उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक केवल मोदी-शाह ही नहीं, भाजपा की प्रचंड जीत के ये भी हैं चाणक्य
लोकसभा चुनाव में भाजपा को 303 सीटें दिलाने का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को मिल रहा है। रणनीति बनाने से लेकर उसे मैदान में उतारने का काम उन्होंने ही तो किया है। लेकिन यह काम कुछ उन लोगों के बिना सफल नहीं होता जो परदे के पीछे रह कर काम करते हैं। कहीं गठबंधन से पार पाने की चुनौती थी तो कहीं ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और चंद्रबाबु नायडू जैसे मठाधीशों का एकाधिकार तोड़ने की चुनौती। इन रणनीतिकारों पर एक नज़र…
उत्तर प्रदेश: 80 में से 60 सीटें जीतीं, गठबंधन परास्त
सुनील बंसल
इस साल जनवरी में जब सपा-बसपा ने लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन का एलान किया तो एक बार तो लगा कि भाजपा को सबसे बड़े राज्य में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। आखिर कुछ ही समय पहले वह गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा चुनाव हारी थी। लेकिन एक व्यक्ति था जिस पर इस एलान से कोई असर नहीं हुआ। वे थे उत्तर प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री सुनील बंसल। उनके पास रणनीति तैयार थी। गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलितों को जोड़ने की योजना चालू की गई। बंसल के पास हर लोकसभा क्षेत्र के आंकड़े थे। जमीनी कार्यकर्ताओं के जरिए पार्टी का संदेश, सरकार की योजनाएं और पीएम मोदी की उपलब्धियां गांव-गांव प्रसारित कर दी गई। तीन महीनों में यूपी का राजनीतिक माहौल वदल गया।
राजस्थान के मूल निवासी बंसल अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता रहे हैं। 2003 में वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री बनने में बंसल की सांगठनिक कुशलता की बड़ी भूमिका थी। लेकिन 2013 में जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए गए और उत्तर प्रदेश का प्रभार अमित शाह के मिला तो उन्होंने अपनी सहायता के लिए बंसल को लखनऊ बुलाया। उस चुनाव में सहयोगी अपना दल के साथ मिल भाजपा ने 80 में से 73 सीटें जीती थीं। उसके बाद से 50 वर्षीय बंसल प्रदेश में ही चुनाव लड़वा रहे हैं।
अगले तीन सालों में उन्होंने हर विधानसभा सीट के जाति समीकरण समझे, और कार्यकर्ताओं के लिए लगातार कार्यक्रम बनाए ताकि वे सक्रिय रहें और जनता से जुड़े रहें। उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग की। उनकी रणनीति की वजह से ही 2017 के विधानसभा चुनाव में राज्य की 403 सीटों में 325 सीटें भाजपा और उसके सहयोगियों को मिली थीं।
इस बार हालाकि भाजपा ने उत्तर प्रदेश के दो-दो चुनाव प्रभारी बनाए थे - मोदी के करीबी माने जाने वाले गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री गोर्धन झडाफिया और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जय प्रकाश नड्डा, लेकिन केंद्रीय भूमिका बंसल की ही थी। और हो भी क्यों न, वे प्रदेश के हर जिले ही नहीं, हर बूथ तक के पार्टी कार्यकर्ताओं को जानते हैं और उनके लिये हर वक्त सुलभ हैं। वे लखनऊ स्थित प्रदेश मुख्यालय के एक कमरे में ही रहते हैं और हर सीट का जातिवाद आंकड़ा उनके आईपैड पर रहता है। किस जगह कौन से मुद्दे काम करेंगे और किस सीट पर पार्टी उम्मीदवार की क्या हालत, सभी उन्हें पता होता है।
उड़ीसा - 21 में से आठ सीटें
सुरेश पुजारी
सुनील बंसल की तरह ही सुरेश पुजारी भी छात्र संघ की राजनीति की उपज हैं। उड़ीसा में भाजपा सांसदों की संख्या आठ तक पहुंचाने में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पुजारी का ही पूरा हाथ है। कभी वे प्रदेश भर में ग़रीब छात्रों की फीस माफी के लिए आंदोलन छेड़कर सुर्खियों में आए थे। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक झुकने को तैयार महीं थे। आंदोलन हिंसक हो गया। पुजारी सहित सभी छात्र नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। लेकिन आंदोलन और तेज हो गया। आखिर पटनायक को छात्रों की सभी मांगें माननी पड़ीं।
