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Ayodhya News: भगवान ऋषभदेव को अर्पित किया गया इक्षुरस आहार
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Sun, 19 Apr 2026 08:55 PM IST
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भगवान ऋषभदेव को इक्षुरस का आहार अर्पित करते रवींद्रकीर्ति स्वामी व अन्य।
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अयोध्या। अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर रायगंज स्थित बड़ी मूर्ति दिगंबर जैन मंदिर में भगवान ऋषभदेव का आहार महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम जैन धर्म की सर्वाेच्च साध्वी आर्यिका ज्ञानमती के पावन सानिध्य और मुनि सोमदत्त सागर की उपस्थिति में संपन्न हुआ। इस अवसर पर भगवान ऋषभदेव को इक्षुरस का आहार अर्पित करने की परंपरा निभाई गई।
मंदिर परिसर में प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन के नेतृत्व में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा को शोभायात्रा स्वरूप निकाला गया। जैन परंपरा के अनुसार भगवान ऋषभदेव के समय लोगों को साधुओं को आहार कराने की विधि का ज्ञान नहीं था, जिसके कारण उन्हें एक वर्ष 39 दिन तक आहार प्राप्त नहीं हुआ। बाद में हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश को पूर्व जन्म का स्मरण हुआ और उन्होंने भगवान को श्रद्धापूर्वक इक्षुरस (गन्ने का रस) का आहार अर्पित किया। मान्यता है कि उस पात्र का रस अक्षय हो गया और पूरे नगर में उसका वितरण किया गया।
इस अवसर पर गणिनी प्रमुख ने कहा कि अक्षय तृतीया आहारदान और पुण्य संचय का महापर्व है। इस दिन किया गया सत्कर्म अक्षय फल प्रदान करता है। वर्तमान समय में लोग सोना-चांदी खरीदकर पर्व मनाते हैं, लेकिन इसकी मूल भावना दान, संयम और सेवा है। अयोध्या तीर्थ में राजा श्रेयांश के प्रतीक रूप में सुभाषचंद जैन लखनऊ ने प्रथम आहारदान का सौभाग्य प्राप्त किया। इसके बाद कैलाशचंद जैन, पुखराज पांड्या, अंजय जैन, डॉ. राधा जैन, दिनेश जैन, अरिंजय जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन सहित अनेक श्रद्धालुओं ने आहारदान किया।
दान, तप, संयम और समर्पण का संदेश देती है अक्षय तृतीया
- जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्रकीर्ति ने अपने संदेश में कहा कि एक वर्ष 39 दिन की तपस्या के बाद भगवान ऋषभदेव ने वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन पहली बार आहार ग्रहण किया था। उसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रसंग की स्मृति में जैन समाज अक्षय तृतीया का पर्व मनाता है। उन्होंने कहा कि अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि दान, तप, संयम और समर्पण का संदेश देने वाला दिवस है। यह दिन समाज को सिखाता है कि सच्चा पुण्य श्रद्धा, सेवा और निष्काम भाव से किए गए दान में निहित है।
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मंदिर परिसर में प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन के नेतृत्व में भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा को शोभायात्रा स्वरूप निकाला गया। जैन परंपरा के अनुसार भगवान ऋषभदेव के समय लोगों को साधुओं को आहार कराने की विधि का ज्ञान नहीं था, जिसके कारण उन्हें एक वर्ष 39 दिन तक आहार प्राप्त नहीं हुआ। बाद में हस्तिनापुर के राजा श्रेयांश को पूर्व जन्म का स्मरण हुआ और उन्होंने भगवान को श्रद्धापूर्वक इक्षुरस (गन्ने का रस) का आहार अर्पित किया। मान्यता है कि उस पात्र का रस अक्षय हो गया और पूरे नगर में उसका वितरण किया गया।
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इस अवसर पर गणिनी प्रमुख ने कहा कि अक्षय तृतीया आहारदान और पुण्य संचय का महापर्व है। इस दिन किया गया सत्कर्म अक्षय फल प्रदान करता है। वर्तमान समय में लोग सोना-चांदी खरीदकर पर्व मनाते हैं, लेकिन इसकी मूल भावना दान, संयम और सेवा है। अयोध्या तीर्थ में राजा श्रेयांश के प्रतीक रूप में सुभाषचंद जैन लखनऊ ने प्रथम आहारदान का सौभाग्य प्राप्त किया। इसके बाद कैलाशचंद जैन, पुखराज पांड्या, अंजय जैन, डॉ. राधा जैन, दिनेश जैन, अरिंजय जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन सहित अनेक श्रद्धालुओं ने आहारदान किया।
दान, तप, संयम और समर्पण का संदेश देती है अक्षय तृतीया
- जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्रकीर्ति ने अपने संदेश में कहा कि एक वर्ष 39 दिन की तपस्या के बाद भगवान ऋषभदेव ने वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन पहली बार आहार ग्रहण किया था। उसी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक प्रसंग की स्मृति में जैन समाज अक्षय तृतीया का पर्व मनाता है। उन्होंने कहा कि अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं, बल्कि दान, तप, संयम और समर्पण का संदेश देने वाला दिवस है। यह दिन समाज को सिखाता है कि सच्चा पुण्य श्रद्धा, सेवा और निष्काम भाव से किए गए दान में निहित है।

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