लक्षय और उज्ज्वल ने कैसे बदली भारतीय रोइंग की तकदीर?: सेना के दो हवलदारों ने दिलाया विश्वकप का पहला स्वर्ण पदक
भारतीय सेना के हवलदार लक्षय और उज्ज्वल कुमार सिंह ने स्विट्जरलैंड में वर्ल्ड रोइंग कप स्टेज-3 में भारत का पहला स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। वीजा संकट के बावजूद दोनों ने शानदार प्रदर्शन किया। इस जीत ने भारत को पहली बार विश्व स्तर पर यूरोपीय टीमों के खिलाफ रोइंग में बड़ी सफलता दिलाई।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
भारतीय सेना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसके जवान सिर्फ सीमाओं की रक्षा ही नहीं, बल्कि खेलों के मैदान में भी देश का नाम रोशन कर सकते हैं। 27 जून को स्विट्जरलैंड के लुसर्न में आयोजित वर्ल्ड रोइंग कप स्टेज-3 में हवलदार लक्षय और हवलदार उज्ज्वल कुमार सिंह की जोड़ी ने इतिहास रचते हुए भारत को इस प्रतियोगिता का पहला स्वर्ण पदक दिलाया। दोनों ने लाइटवेट पुरुष डबल स्कल्स स्पर्धा में छह मिनट 26.09 सेकेंड का समय निकालकर दुनिया की दिग्गज टीमों को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास रही क्योंकि प्रतियोगिता से पहले भारतीय टीम को वीजा संबंधी बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा था।
Historic! India's🇮🇳 First Ever 🥇.
Hav Lakshay & Hav Ujjwal Kumar Singh (Army Rowing Node) won India’s first-ever World Rowing Cup gold in LM2x at Lucerne — 6:26.09. Proud moment for the Indian Army and the nation!विज्ञापन
#IndianArmy#MissionOlympicsWing #ArmyRowingNode… pic.twitter.com/b67DAHaJGG— Indian Army Sports and Adventure (@IA_SportsAdvntr) June 28, 2026
फाइनल मुकाबले में भारतीय जोड़ी का मुकाबला नीदरलैंड्स और हांगकांग जैसी मजबूत टीमों से था। रेस बेहद रोमांचक रही और अंतिम क्षणों तक विजेता तय नहीं हो पाया। आखिर में लक्षय और उज्ज्वल ने शानदार तालमेल और संयम दिखाते हुए बेहद मामूली अंतर से स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया। यह वर्ल्ड रोइंग कप के इतिहास में भारत का पहला स्वर्ण पदक है।
इस ऐतिहासिक सफलता की कहानी आसान नहीं थी। भारतीय टीम बुल्गारिया के प्लोवदिव में होने वाले वर्ल्ड कप स्टेज-2 में हिस्सा ही नहीं ले सकी क्योंकि खिलाड़ियों के पासपोर्ट बुल्गारियाई दूतावास में अटक गए थे। इसके बाद स्विट्जरलैंड का वीजा हासिल करने के लिए टीम के पास केवल पांच दिन बचे थे। विदेश मंत्रालय और खेल मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद समय रहते वीजा मिला और टीम स्विट्जरलैंड पहुंच सकी। बिना किसी अंतरराष्ट्रीय रेस के सीधे वर्ल्ड कप में उतरने के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों ने असाधारण प्रदर्शन किया।
लक्षय और उज्ज्वल ने शुरुआती दौर से ही ऊर्जा बचाने की रणनीति अपनाई और आसानी से ए-फाइनल में जगह बना ली। फाइनल में जहां नीदरलैंड्स और हांगकांग की जोड़ियां प्रति मिनट करीब 40 स्ट्रोक की गति से नाव चला रही थीं, वहीं भारतीय जोड़ी ने 36 स्ट्रोक प्रति मिनट की संतुलित लय बनाए रखी। यही रणनीति अंत में उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई और उन्होंने अंतिम क्षणों तक बढ़त बनाए रखकर स्वर्ण पदक जीत लिया।
वर्ल्ड रोइंग कप के इतिहास में भारत इससे पहले कभी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया था। देश की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियां 2009 में महिला लाइटवेट क्वाड्रपल स्कल्स और 2019 में पैरा रोइंग स्पर्धाओं के कांस्य पदक तक सीमित थीं। ऐसे में लक्षय और उज्ज्वल की यह जीत भारतीय रोइंग के लिए मील का पत्थर मानी जा रही है।
ओलंपिक स्तर पर भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दत्तू भोखनाल ने 2016 रियो ओलंपिक में किया था, जहां वह पुरुष सिंगल स्कल्स के क्वार्टर फाइनल तक पहुंचे थे। एशियाई खेलों में भारत ने 2010 और 2018 में दो स्वर्ण पदक जीते हैं, जबकि 2023 हांगझोउ एशियन गेम्स में पांच पदक हासिल किए थे।
इसके बाद 2025 एशियन रोइंग चैंपियनशिप में भारत ने 10 पदक जीतकर अपनी ताकत दिखाई थी। उज्ज्वल कुमार सिंह उस टीम का भी हिस्सा थे और उन्होंने रजत पदक जीता था। लेकिन लुसर्न में मिली यह जीत इसलिए अलग है क्योंकि पहली बार भारत ने विश्व मंच पर यूरोपीय देशों को पछाड़कर स्वर्ण पदक जीता है।
रोइंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष बालाजी मराडापा का मानना है कि यह स्वर्ण पदक भारतीय रोइंग के लिए मानसिक बदलाव लेकर आएगा। उनके मुताबिक, एशिया में भारत पहले भी पदक जीतता रहा है, लेकिन यूरोपीय टीमों को हराने से अब भारतीय खिलाड़ियों का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ेगा। इससे भविष्य में विश्व स्तर पर और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जगी है।