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Jio: जियो के सैटेलाइट इंटरनेट मिशन को मिली मंजूरी, 1,600 सैटेलाइट से पूरे भारत में पहुंचेगा हाई-स्पीड नेटवर्क

Fri, 17 Jul 2026 11:55 PM IST
नीतीश कुमार टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: नीतीश कुमार Updated Fri, 17 Jul 2026 11:55 PM IST
सार

रिलायंस जियो ने भारत के सैटेलाइट इंटरनेट क्षेत्र में बड़ा कदम बढ़ाया है। कंपनी को 1,600 लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट तैनात करने की योजना को हरी झंडी मिल गई है। सरकार ने इसे तकनीकी रूप से सही माना है। इससे देश में स्वदेशी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड नेटवर्क की दिशा में अहम प्रगति हुई है।

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लो-अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : AI

विस्तार

रिलायंस जियो की महत्वाकांक्षी सैटेलाइट संचार परियोजना को बड़ा समर्थन मिला है। भारत के अंतरिक्ष नियामक IN-SPACe ने कंपनी की करीब 1,600 लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट तैनात करने की योजना को तकनीकी रूप से उपयुक्त माना है। यह मूल्यांकन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और दूरसंचार विभाग (DoT) के परामर्श से किया गया।
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यह मंजूरी जियो के लिए एक अहम पड़ाव है। इसके बाद कंपनी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑर्बिटल स्लॉट (कक्षा में स्थान) हासिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकेगी। यदि योजना तय समय पर आगे बढ़ती है, तो यह भारत का पहला बड़े पैमाने पर विकसित स्वदेशी सैटेलाइट ब्रॉडबैंड नेटवर्क बन सकता है।
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क्या है जियो का प्लान?

  • रिलायंस जियो लगभग 1,600 LEO सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर ऐसा कम्यूनिकेशन नेटवर्क तैयार करना चाहती है, जो पूरे भारत में हाई-स्पीड इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सके।
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  • कंपनी के प्रस्ताव के अनुसार, इस नेटवर्क की कुल क्षमता 4.5 से 5 टेराबिट प्रति सेकंड (Tbps) होगी। यह क्षमता कई मौजूदा और प्रस्तावित सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं से अधिक मानी जा रही है। इसके अलावा जियो देशभर में 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की भी योजना बना रही है, जो सैटेलाइट नेटवर्क के संचालन में मदद करेंगे।

किन सेवाओं का मिलेगा लाभ?

इस परियोजना के जरिए जियो फिक्स्ड सैटेलाइट सेवाएं, जैसे ब्रॉडबैंड और सेल्युलर बैकहॉल उपलब्ध कराएगी। साथ ही मोबाइल सैटेलाइट सेवाओं के तहत डायरेक्ट-टू-डिवाइस कनेक्टिविटी भी देने की तैयारी है। इसका फायदा आम उपभोक्ताओं के साथ-साथ उद्योगों और संस्थानों को भी मिलेगा।

रणनीतिक रूप से भी अहम

  • यह परियोजना केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, इस सैटेलाइट नेटवर्क में भविष्य में रक्षा क्षेत्र से जुड़े पेलोड जोड़ने की संभावना पर भी विचार किया जा रहा है। यदि ऐसा होता है, तो यह नेटवर्क राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष संचार क्षमता को भी नई मजबूती देगा।
  • बढ़ते वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बीच कई देश विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। ऐसे में भारत का अपना LEO सैटेलाइट नेटवर्क भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

स्टारलिंक और प्रोजेक्ट कुइपर से कितना आगे?

  • क्षमता के मामले में जियो की योजना अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों से मजबूत दिखाई देती है। स्टारलिंक को भारत में 600 गीगाबिट प्रति सेकंड (Gbps) क्षमता की मंजूरी मिली है, जबकि अमेजन के प्रोजेक्ट कुइपर की प्रस्तावित क्षमता 3 Tbps है। हालांकि कुइपर को अभी IN-SPACe से अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।
  • जियो का प्रस्तावित 5 Tbps नेटवर्क अधिक यूजर्स को एक साथ सेवाएं देने में सक्षम हो सकता है।

अब आगे क्या होगा?

तकनीकी मंजूरी मिलने के बाद भी जियो को कई नियामकीय प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। इनमें अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (ITU) से ऑर्बिटल अधिकार प्राप्त करना, अन्य वैश्विक सैटेलाइट ऑपरेटरों के साथ समन्वय कर सिग्नल हस्तक्षेप से बचाव सुनिश्चित करना और भारत में प्रस्तावित ग्राउंड स्टेशन स्थापित करना शामिल है।
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