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ऑनलाइन ठगी पर टेक दिग्गजों की संयुक्त कार्रवाई: गूगल से OpenAI तक एक मंच पर, लेकिन क्या सच में रुकेगा फ्रॉड?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Jagriti Updated Thu, 19 Mar 2026 12:22 PM IST
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सार

Online Scams Accord 2026: टेक दिग्गज अब ऑनलाइन घोटालों को रोकने के लिए एक मंच पर आ गए हैं। ऑनलाइन घोटालों और धोखाधड़ी के खिलाफ उद्योग समझौता के तहत ये कंपनियां डाटा साझा करेंगी और एआई-आधारित सुरक्षा टूल्स को मजबूत करेंगी, ताकि यूजर्स को फिशिंग, डीपफेक और पेमेंट फ्रॉड से बचाया जा सके।
 

Google, Meta, Microsoft, OpenAI Sign Historic Industry Accord Fight Online Scams Fraud
Scam - फोटो : FREEPIK
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विस्तार

ऑनलाइन ठगी अब पहले से ज्यादा जटिल और खतरनाक हो गई है। इसी को देखते हुए टेक इंडस्ट्री की बड़ी कंपनियां अब मिलकर इससे लड़ने की रणनीति बना रही हैं। इस पहल में गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, ओपनएआई, एडोब जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ लिंक्डइन और पिंटरेस्ट भी शामिल हैं।
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समस्या कितनी बड़ी है?
आज का ऑनलाइन स्कैम पारंपरिक ठगी जैसा नहीं रहा। यह अब मल्टी-प्लेटफॉर्म और स्टेप-बाय-स्टेप ऑपरेशन बन चुका है।

कैसे काम करता है एक मॉडर्न स्कैम?
इसमें यूजर को मेटा यानी कि फेसबुक या इंस्टाग्राम, लिंक्डिन या पिंटरेस्ट जैसे प्लेटफॉर्म पर टारगेट किया जाता है, फेक प्रोफाइल, जॉब ऑफर या इन्वेस्टमेंट एड से संपर्क किया जाता है। इसके बाद बातचीत को व्हाट्सएप या टेलीग्राम जैसे प्राइवेट चैट ऐप पर शिफ्ट किया जाता है। इस तरीके से धीरे-धीरे भरोसा बनाया जाता है। इसके बाद अक्सर इमरजेंसी या डर पैदा करके पेमेंट किसी तीसरे के यूपीआई, क्रिप्टो, वॉलेट पर कराया जाता है। इसकी सबसे बड़ी समस्या है कि ये हर प्लेटफॉर्म अलग-अलग काम करता है, इसलिए पूरा स्कैम ट्रैक करना बेहद मुश्किल हो जाता है
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 इस नए समझौते में क्या खास है? 

एडवांस फ्रॉड डिटेक्शन
इसमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई जैसी कंपनियां एआई या एमएल मॉडल्स का इस्तेमाल करेंगी। ये सिस्टम असामान्य मैसेज पैटर्न पहचानेंगे, बॉट और फेक अकाउंट्स को जल्दी पकड़ेंगे। साथ ही स्कैम कैंपेन शुरू होने से पहले ही रोकने की कोशिश करेंगे। इसे  प्रोएक्टिव डिटेक्शन कहा जाता है यानी घटना होने से पहले पकड़ना।

यूजर अलर्ट और वार्निंग 
मेटा पहले ही इस पर काम शुरू कर चुका है। अब संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने से पहले चेतावनी मिल जाएगाी और नए कॉन्टैक्ट से पैसे मांगने पर अलर्ट भेजा जाएगा। यह बिहेवियरल साइबर सिक्योरिटी का हिस्सा है, जो यूजर के फैसले को प्रभावित करके स्कैम रोकने का काम करेंगे।

पेमेंट पर सख्त वेरिफिकेशन 
खासकर अमेजन जैसे प्लेटफॉर्म में हाई-रिस्क ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त ओटीपी या वैरिफिकेशन और unknown recipient पर चेतावनी दी जाएगी। इससे लास्ट माइल फ्रॉड (जहां पैसा निकलता है) को रोकने की कोशिश होगी।

 रिपोर्टिंग सिस्टम एक जैसा 
अभी हर प्लेटफॉर्म का अलग सिस्टम है। नए समझौते में एक जैसा रिपोर्ट स्कैम प्रोसेस होता है। जल्दी कार्रवाई के लिए अनफाइल्ड फॉर्मेट होता है। इससे यूजर कंफ्यूजन कम होगा ओर कंपनियों के लिए डाटा प्रोसेस करना आसान हो सकेगा।

