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Shimla News: कणक दी बाली नाटक में दिखाया तारो के जीवन का संघर्ष
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थियेटर फॉर थियेटर ने नशा, लालच और धन की लालसा के दुष्प्रभावों पर नाटक का किया मंचन
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। गेयटी थियेटर के गॉथिक हॉल में कणक दी बाली नाटक में तारो नाम की लड़की के जीवन का संघर्ष और भावपूर्ण यात्रा दर्शाई गई। इस नाटक में थियेटर फॉर थियेटर चंडीगढ़ ने मंच पर वह सच्चाई दर्शाई जिसमें नशा, लालच और धन की अत्यधिक लालसा एक परिवार को उजाड़ देती है और तारो के पूरे जीवन को तहस-नहस कर देती है। इस नाटक में समाज की उन कुरीतियों को दर्शाया गया है जहां अपने ही सगे संबंधी हमारे जीवन को तबाह कर देते हैं और एक लड़की के अनाथ और अकेले होने पर उसका साथ देने की बजाय उसकी खुशियों के दुश्मन बन जाते हैं। इस नाटक को बलवंत गर्गी ने लिखा है और निर्देशन गुरप्रीत सिंह ने किया है। नाटक में दर्शया गया है कि तारो को बचपन में ही अपने माता-पिता खोने पड़े और वह अपने लालची और शराबी मामा के पास रह रही है। तारो को बड़े होकर चूड़ियां बेचने वाले बचना से प्यार हो जाता है। बचना उसकी जिंदगी की रोशनी और आशा बन जाता है। नाटक में दिखाया गया कि तारो की मासी ताबा एक चालाक और स्वार्थी महिला है जो तारो का विवाह पचास से अधिक उम्र के शराबी और धूर्त व्यक्ति मग्घर से करवाना चाहती है। तारो इस विवाह से खुश नहीं होती और किसी तरह मग्घर के घर से भागकर बचना के घर पहुंच जाती है। बचना की मां निहाली अपने अतीत के दुख में डूबी रहती है और बचना और तारो को जोड़ने के लिए सहमत नहीं होती। इसके बाद मग्घर तारो का पीछा करते हुए बचना के घर आता है। वहां मग्घर और बचना के बीच लड़ाई होती है। इस संघर्ष में बचना की मृत्यु हो जाती है और तारो की एकमात्र उम्मीद समाप्त हो जाती है। इस नाटक के माध्यम से समाज और दर्शकों को संदेश दिया गया कि नशा, लालच और धन की लालसा एक परिवार और सच्चे प्यार के ऊपर हावी हो जाते हैं और सब तबाह हो जाता है। इसके बाद दिखाया गया कि गांव के सभी लोग प्रेम के विरोधी बन जाते हैं। ऐसे में तारो को उसकी सास निहाली अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लेती है। इसके बाद जब मग्घर तारो को लेने आया तो निहाली और तारो ने मिलकर उसकी हत्या कर दी जो नारी शक्ति का एक उदाहरण बना। यह नाटक दर्शकों को सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और नारी शक्ति की प्रेरणा से जोड़ता है। द प्लेटफॉर्म संस्था शिमला और भाषा संस्कृति विभाग सहित सतलुज जल विद्युत निगम के सहयोग से गुरुदेव देवेन जोशी की स्मृति में गेयटी थियेटर में दो दिवसीय शिमला थियेटर फेस्टिवल आयोजित किया गया।
बॉक्स
