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हिमाचल हाईकोर्ट: कानून जागरूक नागरिकों की मदद करता है, सोने वालों की नहीं

भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Fri, 05 Jun 2026 05:00 AM IST
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सार

 हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद पिछली तारीख से पूर्वप्रभावी पदोन्नति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Himachal High Court: The law helps vigilant citizens, not those who sleep.
अदालत(सांकेतिक)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद पिछली तारीख से पूर्वप्रभावी पदोन्नति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब कोई कर्मचारी उस पद पर नियुक्त ही नहीं हुआ तो उसे पिछली तारीख से पदोन्नति या वरिष्ठता नहीं दी जा सकती। चूंकि याचिकाकर्ता ने सेवानिवृत्ति के बाद अदालत का रुख किया है, इसलिए यह याचिका विचारणीय नहीं है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी को पदोन्नति के अधिकारों की रक्षा करनी है, तो उसे अपनी सेवा अवधि के दौरान ही कानूनी उपाय तलाशने होंगे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कानून केवल जागरूक नागरिकों की मदद करता है, सोने वालों की नहीं।

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याचिकाकर्ता ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उन्हें सभी परिणामी लाभों के साथ वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी के पद पर पिछली तारीख से काल्पनिक पदोन्नति दी जाए। रिकॉर्ड के अनुसार याचिकाकर्ता 31 जुलाई 2024 को सेवानिवृत्त हो चुकी थीं। 1 मई 2025 को विभाग की ओर डीपीसी करवाई गई, जिसकी वजह से अन्य कर्मचारी पदोन्नत हो गए। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की उम्र 59 वर्ष है और उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद यह राहत मांगी है। अदालत ने कहा कि जो लोग कुंभकर्ण की तरह सोते रहते हैं और देरी से अदालत आते हैं, उन्हें कोई राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को सेवाकाल के दौरान विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक बुलाने के लिए अदालत आना चाहिए था। सेवा में रहते हुए उन्होंने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया और न ही प्रशासन पर किसी दुर्भावना का कोई आरोप लगाया। इसे देखते हुए अदालत ने उर्वशी वालिया की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया है। 

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