जलवायु परिवर्तन: कुल्लू में साल दर साल बढ़ रही बारिश, बाढ़-भूस्खलन की चेतावनी, आंकड़ों में खुलासा
प्रदेश के कुल्लू जिले में अतिवृष्टि की घटनाएं बढ़ रही हैं। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी गई है।
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हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में अतिवृष्टि की घटनाएं बढ़ रही हैं। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ने की चेतावनी दी गई है। यह शोध वाईएस परमार राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नाहन के शोधकर्ता रजत, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला की पुष्पा ठाकुर और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान कुल्लू की वैज्ञानिक रेणु लता ने किया है। शोधकर्ताओं ने कुल्लू और मनाली के 2005 से 2024 तक के दैनिक वर्षा आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि वार्षिक वर्षा में लगातार वृद्धि हो रही है। हर वर्ष औसतन छह से दस मिलीमीटर तक वर्षा बढ़ रही है। मानसून और इसके बाद की अवधि में वर्षा की मात्रा बढ़ी है। वहीं, सर्दियों में होने वाली वर्षा में गिरावट दर्ज की गई है। भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तकनीक से पता चला कि 1200 मिलीमीटर से अधिक वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों का दायरा पिछले पांच वर्षों में बढ़ा है। जिले का 55 फीसदी से अधिक भूभाग 30 डिग्री से अधिक ढलान वाला है। तीव्र ढलानों पर भारी वर्षा से भूस्खलन और मलबा प्रवाह का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
पश्चिमी हिमालय में चरम मौसमी घटनाओं के बढ़ने की आशंका
इन रिपोर्टों में पश्चिमी हिमालय में चरम मौसमी घटनाओं के बढ़ने की आशंका जताई गई है। शोधकर्ताओं ने कहा कि बढ़ती अतिवृष्टि भविष्य में स्थानीय आबादी, पर्यटन और कृषि के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। कुल्लू जिला पहले भी बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का सामना कर चुका है।
शोध में आपदा तैयारी मजबूत करने के सुझाव
शोध में आपदा तैयारी मजबूत करने के सुझाव दिए गए हैं। इसमें मौसम निगरानी नेटवर्क का विस्तार और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना शामिल है। संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित निगरानी और जलवायु आधारित विकास योजनाओं को प्राथमिकता देना आवश्यक है। शोधकर्ताओं का मानना है कि समय रहते प्रभावी कदम न उठाने पर जोखिम और गंभीर हो सकते हैं।
- इस अध्ययन से यह बात और मजबूत होती है कि हिमालयी क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं लगातार अधिक बार और अधिक तीव्र होती जा रही हैं। नाजुक पर्वतीय भू-भाग में ऐसे बदलाव बाढ़, भूस्खलन और मलबा बहाव जैसी आपदाओं के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष इस बात पर जोर देते हैं कि भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों यानी अर्ली वार्निंग सिस्टम, मौसम निगरानी, जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे और जोखिम-आधारित योजना निर्माण को और अधिक मजबूत करना आवश्यक है। - पुष्पेंद्र राणा, निदेशक, राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण निदेशक, हिमाचल प्रदेश।