HP High Court: पुलिस कांस्टेबलों की पदोन्नति पर उच्च स्तरीय कमेटी करेगी समीक्षा, सरकार की अपील खारिज
पुलिस कांस्टेबलों की पदोन्नति के मुद्दों पर एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान में कांस्टेबलों के लिए पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं। विशेष रूप से जनरल ड्यूटी देने वाले कांस्टेबलों के पास अन्य उप-कैडर की तुलना में पदोन्नति के रास्ते कम हैं। पढ़ें पूरी खबर...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस कांस्टेबलों की पदोन्नति के मुद्दों पर एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस कर्मियों की सेवा स्थितियों में सुधार और समयबद्ध पदोन्नति सुनिश्चित करना आवश्यक है। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें गृह सचिव की अध्यक्षता में कमेटी बनाने का निर्देश दिया गया है। खंडपीठ ने कमेटी को निर्देश दिया है कि वह 8 सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंपे।
इस कमेटी में 11 अन्य सदस्य शामिल होंगे, जिनमें से 9 पुलिस विभाग के विशेषज्ञ होंगे। यह कमेटी कांस्टेबलों को हेड कांस्टेबल के पद पर पदोन्नत करने की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करेगी। अदालत ने टिप्पणी की कि वर्तमान में कांस्टेबलों के लिए पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं। विशेष रूप से जनरल ड्यूटी देने वाले कांस्टेबलों के पास अन्य उप-कैडर की तुलना में पदोन्नति के रास्ते कम हैं। न्यायालय ने इस तथ्य पर गौर किया कि 20 साल की सेवा के बाद कांस्टेबलों को मानद हेड कांस्टेबल का पद तो दे दिया जाता है, लेकिन उन्हें काम कांस्टेबल का ही करना पड़ता है।
इसके बदले उन्हें 80 से 200 रुपये का मामूली वित्तीय लाभ मिलता है, जिसे अदालत ने अपर्याप्त माना। पुलिस कर्मियों को समयबद्ध पदोन्नति, उच्च शिक्षा को प्रोत्साहन, ओवरटाइम भत्ता, साप्ताहिक अवकाश और आवासीय सुविधा जैसे लाभ मिलने चाहिए।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की सेवानिवृत्ति के बाद लंबे समय तक कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जाती है, तो विभाग की ओर से उसके सेवानिवृत्ति लाभों को रोकना अन्यायपूर्ण है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने कहा कि जांच के नाम पर सेवानिवृत्ति लाभों को लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता 28 फरवरी 2025 को सेवानिवृत्त हुईं थीं।
विभाग का तर्क था कि उनके दस्तावेजों (जन्म तिथि और योग्यता प्रमाणपत्र) में हेराफेरी के आरोपों के कारण उनके लाभ रोके गए हैं। हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए सरकार और संबंधित विभाग को आदेश दिए हैं कि याचिकाकर्ता के सभी बकाया सेवानिवृत्ति लाभ 6 सप्ताह के भीतर जारी करें। याचिकाकर्ता ने याचिका दायर कर अदालत से मांग की थी कि उन्हें 1 मार्च 2025 से उनके कानूनी देय लाभ जैसे पेंशन, ग्रेच्युटी और जीआईसी प्रदान किए जाएं।

कमेंट
कमेंट X