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हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा- कुलपति की नियुक्ति के लिए वरिष्ठता ही एकमात्र पैमाना नहीं

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Wed, 08 Apr 2026 05:00 AM IST
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सार

 हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंपने के लिए केवल सबसे वरिष्ठ होना अनिवार्य नहीं है।

Himachal: High Court Rules—Seniority Is Not the Sole Criterion for Vice-Chancellor Appointment
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय के कुलपति का अतिरिक्त कार्यभार सौंपने के लिए केवल सबसे वरिष्ठ होना अनिवार्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने डॉ. राकेश कुमार कपिला की ओर से दायर अपील याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया है। न्यायालय ने फैसले में कानून की बारीकियों पर गौर करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश कृषि, औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय अधिनियम, 1986 की धारा 24(5) के तहत कुलपति की अनुपस्थिति में कुलाधिपति (चांसलर) वरिष्ठ संकाय सदस्यों में से किसी को भी जिम्मेदारी सौंप सकते हैं।

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अधिनियम में कहीं भी सबसे वरिष्ठ शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिनियम कुलाधिपति को यह अधिकार देता है कि वह वरिष्ठ सदस्यों में से जिसे उचित समझें, उसे कार्यभार सौंप सकते हैं। रिकॉर्ड के अनुसार कुलाधिपति ने शीर्ष तीन वरिष्ठ प्रोफेसरों के बायो-डाटा का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद ही प्रतिवादी 4 को इस पद के लिए चुना था। खंडपीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय के नियमों 3.2(3) के अनुसार डीन के पद के लिए स्पष्ट रूप से लिखा है कि सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर को कार्यभार दिया जाएगा।

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चूंकि कुलपति के पद के लिए जानबूझकर वरिष्ठ संकाय सदस्य शब्द का उपयोग किया गया है, इसलिए केवल वरिष्ठता के आधार पर दावेदारी नहीं की जा सकती। अपीलकर्ता डॉ. कपिला विश्वविद्यालय के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर हैं, उन्होंने एकल न्यायाधीश के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। उनका तर्क था कि वरिष्ठता के आधार पर कुलपति का अतिरिक्त प्रभार उन्हें मिलना चाहिए था।खंडपीठ ने एकल पीठ के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया में पूरी तरह से दिमाग का इस्तेमाल किया गया है और इसमें किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि कानून वरिष्ठ संकाय सदस्यों के बीच चयन की अनुमति देता है, न कि केवल सबसे वरिष्ठ व्यक्ति की नियुक्ति की बाध्यता रखता है।

आईआईटी मंडी कैंपस स्कूल विवाद में अंतरिम राहत नहीं
 प्रदेश हाईकोर्ट ने माइंड ट्री आईआईटी मंडी कैंपस स्कूल की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए फिलहाल किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने प्रतिवादियों को दो सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।यह मामला स्कूल चलाने के अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) को समाप्त करने से जुड़ा है। आईआईटी मंडी के रजिस्ट्रार ने 1 मई 2024 को एक कार्यालय पत्र जारी कर स्कूल चलाने वाली संस्था के साथ अनुबंध और लाइसेंस डीड को समाप्त कर दिया था। इस नोटिस के तहत संस्थान अब इस सेवा को जारी रखने का इच्छुक नहीं है और स्कूल प्रबंधन को दो साल के भीतर परिसर खाली कर कब्जा सौंपने का निर्देश दिया गया है।

 

स्कूल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अनुबंध अभी भी प्रभावी माना जाना चाहिए। उन्होंने 26 फरवरी 2026 की एक बैठक का हवाला देते हुए दावा किया कि आईआईटी प्रशासन ने उन्हें नए दाखिले के लिए आक्रामक अभियान चलाने को कहा था। वहीं आईआईटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने इन दावों का पुरजोर खंडन किया। उन्होंने कहा कि समझौते की धारा 14 के तहत किसी भी पक्ष को दो साल का नोटिस देकर अनुबंध खत्म करने का अधिकार है, जिसका पालन किया गया है। इसके साथ ही, उन्होंने याचिकाकर्ता की ओर से पेश किए गए बैठक के दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठाए और उन्हें गलत बताया। आईआईटी मंडी ने अदालत को भरोसा दिलाया कि स्कूल में पढ़ रहे छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ के हितों की पूरी रक्षा की जाएगी। इसके लिए एक अलग सोसाइटी का गठन और पंजीकरण पहले ही किया जा चुका है ताकि शैक्षणिक सत्र और भविष्य पर कोई आंच न आए।

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