डाटा शेयरिंग और सहयोग
इससे एडोब और पिंटरेस्ट जैसी कंपनियां भी जुड़ी हैं। अगर एक प्लेटफॉर्म पर स्कैम पकड़ा जाएगा, तो तुरंत प्लेटफॉर्म को भी अलर्ट मिल जाएगा। इसे थ्रेट इंटेलीजेंस शेयरिंग कहा जाता है।

पहले से क्या बदलाव दिख रहे हैं? 

मेटा के कदम
मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म पर यूजर सुरक्षा बढ़ाने के लिए कई प्रैक्टिकल बदलाव लागू किए हैं। अब अगर कोई संदिग्ध अकाउंट आपसे संपर्क करता है, जैसे नया प्रोफाइल, बार-बार मैसेज भेजना या पैसों की मांग, तो सिस्टम अपने आप उसे पहचानकर ऑटो वॉर्निंग दिखाता है इसके अलावा मेटा के एआई सिस्टम अब मैसेज के कंटेंट को भी स्कैन करते हैं। अगर उसमें स्कैम से जुड़े संकेत जैसे लिमिटेड ऑफर या ओटीपी शेयर करें मिलते हैं, तो यूजर को पहले ही अलर्ट कर दिया जाता है। इसका मकसद है कि यूजर गलती करने से पहले ही सतर्क हो जाए।

लिंक्डिन की सख्ती
लिंक्डिन ने खासतौर पर जॉब स्कैम को टारगेट किया है, जो हाल के समय में तेजी से बढ़े हैं। कई मामलों में फर्जी रिक्रूटर्स नौकरी का लालच देकर उम्मीदवारों से पैसे मांगते थे या उनकी पर्सनल जानकारी हासिल करते थे। इसे रोकने के लिए लिंक्डिन ने संदिग्ध रिक्रूटर प्रोफाइल की पहचान तेज की है। फर्जी अकाउंट्स को ब्लॉक या हटाना शुरू किया है और यूजर्स को सस्पिशियस हायरिंग एक्टिविटी पर चेतावनी देना शुरू किया है। इससे जॉब सीकर्स के लिए प्लेटफॉर्म थोड़ा सुरक्षित हुआ है।

इसके अलावा लिंक्डिन ने जॉब पोस्टिंग सिस्टम को भी मजबूत किया है। अब कंपनियों और रिक्रूटर्स को ज्यादा डॉक्यूमेंटेशन देना पड़ सकता है, कंपनी की वैधता साबित करनी होती है और सस्पिशियस जॉब लिस्टिंग को जल्दी हटाया जाता है। इसे पे टू गेट जॉब जैसे स्कैम कम करने में मदद मिलती है।

अब तक क्या था?
अब तक कंपनियां अलग-अलग तरीके से स्कैम से लड़ रही थीं। लेकिन नई पहल के जरिए इन सभी प्रयासों को एक सेंट्रलाइज्ड स्ट्रेटिजी में जोड़ा जा रहा है। यानी अलग-अलग प्लेटफॉर्म अब मिलकर एक अनफाइड सिस्टम बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

सबसे बड़ी कमजोरी क्या है? 
हालांकि इसकी कुछ कमजाेरी भी है। जैसे यह समझौता किसी कानून की तरह बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि कंपनियों के लिए इसे लागू करना अनिवार्य नहीं है। वे अपनी सुविधा और प्राथमिकता के अनुसार इसे अपनाएंगी। और न ही इस समझौते में नियम तोड़ने पर कोई जुर्माना लगेगा। 

इसका असर क्या हो सकता है?
एक्सपर्ट कहते हैं कि कुछ कंपनियां इसे पूरी गंभीरता से लागू करेंगी, जबकि कुछ केवल दिखावे के लिए सीमित बदलाव करेंगी।

सरकारों की भूमिका क्यों जरूरी है?
टेक कंपनियां जैसे गूगल और माइक्रोसॉफ्ट ग्लोबल लेवल पर काम करती हैं, लेकिन हर देश के अपने अलग कानून होते हैं। साइबर क्राइम सीमाओं से बंधा नहीं है, इसलिए बिना सरकारी नियमों के, इस समस्या को पूरी तरह नियंत्रित करना मुश्किल है।
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