{"_id":"6a7846d144b7324ea0006277","slug":"himachal-apple-growers-pgr-chemical-fraud-vigilance-investigation-2026-08-09","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Himachal Apple: सेब न हुआ लंबा, न बढ़ा आकार; 16,500 रुपये लीटर तक बेचा संदिग्ध रसायन, विजिलेंस जांच शुरू","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Himachal Apple: सेब न हुआ लंबा, न बढ़ा आकार; 16,500 रुपये लीटर तक बेचा संदिग्ध रसायन, विजिलेंस जांच शुरू
Sun, 09 Aug 2026 03:00 PM IST
Ankesh Dogra
सुरेश शांडिल्य, शिमला।
सुरेश शांडिल्य, शिमला।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Sun, 09 Aug 2026 03:00 PM IST
सार
हिमाचल में सेब का आकार और लंबाई बढ़ाने के नाम पर बागवानों को महंगे प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर बेचने के मामले की विजिलेंस जांच शुरू हो गई है। आरोप है कि 14 हजार से 16,500 रुपये प्रति लीटर तक बेचे गए रसायन के छिड़काव के बाद कई बगीचों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। उत्पाद में स्थानीय स्तर पर मिलावट की आशंका भी जताई गई है। विभाग ने सैंपल प्रयोगशाला भेजे हैं।
विज्ञापन
फ्रॉड।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हिमाचल प्रदेश में सेब का आकार और लंबाई बढ़ाने के नाम पर बागवानों को महंगे प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर (पीजीआर) बेचे जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि इन रसायनों को 14 हजार से 16,500 रुपये प्रति लीटर तक की कीमत में बेचा गया। कई बागवानों ने लाखों रुपये खर्च कर इनका छिड़काव किया, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। शिकायत सामने आने के बाद बागवानी विभाग ने मामला विजिलेंस ब्यूरो को सौंप दिया है और प्रारंभिक जांच शुरू हो गई है।
बताया जा रहा है कि मामला एक विदेशी कंपनी के पीजीआर उत्पाद से जुड़ा है। शिकायत में उत्पाद में स्थानीय स्तर पर मिलावट किए जाने की आशंका जताई गई है। जांच में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि संबंधित उत्पाद अधिकृत निर्माता से आया था या कहीं और तैयार किया गया।
सेब को आकर्षक बनाने के नाम पर बिक्री
अमेरिका समेत कई देशों से आयातित सेब के मुकाबले बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक आकार का फल तैयार करने की होड़ के बीच बागवानों को ऐसे रसायनों की जरूरत बताई गई। इसी का फायदा उठाकर कथित तौर पर पीजीआर की बिक्री की गई।
विज्ञापन
बागवानों का आरोप है कि महंगे रसायन खरीदकर बगीचों में छिड़काव करने के बावजूद कई स्थानों पर न तो सेब अपेक्षित रूप से लंबे हुए और न ही उनका आकार बढ़ा। इसके बाद बागवानों ने मामले की शिकायत बागवानी विभाग से की।
निर्माता और बैच नंबर की भी जांच
विजिलेंस ब्यूरो संबंधित उत्पाद के निर्माता, बैच नंबर, आपूर्ति के स्रोत, खरीद और बिक्री की पड़ताल कर रहा है। जांच में यह पहलू भी शामिल है कि कहीं इस मामले में किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत तो नहीं है।
बागवानी विभाग को शिकायत मिलने के बाद संबंधित उत्पाद के सैंपल लिए गए और उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है। प्रयोगशाला रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि उत्पाद में लेबल पर बताए गए रसायन मौजूद हैं या नहीं और उनकी मात्रा निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
डीजीपी को पत्र के बाद शुरू हुई जांच
बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार विभाग ने मामले को लेकर डीजीपी को पत्र लिखा था। इसके बाद विजिलेंस ने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है और इसकी सूचना विभाग को भी दी गई है। उन्होंने बताया कि उत्पाद के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों के संबंध में स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
विज्ञापन
बताया जा रहा है कि मामला एक विदेशी कंपनी के पीजीआर उत्पाद से जुड़ा है। शिकायत में उत्पाद में स्थानीय स्तर पर मिलावट किए जाने की आशंका जताई गई है। जांच में यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि संबंधित उत्पाद अधिकृत निर्माता से आया था या कहीं और तैयार किया गया।
विज्ञापन
सेब को आकर्षक बनाने के नाम पर बिक्री
अमेरिका समेत कई देशों से आयातित सेब के मुकाबले बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक आकार का फल तैयार करने की होड़ के बीच बागवानों को ऐसे रसायनों की जरूरत बताई गई। इसी का फायदा उठाकर कथित तौर पर पीजीआर की बिक्री की गई।
विज्ञापन