इस आंदोलन से पुजारी प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बना चुके थे। 1997 में वे भाजपा में शामिल हुए और 2006 में प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए गए। वे कभी भाजपा नेतृत्व और नवीन पटनायक के बीच की कड़ी थे। हालांकि तब भी वे भाजपा को अकेले लड़ने के पक्षधर थे। लेकिन वाजपेयी और आडवाणी पटनायक को पसंद करते थे। बीजू जनता दल एनडीए का अंग थी। लेकिन कंधमाल के सांप्रदायिक दंगों ने सब बदल दिया। 23 अक्टूबर 2008 को विश्व हिंदू परिषद के स्वामी लक्ष्मणानन्द और चार सहयोगियों की हत्या कर दी गई। आरोप माओवादी और ईसाई मिशनरियों पर लगा। जबकि राज्य सरकार ने दंगे भड़काने का आरोप कई संघ और भाजपा नेताओं पर लगाया। इनमें सुरेश पुजारी का नाम भी था। वे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त दो-दो जांच आयोगों के सामने पेश हुए लेकिन इनमें से किसी की रिपोर्ट अभी तक नहीं आई।
भाजपा ने पटनायक पर स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या आरोपियों पर कार्रवाई न करने का इल्ज़ाम लगाया। इसी तनातनी की वजह से बीजद ने एनडीए से नाता तोड़ लिया। तभी से पुजारी को पार्टी संगठन नए सिरे से खड़ा करने का दायित्व मिला। सालों की मेहनत का नतीजा इस बार मिला। वे उड़ीसा के साथ-साथ पश्चिम पंगाल की पश्चिमी पट्टी की बांकुरा, मिदनापुर, पुरुलिया जैसी लोकसभा सीटों के भी प्रभारी हैं। उनमें अभी भी छात्र नेताओं वाला जोश है। वे कहते हैं - ‘टीएमसी के लोग हिंसा कर रहे हैं। तो हम चुप कैसे बैठेंगे। हम भी जवाब दे रहे हैं। हम ममता बनर्जी का आभार मानते हाैं क्योंकि उन्होंने हिंदुओं को एक कर दिया है। वह हिजाब पहनती हैं। नमाज़ पढ़ती हैं। मुसलमानों के दुधारी गाय कहती हैं और हिंदुओं की उपेक्षा करती हैं। वे भारत से अधिक बांग्लादेश में लोकप्रिय हैं।’ अब पुजारी की निगाहें पांच साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव जीतने पर लगी हैं। उसके लिये रणनीति बनानी भी शुरू कर दी है।
आंध्र प्रदेश-तेलंगाना - 25 में से चार सीटें
सुनील देवधर
पांच साल पहले सुनील देवधर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से वादा किया था कि वे त्रिपुरा में 25 साल से चल रही मुख्यमंत्री माणिक सरकार की सरकार गिरा देंगे। तब उनके दावे पर किसी के विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन अगले दो साल में उन्होंने सह असंभव सा दिखने वाला काम कर दिखाया। आखिर माणिक सरकार देश के सबसे काबिल और सादगी पसंद मुख्यमंत्री माने जाते थे। और उनके पीछे सीपीएम की चट्टान सा मजबूत काडर भी तो थी।
लेकिन देवधर अलग ही मिट्टी के बने थे।
संघ की भट्टी में तपे देवधर ने सबसे पहले ख़ुद को त्रिपुरा की संस्कृति में ढाला। शाकाहारी थे पर मछली खानी शुरु की क्योंकि कार्यकर्ताओं के यहां भोजन में अधिकतर मछली ही बनती थी। माणिक सरकार की सरकार की कमियां ढूंढी और उनका प्रचार शुरू किया। गांव गांव में प्रभात फेरी निकाली। शाखा लगानी शुरू कीं। देशभक्ति की ओर प्रेरित किया। भारत मां के नारे लगवाए। आखिर मार्च 2018 में पूर्ण बहुमत से भाजपा की सरकार बनी। 25 साल पुराना माकपा का गढ टूटा।
इसके बाद जब चंद्रबाबू एनडीए से बाहर हुए तो अमित शाह ने उन्हें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का प्रभार सौंपा। यहां त्रिपुरा से कठिन परिस्थियां थीं और संसाधन और भी सीमित। उन्होंने पाया कि लोग जगन से खुश हैं लेकिन नायडू से खफा। उन्होंने पाया कि ईसाई होकर भी जगन हिंदुओं में लोकप्रिय थे। उन्होंने नायडू के खिलाफ माहौल बनाया लेकिन उसका ज्यादा फायदा जगन मोहन रेड्डी के मिली।
