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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- भर्ती में भाग लेने के बाद प्रक्रिया को चुनौती देना गैर कानूनी

Thu, 06 Aug 2026 06:15 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।
संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Thu, 06 Aug 2026 06:15 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया (इंटरव्यू) में भाग लेने के बाद असफल होने पर उम्मीदवार का भर्ती प्रक्रिया और उसके नियमों को चुनौती देना गैर कानूनी है।

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Himachal High Court rules challenging the recruitment process after participating in it is illegal.
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया (इंटरव्यू) में भाग लेने के बाद असफल होने पर उम्मीदवार का भर्ती प्रक्रिया और उसके नियमों को चुनौती देना गैर कानूनी है। खंडपीठ ने कहा कि कानून का यह तय सिद्धांत है कि जो उम्मीदवार पूरी जानकारी के साथ चयन प्रक्रिया या साक्षात्कार में भाग लेता है, वह परिणाम में असफल होने के बाद उस प्रक्रिया या मापदंडों को चुनौती नहीं दे सकता। उम्मीदवार अपनी सुविधानुसार एक ही समय में लाभ लेने और विरोध करने की नीति नहीं अपना सकता।

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मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने एकल जज के उस आदेश को बरकरार रखा गया, जिसमें ड्राइवर पद पर नियुक्ति की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता को वर्ष 2012 में हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम में मात्र 67 दिन के लिए 8,310 रुपये प्रतिमाह वेतन पर ड्राइवर के पद पर अस्थायी रूप से रखा गया। इस अनुबंध की शर्त के अनुसार उनकी सेवा 16 जुलाई 2013 को स्वतः समाप्त हो गई। इसके बाद निगम ने 18 जून 2013 को एक वर्ष के अनुबंध पर नौ चालकों के पदों के लिए नई विज्ञापन प्रक्रिया शुरू की।

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याचिकाकर्ता ने इस दूसरी चयन प्रक्रिया में भाग लिया और फरवरी 2014 में इंटरव्यू भी दिया, लेकिन वह अंतिम मेरिट सूची में जगह नहीं बना पाए। अपीलकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उनके साथ वर्ष 2012 की पहली भर्ती में चुने गए एक अन्य व्यक्ति को नियुक्ति दे दी गई, जबकि उन्हें बाहर कर दिया गया। इसलिए उन्हें भी प्राथमिकता के आधार पर नियुक्ति मिलनी चाहिए थी। अदालत ने पाया कि एक अन्य व्यक्ति का चयन दूसरे विज्ञापन के तहत साक्षात्कार (5 और 6 फरवरी 2014) में मेरिट सूची में स्थान पाने पर हुआ था, न कि किसी पुरानी याचिका या पूर्व जुड़ाव के कारण। याचिकाकर्ता दूसरे दौर की मेरिट लिस्ट में जगह बनाने में विफल रहे, इसलिए वे समानता का दावा नहीं कर सकता।

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दिव्यांगों के लिए हिम बस कार्ड की अनिवार्यता पर सुनवाई
 प्रदेश हाईकोर्ट में पथ परिवहन निगम की बसों में दिव्यांगजनों को मिलने वाली मुफ्त यात्रा सुविधा और इसके लिए हिम बस कार्ड की अनिवार्यता को लेकर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी एचआरटीसी ने पीठ के समक्ष दिव्यांगों की यात्रा सुविधा से जुड़े मौजूदा नियमों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दिव्यांग व्यक्तियों को उनकी दिव्यांगता के प्रतिशत के अनुसार मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जा रही है। यदि दिव्यांगता 70% से अधिक है, तो उनके साथ एक अटेंडेंट (सहयोगी) को भी मुफ्त यात्रा की अनुमति है। दृष्टिहीन व्यक्तियों को राज्य के भीतर और राज्य के बाहर भी एक अटेंडेंट के साथ मुफ्त यात्रा सुविधा दी जा रही है।
 

याचिकाकर्ता ने इस मामले पर अपने अंतिम तर्क और बहस प्रस्तुत करने के लिए अदालत से समय की मांग की। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने प्रार्थना को स्वीकार करते हुए मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर को सुनिश्चित की है। यह मामला 27 अक्तूबर 2025 को जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) से संबंधित है। याचिका में मांग की गई है कि दिव्यांगजनों को हिम बस कार्ड की अनिवार्य शर्त से छूट दी जाए और केंद्र सरकार की ओर से जारी यूडीआईडी (यूनिवर्सल डिसएबिलिटी आईडी) कार्ड के आधार पर ही मुफ्त सफर की सुविधा प्रदान की जाए।

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