राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस: छोटे कर्मियों पर गिरी गाज, बड़े बचाए जा रहे? SIT रिपोर्ट पर उठे सवाल
राम मंदिर चढ़ावा चोरी केस पर SIT की जांच रिपोर्ट पर सवाल खड़े हो रहे हैं। छोटे कर्मियों पर तो गाज गिरी, लेकिन क्या बड़े नाम बचाए जा रहे हैं? आगे पढ़ें पूरी खबर...
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रामनगरी अयोध्या स्थित राम मंदिर में चढ़ावे की रकम की कथित चोरी के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट सामने आने के बाद जांच की निष्पक्षता और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। खास तौर पर यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि जिन आठ कर्मचारियों को कथित चोरी के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, उनके खिलाफ कार्रवाई आगे बढ़ी, लेकिन ट्रस्ट के तत्कालीन प्रमुख पदाधिकारियों चंपत राय और अनिल मिश्रा की भूमिका पर अंतिम रिपोर्ट में जिम्मेदारी तय नहीं की गई।
सूत्रों के मुताबिक, एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में चंपत राय और अनिल मिश्रा का नाम आपराधिक आरोपियों के तौर पर शामिल नहीं है। वहीं, पहले की जांच में मंदिर परिसर से नकदी चोरी की पुष्टि और सुरक्षा तथा गणना व्यवस्था में गंभीर खामियों की बात सामने आई थी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है अगर व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक हुई, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक कैसे सीमित रह गई?
चोरी हुई तो निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी?
मामले की प्रारंभिक जांच में सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कर्मचारियों द्वारा कई बार नकदी बाहर ले जाने की बात सामने आने की रिपोर्टें आई थीं। साथ ही कर्मचारियों की तलाशी, ड्रेस कोड और नकदी गिनने की मानक प्रक्रिया में खामियों का भी उल्लेख किया गया था। यहां जांच का मूल सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि नकदी किसने उठाई, बल्कि यह भी होना चाहिए कि इतने लंबे समय तक यह सब चलता कैसे रहा?
अगर मंदिर की चढ़ावे की रकम की सुरक्षा के लिए निर्धारित एसओपी का पालन नहीं हुआ, कर्मचारियों की तलाशी नहीं हुई और नकदी की आवाजाही पर पर्याप्त निगरानी नहीं रही, तो उस पूरी व्यवस्था की निगरानी करने वाले अधिकारियों और पदाधिकारियों की जवाबदेही भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है।
आठ कर्मचारियों पर कार्रवाई
इस मामले में आठ कर्मचारियों अविनाश शुक्ला, अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, मनीष कुमार यादव, करुणेश पांडेय, रमाशंकर मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव और राम शंकर यादव उर्फ टिन्नू के खिलाफ कार्रवाई की गई है।
जांच पर प्रमुख सवाल
- निगरानी व्यवस्था में खामियां क्यों थीं?
- निर्धारित एसओपी का पालन क्यों नहीं हुआ?
- कथित तौर पर बार-बार नकदी बाहर जाने की जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों तक क्यों नहीं पहुंची?
- ट्रस्ट और बैंक की संयुक्त व्यवस्था में चूक कहां हुई?
- बड़े पदाधिकारियों की जिम्मेदारी किस आधार पर तय या खारिज की गई?
- और प्रारंभिक जांच में उठे सवालों का अंतिम रिपोर्ट में क्या जवाब दिया गया?