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अनूठी परंपरा: 40 दिनों तक आराध्य संग होली खेलेंगे भक्त

संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Sat, 24 Jan 2026 09:30 PM IST
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Unique tradition: Devotees will play Holi with their deity for 40 days
14- रामलला के गाल पर लगाया गया अबीर-गुलाल व आरती करते पुजारी- ट्रस्ट
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अयोध्या। धर्म और परंपरा की नगरी अयोध्या में होली केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि 40 दिनों तक चलने वाला भक्ति और उल्लास का महोत्सव है। वसंत पंचमी के पावन दिन से ही रामनगरी में रंगों का यह उत्सव आरंभ हो चुका है, जिसमें भक्त भगवान के साथ होली खेलने की परंपरा का निर्वहन करते हैं।
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रामनगरी में वसंत पंचमी से रंगोत्सव का रंग चटख हो जाता है और 40 दिनों तक अयोध्या में भक्त और भगवान के बीच खेली जाने वाली होली का उल्लास बिखरता है। रामनगरी में 40 दिनों तक होली के अलग-अलग रंग दिखाई देते है। साधु संतों की मानें तो 40 दिनों तक वह किसी और के साथ नहीं बल्कि साक्षात भगवान के साथ ही होली खेलते हैं। मंदिरों, मठों और आश्रमों में प्रतिदिन होली का रंग चढ़ता जाता है। कहीं अबीर-गुलाल से प्रभु को रंगा जाता है, तो कहीं फूलों की होली खेली जाती है। रामलला, सीता-राम और हनुमानजी के विग्रहों के समक्ष भक्त भजनों, कीर्तन और रामनाम के संकीर्तन के साथ रंग अर्पित करते हैं।
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राम जन्मभूमि परिसर, कनक भवन, हनुमानगढ़ी और अन्य प्रमुख मंदिरों में होली का यह उत्सव विशेष धार्मिक अनुशासन और मर्यादा के साथ मनाया जाता है। मंदिरों में होली के दौरान सुगंधित गुलाल, प्राकृतिक रंगों और पुष्प वर्षा की परंपरा निभाई जाती है, जिससे संपूर्ण वातावरण भक्तिरस से सराबोर हो उठता है।

उपासना में शामिल हुआ रंग, गुलाल
दंतधावन कुंड आचारी मंदिर के पीठाधीश्वर महंत विवेक आचारी बताते हैं कि रोजाना होने वाली उपासना में रंग, गुलाल को भी शामिल किया जाता है। नित्य प्रति राग-भोग शृंगार के क्रम में भगवान के विग्रह पर अबीर-गुलाल भी अर्पित किया जाता है। यह सिलसिला होलिका दहन के दिन तक चलता रहा है। अयोध्या की यह परंपरा बताती है कि यहां पर्व केवल उत्सव नहीं, आस्था की निरंतर यात्रा है।
रंगभरी एकादशी से विस्तार लेगा उत्सव

हनुमानगढ़ी के पुजारी रमेश दास बताते हैं कि रंगभरी एकादशी से यह उत्सव और भी विस्तार लेगा। इस दिन हनुमानगढ़ी के नागा-साधु जुलूस निकालेंगे और मठ-मंदिरों में होली का आमंत्रण देंगे। इस दिन से रोजाना शृंगार के समय आराध्य को विशिष्ट भोग भी अर्पित किया जाएगा। दिन ढलते ही मंदिर प्रांगणों में फाग गीतों की गूंज सुनाई देने लगेगी। ढोलक, मंजीरा और करतालों की संगत पर गाए जाने वाले भक्ति फाग गीत अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत करते हैं। यह परंपरा भक्ति को उत्सव में और उत्सव को साधना में बदल देती है।
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