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Ayodhya News: श्रद्धालुओं की राह के लिए दी जमीन, मुआवजे के लिए वर्षों भटकता रहा मंदिर प्रबंधन
Tue, 18 Aug 2026 11:54 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Tue, 18 Aug 2026 11:54 PM IST
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अयोध्या। रामलला के दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए बनाए गए सुग्रीव पथ के निर्माण में सुग्रीव किला मंदिर की जमीन दी गई, लेकिन इसके मुआवजे के लिए मंदिर प्रबंधन को लंबे समय तक अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़े। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि बार-बार मांग के बावजूद जब भूमि की कीमत का भुगतान नहीं किया गया। यह भी बताया गया कि संबंधित जमीन नजूल की है और उस पर मंदिर का स्वामित्व नहीं है। आखिरकार मंदिर प्रबंधन को हाईकोर्ट की शरण लेनी पड़ी। अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को भूमि की बकाया कीमत 1,20,96,000 रुपये आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया है।
मामला सुग्रीव किला स्थित श्रीठाकुर राम जानकी सुग्रीवजी विराजमान मंदिर की 1512 वर्गमीटर भूमि से जुड़ा है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, खसरा संख्या 246 और खाता संख्या 44/2 की यह भूमि सुग्रीव पथ के निर्माण के लिए ली गई थी। इसी मार्ग से रामलला के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की निकासी होती है। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि भक्तों की सुविधा और राम मंदिर क्षेत्र में बेहतर आवागमन व्यवस्था के उद्देश्य से उसने अपनी भूमि उपलब्ध कराई थी।
मंदिर प्रबंधन के अनुसार इससे पहले राम जन्मभूमि पथ के निर्माण के लिए भी सुग्रीव किला मंदिर की जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस समय भूमि के एवज में मंदिर को मुआवजा भी मिला था। इसी आधार पर सुग्रीव पथ के लिए ली गई भूमि के बदले भी समय से मुआवजा मिलने की उम्मीद थी।
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मंदिर प्रबंधन ने इसका विरोध करते हुए प्रशासन के समक्ष 1858 से अब तक के राजस्व रिकॉर्ड और बंदोबस्त अभिलेख भी प्रस्तुत किए। प्रबंधन का दावा है कि इन अभिलेखों में भूमि पर मंदिर का स्वामित्व दर्ज होता रहा है।
राजस्व रिकॉर्ड दिखाने के बाद भी नहीं हुआ भुगतान
- मंदिर प्रबंधन के मुताबिक पुराने राजस्व अभिलेख उपलब्ध कराने के बावजूद भूमि की कीमत का भुगतान नहीं किया गया। लंबे समय तक मुआवजे के लिए दौड़ने के बाद जब कोई समाधान नहीं निकला तो मंदिर प्रबंधन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार को बकाया भूमि मूल्य आठ फीसदी वार्षिक ब्याज के साथ जमा करने का निर्देश दिया है।
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मामला सुग्रीव किला स्थित श्रीठाकुर राम जानकी सुग्रीवजी विराजमान मंदिर की 1512 वर्गमीटर भूमि से जुड़ा है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार, खसरा संख्या 246 और खाता संख्या 44/2 की यह भूमि सुग्रीव पथ के निर्माण के लिए ली गई थी। इसी मार्ग से रामलला के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की निकासी होती है। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि भक्तों की सुविधा और राम मंदिर क्षेत्र में बेहतर आवागमन व्यवस्था के उद्देश्य से उसने अपनी भूमि उपलब्ध कराई थी।
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मंदिर प्रबंधन के अनुसार इससे पहले राम जन्मभूमि पथ के निर्माण के लिए भी सुग्रीव किला मंदिर की जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस समय भूमि के एवज में मंदिर को मुआवजा भी मिला था। इसी आधार पर सुग्रीव पथ के लिए ली गई भूमि के बदले भी समय से मुआवजा मिलने की उम्मीद थी।
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मंदिर प्रबंधन ने इसका विरोध करते हुए प्रशासन के समक्ष 1858 से अब तक के राजस्व रिकॉर्ड और बंदोबस्त अभिलेख भी प्रस्तुत किए। प्रबंधन का दावा है कि इन अभिलेखों में भूमि पर मंदिर का स्वामित्व दर्ज होता रहा है।
राजस्व रिकॉर्ड दिखाने के बाद भी नहीं हुआ भुगतान
- मंदिर प्रबंधन के मुताबिक पुराने राजस्व अभिलेख उपलब्ध कराने के बावजूद भूमि की कीमत का भुगतान नहीं किया गया। लंबे समय तक मुआवजे के लिए दौड़ने के बाद जब कोई समाधान नहीं निकला तो मंदिर प्रबंधन ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार को बकाया भूमि मूल्य आठ फीसदी वार्षिक ब्याज के साथ जमा करने का निर्देश दिया है।