कणक दी आली नाटक में अभिनय करने वाले कलाकारों में बचना का किरदार रविंदर सिंह, तारो का किरदार गुरलीन कौर, ताबा का किरदार ईशू बाबर, झंडू का किरदार रॉबिन, निहाली का किरदार नेहा धीमान, मग्घर का किरदार तरुण, ठाकरी का किरदार गुलशफा, मारू का किरदार खुशदीप सिंह सिद्धू, शेरा का किरदार राहुल और किरपा का किरदार रजत ने निभाया। इसके अलावा गांव की लड़कियों में काजल, सोनिया और कोमल शामिल रहीं जबकि गांव वालों में राहुल, आशीष, अंकुर, दीपिंदर सिंह और मोहिंदर संधू ने मंच पर हुनर दिखाया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। गेयटी थियेटर के गॉथिक हॉल में कणक दी बाली नाटक में तारो नाम की लड़की के जीवन का संघर्ष और भावपूर्ण यात्रा दर्शाई गई। इस नाटक में थियेटर फॉर थियेटर चंडीगढ़ ने मंच पर वह सच्चाई दर्शाई जिसमें नशा, लालच और धन की अत्यधिक लालसा एक परिवार को उजाड़ देती है और तारो के पूरे जीवन को तहस-नहस कर देती है। इस नाटक में समाज की उन कुरीतियों को दर्शाया गया है जहां अपने ही सगे संबंधी हमारे जीवन को तबाह कर देते हैं और एक लड़की के अनाथ और अकेले होने पर उसका साथ देने की बजाय उसकी खुशियों के दुश्मन बन जाते हैं। इस नाटक को बलवंत गर्गी ने लिखा है और निर्देशन गुरप्रीत सिंह ने किया है। नाटक में दर्शया गया है कि तारो को बचपन में ही अपने माता-पिता खोने पड़े और वह अपने लालची और शराबी मामा के पास रह रही है। तारो को बड़े होकर चूड़ियां बेचने वाले बचना से प्यार हो जाता है। बचना उसकी जिंदगी की रोशनी और आशा बन जाता है। नाटक में दिखाया गया कि तारो की मासी ताबा एक चालाक और स्वार्थी महिला है जो तारो का विवाह पचास से अधिक उम्र के शराबी और धूर्त व्यक्ति मग्घर से करवाना चाहती है। तारो इस विवाह से खुश नहीं होती और किसी तरह मग्घर के घर से भागकर बचना के घर पहुंच जाती है। बचना की मां निहाली अपने अतीत के दुख में डूबी रहती है और बचना और तारो को जोड़ने के लिए सहमत नहीं होती। इसके बाद मग्घर तारो का पीछा करते हुए बचना के घर आता है। वहां मग्घर और बचना के बीच लड़ाई होती है। इस संघर्ष में बचना की मृत्यु हो जाती है और तारो की एकमात्र उम्मीद समाप्त हो जाती है। इस नाटक के माध्यम से समाज और दर्शकों को संदेश दिया गया कि नशा, लालच और धन की लालसा एक परिवार और सच्चे प्यार के ऊपर हावी हो जाते हैं और सब तबाह हो जाता है। इसके बाद दिखाया गया कि गांव के सभी लोग प्रेम के विरोधी बन जाते हैं। ऐसे में तारो को उसकी सास निहाली अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लेती है। इसके बाद जब मग्घर तारो को लेने आया तो निहाली और तारो ने मिलकर उसकी हत्या कर दी जो नारी शक्ति का एक उदाहरण बना। यह नाटक दर्शकों को सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और नारी शक्ति की प्रेरणा से जोड़ता है। द प्लेटफॉर्म संस्था शिमला और भाषा संस्कृति विभाग सहित सतलुज जल विद्युत निगम के सहयोग से गुरुदेव देवेन जोशी की स्मृति में गेयटी थियेटर में दो दिवसीय शिमला थियेटर फेस्टिवल आयोजित किया गया।
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कणक दी आली नाटक में अभिनय करने वाले कलाकारों में बचना का किरदार रविंदर सिंह, तारो का किरदार गुरलीन कौर, ताबा का किरदार ईशू बाबर, झंडू का किरदार रॉबिन, निहाली का किरदार नेहा धीमान, मग्घर का किरदार तरुण, ठाकरी का किरदार गुलशफा, मारू का किरदार खुशदीप सिंह सिद्धू, शेरा का किरदार राहुल और किरपा का किरदार रजत ने निभाया। इसके अलावा गांव की लड़कियों में काजल, सोनिया और कोमल शामिल रहीं जबकि गांव वालों में राहुल, आशीष, अंकुर, दीपिंदर सिंह और मोहिंदर संधू ने मंच पर हुनर दिखाया।
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