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Ayodhya News: सम्मानों से सजी दीवार, इलाज को तरसता पद्मश्री शरीफ चाचा का परिवार
Wed, 19 Aug 2026 12:36 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Wed, 19 Aug 2026 12:36 AM IST
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मोहम्मद शरीफ व उनके पुत्र।
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अयोध्या। जिंदगी भर जिन लावारिस शवों का कोई अपना नहीं था, उन्हें शरीफ चाचा ने अपना समझकर अंतिम विदाई दी। पहचान से लेकर अंतिम संस्कार तक की जिम्मेदारी उठाई और करीब 28 हजार अनजान चेहरों को सम्मान के साथ विदा किया। उनकी इसी इंसानियत को देश ने सलाम किया और वर्ष 2021 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया, लेकिन आज वही शरीफ चाचा जिंदगी के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां सम्मानों से सजी दीवारों के बीच इलाज के लिए पैसों की कमी से जूझना पड़ रहा है।
रिकाबगंज क्षेत्र के खिड़कीअली बेग मोहल्ले के रहने वाले शरीफ चाचा को करीब एक साल से वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली है। अधिकारियों के चक्कर लगाने के बाद परिवार को हर बार आश्वासन मिला, लेकिन पेंशन खाते तक नहीं पहुंची। घर की दीवारों पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरें हैं। पद्मश्री सम्मान की यादें हैं और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का शुभकामना पत्र भी है। मगर इन तस्वीरों के साथ जिंदगी की दूसरी तस्वीर है- जर्जर टीन की छत, दवाइयों का बढ़ता खर्च और बीमारी से जूझता परिवार।
बेटे की मौत ने बदल दी जिंदगी की राह
वर्ष 1991 में एक हादसे में बड़े बेटे की मौत हो गई थी। बेटे का शव भी घरवालों को नहीं मिला। इस घटना ने शरीफ चाचा को झकझोर दिया। इसी घटना के बाद उन्होंने तय किया कि किसी दूसरे परिवार को अपने प्रियजन की लावारिस मौत का दर्द अकेले नहीं सहना पड़े। उन्होंने अज्ञात शवों की पहचान कराने और उनके धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार कराने का बीड़ा उठा लिया।
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इसके बाद तीन दशक तक यह सिलसिला चलता रहा। सूचना मिलते ही वह शव के पास पहुंचते, पहचान की कोशिश करते और फिर पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराते। करीब 28 हजार शवों को उन्होंने अंतिम विदाई दी। उम्र बढ़ी, शरीर कमजोर हुआ, मगर इंसानियत की यह जिम्मेदारी आज भी उनके भीतर जिंदा है। अब भी किसी अज्ञात शव की सूचना मिलती है तो वह बेटे और साथियों के साथ व्यवस्था में जुट जाते हैं। जरूरत पड़ने पर पौत्र तक को इस सेवा में भेजते हैं।
पद्मश्री की चमक के साथ दवाइयों का बोझ
15 सदस्यों के परिवार में नियमित आमदनी के साधन गिने-चुने हैं। बड़े बेटे मो. सगीर पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे हैं। बीमारी से पहले वह स्कूल वैन चलाकर करीब नौ हजार रुपये महीने कमाते थे। मंझले बेटे मो. शब्बीर निजी नौकरी से आठ हजार रुपये महीने कमाते हैं। छोटे बेटे मो. अशरफ बाइक मैकेनिक हैं। इन्हीं सीमित आय के सहारे परिवार का खर्च और इलाज चल रहा है।
खुद की दवा 3500 रुपये, परिवार में कई बीमार
शरीफ चाचा की दवाइयों पर करीब 3500 रुपये हर महीने खर्च होते हैं। पत्नी हृदय रोग से जुड़ी दवाएं लेती हैं। बड़े बेटे का कैंसर का इलाज चल रहा है। बेटी को भी लगातार दवाइयों और ऑपरेशन की जरूरत है। परिवार के पांच सदस्यों के आयुष्मान कार्ड बने हैं, लेकिन हर जरूरत उसका दायरा नहीं समेट पाती। मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए जिलाधिकारी के माध्यम से प्रस्ताव भेजा गया था। इसके बाद अब तक परिवार को एक लाख रुपये की सहायता मिली है, लेकिन बीमारी और जरूरतों के सामने यह रकम भी पर्याप्त नहीं है।
