील संरक्षण समिति तथा दूसरी उदयपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स एवं अन्य की ओर से दायर याचिका के साथ जोड़ने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति समीर जैन ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए कि इस रिट याचिका को संबंधित जनहित याचिकाओं की सुनवाई कर रही खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।