वहीं तेलंगाना में ओवैसी-केसीआर की अल्पसंख्यक परस्त नीतियों में दिखी उन्हें आशा की किरण दिखी। हिंदुओं को जाग्रत किया। त्रिपुरा की तरह ही वे आंध्र की स्थानीय संस्कृति में ढल गए। उन्हेंने तेलगू सीखी, आंध्र का भोजन करना शुरू किया और स्थानीय लोगों की तरह कुर्ता-पायजामा छोड़कर सफेद शर्ट-पैंट पहनना शुरू कर दिया। तेलगू सिनेमा देखने लगे। वे किसी भी कार्यकर्ता के घर भोजन और विश्राम के लिए रुक जाते हैं। रात के स्थानीय लोगों के साथ बात कर हवा का रुख भांपते हैं। सुरेश पुजारी की तरह उनका लक्ष्य भी अगले विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सरकार बनाना है।
पश्चिम बंगाल - 42 में से 18 सीट
मुकुल रॉय
जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल की 43 में से 23 सीट जीतने का दावा किया था तो उनके दिमाग में सिर्फ एक व्यक्ति था - मुकुल रॉय। कभी ममता बनर्जी के दाहिने हाथ रहे रॉय के ही भाजपा के 18 सांसदों की जीत के लिए सबसे अधिक श्रेय मिल रहा है। आखिर उन्हें तृणमूल कांग्रेस के सभी दांवपेंच जो पता हैं। वे ममता के इतने करीब थे कि उन्होंने ममता के कहने पर कांग्रेस छोड़ दी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। 2012 में जब ममता ने रेलमंत्री के पद पर मुकुल को आसीन कराया। लेकिन 2015 में शारदा चिटफंड मामले में उनका नाम आने पर मुकुल को पार्टी से निकल दिया गया। थोड़े समय बाद ही वे भाजपा में शामिल हो गए और संघ की ओर से भेजे गए अरविंद मेनन के साथ मुख्य रणनीतिकार बन गए।
तृणमूल कांग्रेस में लंबे समय तक नंबर दो के पद पर रहने की वजह से मुकुल इस पार्टी के सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं और उनकी कमजोरियों को भली प्रकार जानते हैं। राज्य सरकार के कई अधिकारी उनके भेदिए हैं। यही वजह हे कि ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मोदीओशाह महीं है बल्कि मुकुल रॉय हैं। मेनन के साथ मिलकर उन्होंने हर ब्लॉक तक भाजपा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा कर दिया। 74000 बूथों तक कार्यकर्ताओं की टीम बनाई। टीएमसी के कई नेताओं को तोड़ लिया।
पिछले दो दिनों में चार टीएमसी विधायकों और 50 पार्षदों के भाजपा में शामिल होने के पीछे रॉय ही हैं। वहीं, मेनन और पुजारी का काम ममता को अल्पसंख्यक-परस्त सिद्ध करना है। ‘मुसलमान दुधारी गाय हैं और उन्हें मैं नहीं छोड़ूंगी’ - जैसे ममता के बयान राज्य में ध्रुवीकरण तेज़ करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। अब रॉय के नेतृत्व में भाजपा का मिशन 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनाना है।
पूर्वोत्तर - 25 में से 19 सीट
हिमंत बिस्वसरमा
पूर्वोत्तर राज्यों की 25 में से 19 लोकसभा सीटों पर एनडींए उम्मीदवारों की जीत के पीछे किसी हद तक असम के पीडब्लूडी मंत्री हिमंत बिस्वसरमा का हाथ है। वे नार्थईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस के चेयरमैन भी हैं। 50 वर्षीय सरमा कभी कांग्रेस के मजबूत स्तंभ होते थे। राजनीति शास्त्र में पीएचडी सरमा के राजनीति में लाने का श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री हितेश्वर साइकिया को है। 2001 में पहली बार विधायक चुने गए सरमा असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के दाहिने हाथ माने जाते थे, लेकिन गोगोई द्वारा अपने बेटे गौरव गोगोई के बढावा देने से वे नाराज हो गए।
वे शिकायत करने राहुल गांधी के पास गए लेकिन उनका आरोप है कि राहुल उनकी बात सुनने से ज्यादा अपने कुत्ते के साथ खेलने में व्यस्त थे। यहां तक कि सरमा के लिए लाए बिस्कुट भी उन्होंने कुत्ते को खिला दिए। इसे अपना अपमान मान उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें 13-दलों के नार्थ ईस्ट अलायंस के चेयरमैन। असम, अरुणाचल, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड में सरकारें बनवाईं। नागरिकता कानून लाए जाने से एनडीए छोड़ चुकी असम गण परिषद को मानाकर वापस लाए। वे बिल के पक्ष में हैं जबकि मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल खिलाफ। पूर्वोत्तर में अपना मिशन पूरा कर चुके सरमा अब केंद्र में आना चाहते हैं। हालांकि उनकी महत्वाकांक्षा असम का मुख्यमंत्री बनना ही है।