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Ayodhya News: 40 साल बाद फिर गूंजी 1986 की ''राम रचना''
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Sun, 22 Feb 2026 11:18 PM IST
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03- रामपथ पर पथ संचलन करते संघ के स्वयंसेवक- संवाद
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नितिन मिश्र
अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में उस क्षण की पुनरावृत्ति हुई, जब इतिहास की स्मृतियां स्वर बनकर वर्तमान में उतर आई। एक फरवरी 1986 को राम मंदिर का ताला खुलने के अवसर पर संघ की ओर से घोष वादन के लिए तैयार की गई विशेष ''राम रचना'' एक बार फिर मंदिर परिसर में गूंजी तो श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
घोष वादन के लिए दिल्ली प्रांत से 108 घोष वादकों का समूह अयोध्या पहुंचा था। दिल्ली प्रांत के घोष प्रमुख रजत जैन ने बताया कि ''''राम रचना'''' उस दौर में स्वयं सेवकों की ओर से तैयार की गई थी, जब राम मंदिर आंदोलन निर्णायक मोड़ पर था। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी इस रचना का घोष वादन हुआ था, लेकिन राम मंदिर में पहली बार राम रचना गूंजी है। घोष वादन की इस प्रस्तुति के लिए स्वयंसेवकों ने तीन माह तक नियमित अभ्यास किया। हर रविवार और विशेष अभ्यास सत्रों में हम सब एकत्रित होते रहे। पुरानी धुनों को संरक्षित स्वरूप में प्रस्तुत करने के लिए वरिष्ठों ने मार्गदर्शन दिया। कई स्वयंसेवकों ने अपने निजी कार्यों से समय निकालकर अभ्यास किया। वाद्य यंत्रों की मरम्मत से लेकर तालमेल के अभ्यास तक हर स्तर पर सूक्ष्म तैयारी की गई।
रजत जैन ने बताया कि घोषवादन में 30 बिगुल (शंख), आठ नागांग, आठ स्वरद, एक गोमुख और 20 वेणु वाद्य का प्रयोग किया गया। इसके अलावा आनक, और पणव भी बजाए गए। घोष वादन में 15 वर्ष से 65 वर्ष तक के स्वयंसेवकों ने भाग लिया। युवाओं के उत्साह और वरिष्ठ स्वयंसेवकों के अनुभव का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। घोषवादन करने वालों में कुछ छात्र रहे तो कुछ शोधार्थी। कुछ नौकरी पेशा लोग भी रहे, कुछ सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मी भी रहे।
सैन्य बैंड के अनुशासन से प्रेरित होकर शुरू हुई परंपरा
रजत जैन के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में घोष वादन (बैंड) की परंपरा की शुरुआत 1927 में हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य स्वयंसेवकों में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना था। संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने सैन्य बैंड के अनुशासन से प्रेरित होकर, भारतीय नाद परंपरा को शामिल करते हुए शंख, बिगुल और वंशी से इसकी शुरुआत की थी। प्रारंभिक चरण में शंख और बिगुल (शंख) का उपयोग शुरू हुआ। घोष के वाद्यों को स्वदेशी नाम दिए गए। साइड ड्रम को आनक, बॉस ड्रम को पणव, और ट्रायंगल को त्रिभुज कहा गया। 1973 में बंगलूरू में पहला सामूहिक घोष वादन हुआ था, जिसमें 375 वादक शामिल थे। आज की शाखाओं में वंशी, स्वरद, नागांग जैसे आधुनिक वाद्यों का उपयोग होता है।
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अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में उस क्षण की पुनरावृत्ति हुई, जब इतिहास की स्मृतियां स्वर बनकर वर्तमान में उतर आई। एक फरवरी 1986 को राम मंदिर का ताला खुलने के अवसर पर संघ की ओर से घोष वादन के लिए तैयार की गई विशेष ''राम रचना'' एक बार फिर मंदिर परिसर में गूंजी तो श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।
घोष वादन के लिए दिल्ली प्रांत से 108 घोष वादकों का समूह अयोध्या पहुंचा था। दिल्ली प्रांत के घोष प्रमुख रजत जैन ने बताया कि ''''राम रचना'''' उस दौर में स्वयं सेवकों की ओर से तैयार की गई थी, जब राम मंदिर आंदोलन निर्णायक मोड़ पर था। रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद भी इस रचना का घोष वादन हुआ था, लेकिन राम मंदिर में पहली बार राम रचना गूंजी है। घोष वादन की इस प्रस्तुति के लिए स्वयंसेवकों ने तीन माह तक नियमित अभ्यास किया। हर रविवार और विशेष अभ्यास सत्रों में हम सब एकत्रित होते रहे। पुरानी धुनों को संरक्षित स्वरूप में प्रस्तुत करने के लिए वरिष्ठों ने मार्गदर्शन दिया। कई स्वयंसेवकों ने अपने निजी कार्यों से समय निकालकर अभ्यास किया। वाद्य यंत्रों की मरम्मत से लेकर तालमेल के अभ्यास तक हर स्तर पर सूक्ष्म तैयारी की गई।
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रजत जैन ने बताया कि घोषवादन में 30 बिगुल (शंख), आठ नागांग, आठ स्वरद, एक गोमुख और 20 वेणु वाद्य का प्रयोग किया गया। इसके अलावा आनक, और पणव भी बजाए गए। घोष वादन में 15 वर्ष से 65 वर्ष तक के स्वयंसेवकों ने भाग लिया। युवाओं के उत्साह और वरिष्ठ स्वयंसेवकों के अनुभव का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। घोषवादन करने वालों में कुछ छात्र रहे तो कुछ शोधार्थी। कुछ नौकरी पेशा लोग भी रहे, कुछ सरकारी विभागों में काम करने वाले कर्मी भी रहे।
सैन्य बैंड के अनुशासन से प्रेरित होकर शुरू हुई परंपरा
रजत जैन के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में घोष वादन (बैंड) की परंपरा की शुरुआत 1927 में हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य स्वयंसेवकों में अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना था। संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने सैन्य बैंड के अनुशासन से प्रेरित होकर, भारतीय नाद परंपरा को शामिल करते हुए शंख, बिगुल और वंशी से इसकी शुरुआत की थी। प्रारंभिक चरण में शंख और बिगुल (शंख) का उपयोग शुरू हुआ। घोष के वाद्यों को स्वदेशी नाम दिए गए। साइड ड्रम को आनक, बॉस ड्रम को पणव, और ट्रायंगल को त्रिभुज कहा गया। 1973 में बंगलूरू में पहला सामूहिक घोष वादन हुआ था, जिसमें 375 वादक शामिल थे। आज की शाखाओं में वंशी, स्वरद, नागांग जैसे आधुनिक वाद्यों का उपयोग होता है।
