Himachal: सीबीएसई सब-कैडर भर्ती के लिए हाईकोर्ट ने टीजीटी शिक्षकों को अंतरिम राहत देने से किया इन्कार
हाईकोर्ट ने टीजीटी शिक्षकों को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है, जिसमें शिक्षकों ने खुद को डीम्ड (मानित) पीजीटी मानकर सीबीएसई सब-कैडर की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने टीजीटी शिक्षकों को अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है, जिसमें शिक्षकों ने खुद को डीम्ड (मानित) पीजीटी मानकर सीबीएसई सब-कैडर की भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगी थी। न्यायाधीश अजय गोयल की अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतरिम राहत के लिए तीन शर्तें होना अनिवार्य है। प्रथम दृष्टया मामला सुविधा का संतुलन और अपूर्णीय क्षति, याचिकाकर्ताओं के पक्ष में नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी राहत देना न्यायिक औचित्य के खिलाफ होगा, क्योंकि इससे एक ऐसी श्रेणी के लोगों को भर्ती में शामिल कर लिया जाएगा, जिनका कानूनी अस्तित्व फिलहाल उस पद के लिए नहीं है। हाईकोर्ट ने गुरबख्श सिंह एवं अन्य मामले में अंतरिम राहत के आवेदन को खारिज कर दिया है, हालांकि मुख्य याचिका पर सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने प्रतिवादी राज्य सरकार व अन्य को जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को होगी।
वर्तमान में टीजीटी के रूप में कार्यरत याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि 23 सितंबर 2025 की संशोधित अंतिम वरिष्ठता सूची को लागू किया जाए। उन्हें पीजीटी के पद पर पदोन्नत माना जाए ताकि वे सीबीएसई संबद्ध स्कूलों के लिए बनाए गए नए सब-कैडर की भर्ती परीक्षा और काउंसलिंग में भाग ले सकें। सीबीएसई सब-कैडर के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 5 मार्च 2026 को तब तक आगे बढ़ाया जाए जब तक उनकी पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी न हो जाए।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के महाधिवक्ता अनूप रतन ने दलील दी कि यह मामला पहले से खंडपीठ के समक्ष लंबित है। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता अभी भी टीजीटी के पद पर ही तैनात हैं, इसलिए उन्हें पीजीटी मानकर भर्ती में शामिल होने की अनुमति देना कानूनी रूप से गलत होगा। अदालत ने सरकार के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि अगर अदालत याचिकाकर्ताओं को पीजीटी मानकर भर्ती में शामिल होने की अनुमति देती है तो यह उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा जो वर्तमान में वास्तव में पीजीटी के पद पर कार्यरत हैं और भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
रिब्बा-कांडा लिंक रोड का काम लटका, हाईकोर्ट ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय को बनाया पक्षकार
प्रदेश हाईकोर्ट ने किन्नौर जिले की रिब्बा-कांडा लिंक रोड परियोजना के निर्माण में हो रही देरी और फंड रुकने के मामले में कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को नया प्रतिवादी बनाया है और नोटिस जारी किया है। अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बजट का लगभग आधा हिस्सा खर्च हो चुका है, लेकिन सड़क अधूरी रहने से यह न केवल विकास कार्य में बाधा है, बल्कि जनता के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है।
अदालत ने डिप्टी सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया को निर्देश दिए गए हैं कि वे वित्त मंत्रालय से फंड जारी करने या समय सीमा बढ़ाने के संबंध में निर्देश प्राप्त करें। अदालत ने सभी प्रतिवादियों को आपस में मिलकर समाधान निकालने की छूट दी है, ताकि खर्च हुआ पैसा व्यर्थ न जाए।मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी। अदालत को बताया गया कि 11.725 किलोमीटर लंबी इस सड़क का निर्माण साल 2017 में मंजूर हुआ था। इसके लिए 757.70 लाख रुपये का बजट आवंटित किया गया था, जिसमें से अब तक 377.14 लाख रुपये खर्च किए जा चुके हैं। हालांकि, लगभग 11 किलोमीटर की कटिंग का काम पूरा हो चुका है, लेकिन सड़क अभी भी आम जनता के लिए तैयार नहीं है।
लोक निर्माण विभाग ने देरी के लिए पहले कोविड-19 महामारी उसके बाद अचानक आई बाढ़ और भारी बारिश का हवाला दिया। सुनवाई के दौरान नाबार्ड के उप महाप्रबंधक कुशल दीप व्यक्तिगत रूप से पेश हुए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस परियोजना को पूरा करने की समय सीमा 31 मार्च 2020 थी। राज्य सरकार के अनुरोध पर इसे सितंबर 2023 तक बढ़ाया गया था। लेकिन अब ट्रेंच बंद होने के कारण नाबार्ड सीधे फंड जारी नहीं कर सकता।नाबार्ड ने अदालत को बताया कि अब दो ही रास्ते बचे हैं-या तो केंद्रीय वित्त मंत्रालय विशेष अनुमति दे या राज्य सरकार इस अधूरे काम को एक नई प्राथमिकता वाली परियोजना के रूप में नाबार्ड को दोबारा भेजे। इसके बाद अदालत ने केंद्रीय वित्त मंत्रालय को पक्षकार बनाया।