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Navratri Day 5: नवरात्रि के पांचवें दिन संतान सुख और ज्ञान की अधिष्ठात्री मां स्कंदमाता की पूजा
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: Vinod Shukla
Updated Mon, 23 Mar 2026 07:18 AM IST
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सार
Navratri Day 5: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा करने का विधान होता है। मां के इस स्वरूप की पूजा करने से आरोग्य, बुद्धिमत्ता तथा ज्ञान की प्राप्ति होती है।
Navratri Day 5 Maa Skanda Mata
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Navratri Day 5: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गाजी के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की आराधना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'विशुद्ध चक्र' में स्थित होता है। भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण देवी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। भगवान स्कंद 'कुमार कार्तिकेय' नाम से भी जाने जाते हैं। ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है, इनका वाहन मयूर है।
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1. स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप
स्कंदमाता के विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे हुए हैं। शास्त्रानुसार सिंह पर सवार स्कंदमातृस्वरूपणी देवी की चार भुजाएं हैं, जिसमें देवी अपनी ऊपर वाली दांयी भुजा में बाल कार्तिकेय को गोद में उठाए हुए हैं और नीचे वाली दांयी भुजा में कमल पुष्प लिए हुए हैं। ऊपर वाली बाईं भुजा से इन्होंने जगत तारण वरद मुद्रा बना रखी है व नीचे वाली बाईं भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्णन पूर्णतः शुभ्र है और ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं, इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है।
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2. पंचमी तिथि का आध्यात्मिक महत्व
नवरात्र पूजन के पांचवे दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। इस दिन साधक की समस्त बाहरी क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है एवं वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर होता है। उसका मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बंधनों से विमुक्त होकर पद्मासना माँ स्कंदमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है।
3. स्कंदमाता की उपासना का फल
स्कंदमाता की साधना से साधकों को आरोग्य, बुद्धिमत्ता तथा ज्ञान की प्राप्ति होती है। इनकी उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं, उसे परम शांति एवं सुख का अनुभव होने लगता है। स्कंदमाता की उपासना से बालरूप कार्तिकेय की स्वयं ही उपासना हो जाती है, यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है।
4. तेज, कांति और आध्यात्मिक उन्नति
सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। साधक के व्यक्तित्व में एक विशेष आभा प्रकट होती है, जो उसके आध्यात्मिक उन्नयन का संकेत देती है।
5. संतान सुख और रोगमुक्ति का महत्व
संतान सुख एवं रोगमुक्ति के लिए स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। मान्यता है कि सच्चे भाव से की गई उपासना से संतान से जुड़े कष्ट दूर होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है।
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6. पूजा विधि और मंत्र
मां के श्रृंगार के लिए खूबसूरत रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। स्कंदमाता और भगवान कार्तिकेय की पूजा विनम्रता के साथ करनी चाहिए। पूजा में कुमकुम, अक्षत, पुष्प, फल आदि से पूजा करें। चंदन लगाएं, माता के सामने घी का दीपक जलाएं। आज के दिन भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए, ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है।
मंत्र
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
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