बागवानों का आरोप है कि महंगे रसायन खरीदकर बगीचों में छिड़काव करने के बावजूद कई स्थानों पर न तो सेब अपेक्षित रूप से लंबे हुए और न ही उनका आकार बढ़ा। इसके बाद बागवानों ने मामले की शिकायत बागवानी विभाग से की।
निर्माता और बैच नंबर की भी जांच
विजिलेंस ब्यूरो संबंधित उत्पाद के निर्माता, बैच नंबर, आपूर्ति के स्रोत, खरीद और बिक्री की पड़ताल कर रहा है। जांच में यह पहलू भी शामिल है कि कहीं इस मामले में किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की मिलीभगत तो नहीं है।
बागवानी विभाग को शिकायत मिलने के बाद संबंधित उत्पाद के सैंपल लिए गए और उन्हें जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है। प्रयोगशाला रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि उत्पाद में लेबल पर बताए गए रसायन मौजूद हैं या नहीं और उनकी मात्रा निर्धारित मानकों के अनुरूप है या नहीं।
डीजीपी को पत्र के बाद शुरू हुई जांच
बागवानी विभाग के निदेशक डॉ. सतीश शर्मा के अनुसार विभाग ने मामले को लेकर डीजीपी को पत्र लिखा था। इसके बाद विजिलेंस ने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है और इसकी सूचना विभाग को भी दी गई है। उन्होंने बताया कि उत्पाद के सैंपल जांच के लिए भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद उत्पाद की वास्तविक गुणवत्ता और उसमें मौजूद रसायनों के संबंध में स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
क्या होता है पीजीआर?
पीजीआर यानी प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर ऐसे रसायन होते हैं, जो पौधों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करते हैं। सेब के उत्पादन में कुछ पीजीआर का इस्तेमाल फल के आकार और विकास को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। संबंधित उत्पाद में जिब्रेलिक एसिड और कृत्रिम हार्मोन बेंजिलाडेनिन जैसे घटक होने का दावा किया गया है। एक कंपनी ने इस उत्पाद के भारत में केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति से पंजीकृत होने का दावा किया है। हालांकि, मौजूदा मामले में उत्पाद की वास्तविक संरचना और वैधता जांच का विषय है।
मिलावटी उत्पाद स्वास्थ्य के लिए भी हो सकता है नुकसानदेह
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी रसायन में गलत पदार्थ, अशुद्धियां या निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में कोई रसायन मौजूद हो तो इससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे रसायनों के संपर्क में आने से त्वचा, आंखों और सांस के रास्ते शरीर में विषाक्त तत्व पहुंचने का खतरा हो सकता है।
आईजीएमसी शिमला के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. एलएस पाल के अनुसार अप्राकृतिक तरीके से इस तरह के रसायनों का इस्तेमाल मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। हालांकि, संबंधित उत्पाद से स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव और उसमें मौजूद रसायनों की स्थिति प्रयोगशाला जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
पीजीआर यानी प्लांट ग्रोथ रेगुलेटर ऐसे रसायन होते हैं, जो पौधों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करते हैं। सेब के उत्पादन में कुछ पीजीआर का इस्तेमाल फल के आकार और विकास को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। संबंधित उत्पाद में जिब्रेलिक एसिड और कृत्रिम हार्मोन बेंजिलाडेनिन जैसे घटक होने का दावा किया गया है। एक कंपनी ने इस उत्पाद के भारत में केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड एवं पंजीकरण समिति से पंजीकृत होने का दावा किया है। हालांकि, मौजूदा मामले में उत्पाद की वास्तविक संरचना और वैधता जांच का विषय है।
मिलावटी उत्पाद स्वास्थ्य के लिए भी हो सकता है नुकसानदेह
विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी रसायन में गलत पदार्थ, अशुद्धियां या निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में कोई रसायन मौजूद हो तो इससे मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे रसायनों के संपर्क में आने से त्वचा, आंखों और सांस के रास्ते शरीर में विषाक्त तत्व पहुंचने का खतरा हो सकता है।
आईजीएमसी शिमला के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. एलएस पाल के अनुसार अप्राकृतिक तरीके से इस तरह के रसायनों का इस्तेमाल मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। हालांकि, संबंधित उत्पाद से स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव और उसमें मौजूद रसायनों की स्थिति प्रयोगशाला जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।