स्टीव जॉब्स ने जिसे बताया था गलत: 16 साल बाद एपल ने क्यों किया वही काम? लॉन्च किया टचस्क्रीन मैकबुक
स्टीव जॉब्स ने लैपटॉप में टचस्क्रीन को असुविधाजनक बताया था, लेकिन अब Apple ने MacBook Pro में यही फीचर पेश किया है। आखिर कंपनी ने 16 साल बाद अपनी सोच क्यों बदली? स्टीब जॉब्स ने मैकबुक में टचस्क्रीन को लेकर क्यों ऐसा कहा था? आइए जानते हैं।
विस्तार
करीब 16 साल पहले Apple के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स ने लैपटॉप की स्क्रीन को बार-बार छूकर इस्तेमाल करने पर सवाल उठाए थे। उनका मानना था कि लंबे समय तक सामने खड़ी स्क्रीन तक हाथ उठाकर पहुंचना आरामदायक नहीं है और इससे हाथों में थकान हो सकती है। लेकिन अब उसी Apple ने अपने MacBook Pro में पहली बार टचस्क्रीन पेश कर दी है। कंपनी का यह कदम इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि Apple लंबे समय तक मैक को कीबोर्ड और ट्रैकपैड से चलाए जाने वाले कंप्यूटर के रूप में देखती रही।
स्टीव जॉब्स ने टचस्क्रीन को लेकर क्या कहा था?
साल 2010 में जॉब्स ने कहा था कि टचस्क्रीन का इस्तेमाल करने के लिए हाथ को लगातार ऊपर उठाना पड़ता है, जो लंबे समय तक काम करने पर थकाने वाला हो सकता है। उनके मुताबिक, टच इंटरफेस मोबाइल फोन और टैबलेट के लिए ज्यादा स्वाभाविक है, क्योंकि इन्हें हाथ में पकड़कर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके उलट लैपटॉप की स्क्रीन आमतौर पर सीधी खड़ी होती है और उसके नीचे कीबोर्ड लगा होता है।
Apple की यह सोच सिर्फ जॉब्स के बयान तक सीमित नहीं रही बल्कि एप्पल के वरिष्ठ अधिकारी फिल शिलर ने भी 2016 में टचस्क्रीन मैक का विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि एप्पल ने इसे कई बार आजमाया, पर मैक का सॉफ्टवेयर माउस और ट्रैकपैड के लिए बना है, जबकि iPhone-iPad का इंटरफेस टच के लिए। दोनों को मिलाने से किसी का अनुभव बेहतर नहीं होता। हवा में हाथ बढ़ाकर iMac की स्क्रीन छूना उन्हें अव्यावहारिक लगता था।
फिर Apple ने क्यों बदला अपना फैसला?
Apple के फैसले में बदलाव के पीछे नई तकनीक के साथ इस्तेमाल के तरीकों में आया बदलाव भी अहम माना जा रहा है। पिछले कई वर्षों में Windows लैपटॉप में टचस्क्रीन आम हो गई है। लोग फोन और टैबलेट पर स्क्रीन को छूकर स्क्रॉल करने, तस्वीरों को बड़ा करने और कंटेंट को इधर-उधर करने के आदी हो चुके हैं। ऐसे में लैपटॉप पर भी टच कंट्रोल की मांग बनी रही है।
Apple के CEO जॉन टर्नस ने एक इंटरव्यू में बताया कि कंपनी मैक को अब भी मुख्य रूप से कीबोर्ड और ट्रैकपैड से इस्तेमाल होने वाला कंप्यूटर मानती है। हालांकि कुछ परिस्थितियों में स्क्रीन को छूकर काम करना सुविधाजनक हो सकता है। कंपनी के मुताबिक, वह टचस्क्रीन तभी लाना चाहती थी, जब इससे लैपटॉप की मोटाई, वजन या इस्तेमाल के अनुभव पर नकारात्मक असर न पड़े।
नए MacBook Pro में क्या बदला?
- टचस्क्रीन कंट्रोल: नए MacBook Pro में यूजर उंगली से स्वाइप करके वेबपेज स्क्रॉल कर सकता है, तस्वीरों को बड़ा कर सकता है और प्रेजेंटेशन की स्लाइड्स को खींचकर दूसरी जगह रख सकता है।
- टैंडम OLED डिस्प्ले: Apple ने नए मॉडल में टच कंट्रोल के साथ टैंडम OLED तकनीक पर आधारित डिस्प्ले दिया है, जो लैपटॉप के अनुभव को बेहतर बनाने के उद्देश्य से पेश किया गया है।
- हिंज डिजाइन में बदलाव: स्क्रीन को छूने पर लैपटॉप का डिस्प्ले ज्यादा हिले नहीं, इसके लिए कंपनी ने स्क्रीन के जोड़ यानी हिंज के डिजाइन में भी बदलाव किया है।
- कीबोर्ड और ट्रैकपैड बरकरार: टचस्क्रीन आने के बावजूद कीबोर्ड और ट्रैकपैड हटाए नहीं गए हैं। यूजर अपनी जरूरत के अनुसार पारंपरिक तरीके से या स्क्रीन छूकर लैपटॉप चला सकता है।
- प्रोफेशनल यूजर्स को फायदा: टच कंट्रोल डिजाइनरों, वीडियो एडिटर्स, संगीतकारों और अन्य प्रोफेशनल यूजर्स के लिए उपयोगी हो सकता है, खासकर उन कामों में जहां स्क्रीन पर सीधे कंटेंट को चुनना या इधर-उधर करना सुविधाजनक होता है।
क्या यह Apple की पुरानी सोच से यू-टर्न है?
Apple का यह कदम उसकी पुरानी सोच में बदलाव जरूर दिखाता है, लेकिन कंपनी ने कीबोर्ड और ट्रैकपैड को छोड़ने का फैसला नहीं किया है। उसका दावा है कि टच कंट्रोल मौजूदा तरीकों का विकल्प बनने के बजाय अतिरिक्त सुविधा देगा। अब सवाल यह है कि क्या यूजर्स वास्तव में लैपटॉप की स्क्रीन छूकर काम करना पसंद करेंगे या इसे कभी-कभार इस्तेमाल होने वाले फीचर के तौर पर देखेंगे। इसका जवाब नए MacBook Pro के बाजार में आने के बाद ही साफ होगा। फिलहाल इतना तय है कि जिस सुविधा को Apple लंबे समय तक मैक के लिए जरूरी नहीं मानती थी, उसे अब कंपनी ने अपने प्रीमियम लैपटॉप में जगह दे दी है।