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Hindi News ›   Sports ›   How Two Indian Army Havildars Created History with India's First-Ever Rowing World Cup Gold

लक्षय और उज्ज्वल ने कैसे बदली भारतीय रोइंग की तकदीर?: सेना के दो हवलदारों ने दिलाया विश्वकप का पहला स्वर्ण पदक

Tue, 30 Jun 2026 11:32 AM IST
स्वप्निल शशांक स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: स्वप्निल शशांक Updated Tue, 30 Jun 2026 11:32 AM IST
सार

भारतीय सेना के हवलदार लक्षय और उज्ज्वल कुमार सिंह ने स्विट्जरलैंड में वर्ल्ड रोइंग कप स्टेज-3 में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वीजा संकट के बावजूद दोनों ने शानदार प्रदर्शन किया। इस जीत ने भारत को पहली बार विश्व स्तर पर यूरोपीय टीमों के खिलाफ रोइंग में बड़ी सफलता दिलाई।

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How Two Indian Army Havildars Created History with India's First-Ever Rowing World Cup Gold
भारतीय सेना के दो हवलदारों ने रचा इतिहास - फोटो : Twitter

विस्तार

भारतीय सेना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसके जवान सिर्फ सीमाओं की रक्षा ही नहीं, बल्कि खेलों के मैदान में भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। 27 जून को स्विट्जरलैंड के लुसर्न में आयोजित वर्ल्ड रोइंग कप स्टेज-3 में हवलदार लक्षय और हवलदार उज्ज्वल कुमार सिंह की जोड़ी ने इतिहास रचते हुए भारत को इस प्रतियोगिता का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। दोनों ने लाइटवेट पुरुष डबल स्कल्स स्पर्धा में छह मिनट 26.09 सेकेंड का समय निकालकर दुनिया की दिग्गज टीमों को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास रही क्योंकि प्रतियोगिता से पहले भारतीय टीम को वीजा संबंधी बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा था।

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फोटो-फिनिश में जीता स्वर्ण पदक
फाइनल मुकाबले में भारतीय जोड़ी का मुकाबला नीदरलैंड्स और हांगकांग जैसी मजबूत टीमों से था। रेस बेहद रोमांचक रही और अंतिम क्षणों तक विजेता तय नहीं हो पाया। आखिर में लक्षय और उज्ज्वल ने शानदार तालमेल और संयम दिखाते हुए बेहद मामूली अंतर से स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। यह वर्ल्ड रोइंग कप के इतिहास में भारत का पहला स्वर्ण पदक है।

वीजा संकट के बावजूद नहीं टूटा हौसला
इस ऐतिहासिक सफलता की कहानी आसान नहीं थी। भारतीय टीम बुल्गारिया के प्लोवदिव में होने वाले वर्ल्ड कप स्टेज-2 में हिस्सा ही नहीं ले सकी क्योंकि खिलाड़ियों के पासपोर्ट बुल्गारियाई दूतावास में अटक गए थे। इसके बाद स्विट्जरलैंड का वीजा हासिल करने के लिए टीम के पास केवल पांच दिन बचे थे। विदेश मंत्रालय और खेल मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद समय रहते वीजा मिला और टीम स्विट्जरलैंड पहुंच सकी। बिना किसी अंतरराष्ट्रीय रेस के सीधे वर्ल्ड कप में उतरने के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने असाधारण प्रदर्शन किया।

रणनीति बनी जीत की सबसे बड़ी वजह
लक्षय और उज्ज्वल ने शुरुआती दौर से ही ऊर्जा बचाने की रणनीति अपनाई और आसानी से ए-फाइनल में जगह बना ली। फाइनल में जहां नीदरलैंड्स और हांगकांग की जोड़ियां प्रति मिनट करीब 40 स्ट्रोक की गति से नाव चला रही थीं, वहीं भारतीय जोड़ी ने 36 स्ट्रोक प्रति मिनट की संतुलित लय बनाए रखी। यही रणनीति अंत में उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई और उन्होंने अंतिम क्षणों तक बढ़त बनाए रखकर स्वर्ण पदक जीत लिया।

भारत के लिए क्यों ऐतिहासिक है यह जीत?
वर्ल्ड रोइंग कप के इतिहास में भारत इससे पहले कभी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया था। देश की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियां 2009 में महिला लाइटवेट क्वाड्रपल स्कल्स और 2019 में पैरा रोइंग स्पर्धाओं के कांस्य पदक तक सीमित थीं। ऐसे में लक्षय और उज्ज्वल की यह जीत भारतीय रोइंग के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है।

एशिया में मजबूत था भारत, अब दुनिया में भी बजा डंका
ओलंपिक स्तर पर भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दत्तू भोखनाल ने 2016 रियो ओलंपिक में किया था, जहां वह पुरुष सिंगल स्कल्स के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे। एशियाई खेलों में भारत ने 2010 और 2018 में दो स्वर्ण पदक जीते हैं, जबकि 2023 हांगझोउ एशियन गेम्स में पांच पदक हासिल किए थे।

इसके बाद 2025 एशियन रोइंग चैंपियनशिप में भारत ने 10 पदक जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी। उज्ज्वल कुमार सिंह उस टीम का भी हिस्सा थे और उन्होंने रजत पदक जीता था। लेकिन लुसर्न में मिली यह जीत इसलिए अलग है क्योंकि पहली बार भारत ने विश्व मंच पर यूरोपीय देशों को पछाड़कर स्वर्ण पदक जीता है।

रोइंग महासंघ ने बताया 'गेम चेंजर'
रोइंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बालाजी मराडापा का मानना है कि यह स्वर्ण पदक भारतीय रोइंग के लिए मानसिक बदलाव लेकर आएगा। उनके मुताबिक, एशिया में भारत पहले भी पदक जीतता रहा है, लेकिन यूरोपीय टीमों को हराने से अब भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ेगा। इससे भविष्य में विश्व स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जगी है।
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