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Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति कल, इस दिन क्यों है स्नान, तिल-गुड़ खाने और दान करने की परंपरा

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Tue, 13 Jan 2026 02:00 PM IST
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सार

मकर संक्रांति पर स्नान, दान और पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। मकर संक्राति का पर्व सूर्य के  उत्तरायण के आगमन का पर्व माना जाता है।

Makar Sankranti 2026 Till Gud Khichadi  Snan Daan Significance on Sankranti
Makar Sankranti Daan 2026 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Makar Sankranti Khichdi Significance: सनातन धर्म में सूर्य को काल, ऊर्जा और जीवन का आधार माना गया है। वर्ष में सूर्य 12 बार राशि परिवर्तन करता है, जिसे संक्रांति कहा जाता है। इनमें से मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रांति विशेष मानी गई हैं। पौष मास में सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रांति कहलाता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं देता, बल्कि आध्यात्मिक जागरण और शुभ समय के आरंभ का प्रतीक भी माना गया है।
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सूर्य की गति और उत्तरायण का शुभ संकेत
मकर संक्रांति से सूर्य की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है। जब सूर्य मकर रेखा से कर्क रेखा की ओर बढ़ते हैं, तो इस अवधि को उत्तरायण कहा जाता है। यह समय प्रकाश, सकारात्मक ऊर्जा और उन्नति का द्योतक माना गया है। इसके विपरीत, कर्क रेखा से मकर रेखा की ओर सूर्य की गति को दक्षिणायण कहा जाता है, जिसे अपेक्षाकृत शिथिलता और अंतर्मुखी ऊर्जा से जोड़ा गया है। मकर संक्रांति के साथ ही उत्तरायण का आरंभ होता है, इसलिए इसे अत्यंत शुभ पर्व माना जाता है।
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देवताओं का समयचक्र: दिन और रात की अवधारणा
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि कहा गया है। छह माह का उत्तरायण काल देवताओं के जागरण का समय माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि उत्तरायण के काल में देह त्याग करने वाले साधक को पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि मकर संक्रांति को आत्मिक उन्नति और मोक्ष से जुड़ा पर्व माना गया है।

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सूर्य और शनि का विशेष संयोग
मकर संक्रांति का दिन सूर्य और शनिदेव के संबंध को भी दर्शाता है। शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं और इस दिन सूर्यदेव उसी राशि में प्रवेश करते हैं। मान्यता है कि पिता सूर्य के तेज के सामने शनि का कठोर प्रभाव शांत हो जाता है। इस दिन सूर्य और शनि से जुड़े दान, जप और पूजन करने से शनिजनित दोषों में कमी आती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

मकर संक्रांति से जुड़ी पौराणिक कथाएं
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही देवी गंगा पृथ्वी पर अवतरित होकर राजा भगीरथ के प्रयासों से सागर में समाहित हुई थीं, जिससे सगर पुत्रों को मुक्ति मिली। इसी कारण गंगासागर का विशेष महत्व है। एक अन्य मान्यता के अनुसार भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए इसी दिन प्राण त्यागे थे। यह घटना मकर संक्रांति को त्याग, धैर्य और मोक्ष से जोड़ती है।

स्नान, दान और पुण्य का अक्षय प्रभाव
पद्म पुराण में कहा गया है कि उत्तरायण या दक्षिणायण के प्रारंभिक दिन किया गया पुण्य कर्म कभी नष्ट नहीं होता। मकर संक्रांति के दिन प्रातःकाल स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। तिल, गुड़, ऊनी वस्त्र, कंबल और खिचड़ी का दान इस दिन अत्यंत फलदायी माना गया है। मकर संक्रांति पर इन चीजों का दान करने से शनि और सूर्य से संबंधी दोषों से मुक्ति मिलती है। रामचरितमानस में माघ मास के दौरान प्रयागराज संगम में स्नान को मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। हालांकि किसी भी पवित्र नदी में स्नान पुण्य देता है, लेकिन संगम स्नान को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

 
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