वर्जन
शरीफ चाचा की पूरी मदद की जाएगी। मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए भेजे गए प्रस्ताव में कहां अड़चन आ रही है, इसे भी प्रमुखता से जांच कर दूर किया जाएगा। वृद्धावस्था पेंशन न मिलने के कारण क्या हैं, इस पर भी जांच की जाएगी। दोबारा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।
- शशांक त्रिपाठी, डीएम अयोध्या
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रिकाबगंज क्षेत्र के खिड़कीअली बेग मोहल्ले के रहने वाले शरीफ चाचा को करीब एक साल से वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली है। अधिकारियों के चक्कर लगाने के बाद परिवार को हर बार आश्वासन मिला, लेकिन पेंशन खाते तक नहीं पहुंची। घर की दीवारों पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरें हैं। पद्मश्री सम्मान की यादें हैं और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का शुभकामना पत्र भी है। मगर इन तस्वीरों के साथ जिंदगी की दूसरी तस्वीर है- जर्जर टीन की छत, दवाइयों का बढ़ता खर्च और बीमारी से जूझता परिवार।
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बेटे की मौत ने बदल दी जिंदगी की राह
वर्ष 1991 में एक हादसे में बड़े बेटे की मौत हो गई थी। बेटे का शव भी घरवालों को नहीं मिला। इस घटना ने शरीफ चाचा को झकझोर दिया। इसी घटना के बाद उन्होंने तय किया कि किसी दूसरे परिवार को अपने प्रियजन की लावारिस मौत का दर्द अकेले नहीं सहना पड़े। उन्होंने अज्ञात शवों की पहचान कराने और उनके धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार कराने का बीड़ा उठा लिया।
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इसके बाद तीन दशक तक यह सिलसिला चलता रहा। सूचना मिलते ही वह शव के पास पहुंचते, पहचान की कोशिश करते और फिर पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कराते। करीब 28 हजार शवों को उन्होंने अंतिम विदाई दी। उम्र बढ़ी, शरीर कमजोर हुआ, मगर इंसानियत की यह जिम्मेदारी आज भी उनके भीतर जिंदा है। अब भी किसी अज्ञात शव की सूचना मिलती है तो वह बेटे और साथियों के साथ व्यवस्था में जुट जाते हैं। जरूरत पड़ने पर पौत्र तक को इस सेवा में भेजते हैं।
पद्मश्री की चमक के साथ दवाइयों का बोझ
15 सदस्यों के परिवार में नियमित आमदनी के साधन गिने-चुने हैं। बड़े बेटे मो. सगीर पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे हैं। बीमारी से पहले वह स्कूल वैन चलाकर करीब नौ हजार रुपये महीने कमाते थे। मंझले बेटे मो. शब्बीर निजी नौकरी से आठ हजार रुपये महीने कमाते हैं। छोटे बेटे मो. अशरफ बाइक मैकेनिक हैं। इन्हीं सीमित आय के सहारे परिवार का खर्च और इलाज चल रहा है।
खुद की दवा 3500 रुपये, परिवार में कई बीमार
शरीफ चाचा की दवाइयों पर करीब 3500 रुपये हर महीने खर्च होते हैं। पत्नी हृदय रोग से जुड़ी दवाएं लेती हैं। बड़े बेटे का कैंसर का इलाज चल रहा है। बेटी को भी लगातार दवाइयों और ऑपरेशन की जरूरत है। परिवार के पांच सदस्यों के आयुष्मान कार्ड बने हैं, लेकिन हर जरूरत उसका दायरा नहीं समेट पाती। मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए जिलाधिकारी के माध्यम से प्रस्ताव भेजा गया था। इसके बाद अब तक परिवार को एक लाख रुपये की सहायता मिली है, लेकिन बीमारी और जरूरतों के सामने यह रकम भी पर्याप्त नहीं है।
वर्जन
शरीफ चाचा की पूरी मदद की जाएगी। मुख्यमंत्री राहत कोष से मदद के लिए भेजे गए प्रस्ताव में कहां अड़चन आ रही है, इसे भी प्रमुखता से जांच कर दूर किया जाएगा। वृद्धावस्था पेंशन न मिलने के कारण क्या हैं, इस पर भी जांच की जाएगी। दोबारा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।
- शशांक त्रिपाठी, डीएम अयोध्या